संसार के लगभग सभी लोग किसी न किसी रूप में ईश्वरीय सत्ता, सार्वभौमिक सत्ता व सर्वोच्च सत्ता के अस्तित्व में विश्वास करते हैं। उनका मानना है कि कोई शक्ति है जो सर्वशक्तिमान है, सर्वापरि है, संपूर्ण है। उस शक्ति की कल्पना, नाम आदि भिन्न-भिन्न विचारों के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं और हैं भी। उनके द्वारा कल्पित, नामित, वह शक्ति उनका ईश्वर है। भगवान है, गॉड है, खुदा है।
सामान्यतः जब मनुष्य कठिनाई में होता है, दुःख में होता है तो वह अपने जीवन के अंतरंग व्यक्ति, वह उसका मित्र हो सकता है, पारिवारिक सदस्य हो सकता है, या अन्य भी, उससे वह अपने मन की बात कहता है, आगे चलने की राह पूछता है। सहारा, सहयोग, सांत्वना, सद्भावना की आशा जगाता है। छोटे-मोटे सांसारिक कार्यों में आई कठिनाइयां इस प्रकार दूर भी हो जाती हैं।
जब मनुष्य कुछ अधिक कष्ट, पीड़ा, दुःख में होता है उसे सांसारिक लोगों से अपने दुःखों का निराकरण दृष्टिगत नहीं होता, तब वह उस सर्वोच्च सत्ता का स्मरण करता है। उससे मन की बात कहता है। प्रार्थना करता है।
प्रतिदिन के जीवन में मनुष्य उस प्रभु को कैसे स्मरण करे, किन शब्दों में प्रार्थना करे, किस भाव को क्या स्थान दे, किस देव, देवी की प्रार्थना करे, इसके लिए शास्त्रों ने अपने श्लोक, मंत्र, दोहा, चौपाइयां, गीत, धुन, ध्यान की बात कही है। इनमें ईश्वर के गुणों का वर्णन है, अन्य-अन्य कामनाओं की पूर्ति करने की चाहना है।
सभी धर्म, सभी शास्त्र ईश्वर का प्रतिदिन स्मरण करने को कहते हैं। उसके नाम का निरंतर जप करने को कहते हैं। उससे प्रार्थना करें कि वह हमें सद्बुद्धि दे, ज्ञान दे, सुख शांति दे। इस प्रकार की प्रार्थनाओं के सैंकड़ों मंत्र प्रचलित हैं। साधक अपनी भावनाओं, अपनी श्रद्धा, अपनी समझ, सीख के अनुसार मंत्रों, श्लोकों आदि को अपनी पूजा/ध्यान में प्रयोग करता है।
ईश्वर का गुणगान, उसके प्रति समर्पण की भावना श्लोकों, मंत्रों आदि के माध्यम से पद्य गद्य किसी भी रूप में व्यक्त की जा सकती है। इसी प्रकार के पद्यों में किसी ने निम्न पद्य कितना सुंदर रचा है। जिसमें ईश्वर को सब कुछ माना है, ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण है।
त्वमेव माताश्च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्व मम् देव, देवा।।
हे प्रभु आप ही मेरी माता हैं, आप ही पिता हैं, आप ही बंधु हैं, आप ही सखा हैं। आप ही विद्या हैं, आप ही धन-दौलत, आप ही देवो के देव हैं, आप सर्वेसर्वा हैं। आप मेरे सर्वस्व हैं।
इस प्रकार के संपूर्ण के बाद एक सामान्यजन की अपने श्रेष्ठ के लिए कामना हो सकती है कि प्रभु मेरा भला करो। मुझे बुराई से, दुख, विपत्तियों से बचाओ।
एक प्रार्थना है –
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।।
मृत्योर्मा अमृतंगमय।।।
हे प्रभु, तूं मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चल। अंधेरे (अज्ञान रूपी अंधेरे) से उजाले (ज्ञान रूपी उजाले) की ओर ले चल और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चल।
इस प्रकार की अपने बारे में ईश्वर से प्राप्ति के बाद कुछ बाकी नहीं रहता।
जब एक व्यक्ति ईश्वर को समर्पित हो गया, ईश्वर ही सब कुछ है, ऐसा मन में धारण कर लिया एवं ईश्वर से प्रार्थना की कि वह उसे सत्य, प्रकाश एवं जीवन के राह पर चलाएं, तब उसे चाहिए कि वह संसार के समस्त प्राणियों के कल्याण की सोचे, इसके लिए एक प्रार्थना है –
सर्वे भवन्तु सुखिनः।
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मां कश्चिद दुःख भाग्भवेत।।
सभी प्राणी सुखी हों, दुख व्याधि से मुक्त रहंे। सभी की दृष्टि मंगलमयी हो। किसी को भी दुःख न हो।
संसार में सबका भला होगा तो अपना भला तो स्वतः हो जायेगा।
प्रार्थना कोई सामान्य निवेदन नहीं है। यह अहंकार रहित दो के बीच आप और आप के ईश्वर का संवाद है। प्रार्थना नम्रता, शांति, धैर्य एवं समर्पण के भाव के साथ की जानी चाहिए। उपरोक्त तीनों प्रार्थनाएं श्रद्धा और भाव के साथ प्रतिदिन की जायं तो अनेकों अन्य प्रार्थनाओं के पठन की पूर्ति भी स्वतः हो सकेगी।
इन प्रार्थनाओं के माध्यम से वह सब कुछ कह दिया गया है जो भिन्न-भिन्न प्रार्थनाओं के माध्यम से सामान्यजन ईश्वर से कहता है। इनमें ईश्वर के प्रति समर्पण है, अपने एवं विश्व के कल्याण की कामना। और कोई क्या चाह सकता है।
