हम सदियों से धरती को माता के रूप में प्रतिष्ठित करते है। वन्दे मातरम् की प्रतिध्वनि वेदों में सुनाई देती है ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ (अथर्ववेद) अर्थात भूमि मेरी माता हैं और मैं उसका पुत्र हूँ। इसी प्रकार आदि ग्रन्थ वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम का कथन है-
अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।
अर्थात हे लक्ष्मण! यद्यपि यह लंका सोने की बनी है, फिर भी इसमें मेरी कोई रुचि नहीं है (क्योंकि) जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं।
इसी श्रृंखला में 1882 में श्री बंकिमचन्द्र चटर्जी ने ‘वन्दे मातरम्’ गीत की रचना की। स्वतंत्रता संग्राम के प्रेरक संस्कृत और बांग्ला में रचित इस गीत ने भारत के जन-मन को जागृत करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जन-जन में चेतना उत्पन्न करने वाले इस गीत की रचना विशेष परिस्थितियों में हुई क्योंकि उस काल में ब्रिटिश शासकों ने हर सरकारी समारोह में ‘गॉड सेव द क्वीन’ गीत गाना अनिवार्य कर दिया था। अंग्रेजों के इस आदेश से महान देशभक्त और अंग्रेज प्रशसन में उच्च अधिकारी बंकिमचन्द्र चटर्जी बहुत आहत थे। उन्होंने महारानी का प्रशस्ति गान करने की बजाय माँ भारती की वंदना के रूप में इस गीत की रचना की। 1882 में जब बंकिम बाबू ने आनन्द मठ उपन्यास की रचना की तो उन्होंने इस गीत का उस में स्थान दिया। यह उपन्यास अंग्रेजी शासन में जमींदारों द्वारा किए जा रहेे शोषण व अकाल में त्रस्त जनता को जागृत करने के लिए हुए संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि पर आधारित है। उपन्यास में यह गीत भवानन्द नामक विद्रोही संन्यासी ‘वन्दे मातरम्’ गाता है। आरंभ में इसमें केवल दो संस्कृत के ही पद थे। नवम्बर, 1875 में बंकिम बाबू ने सियालदाह से नैहाटी की रेल यात्रा के दौरान बाद वाले पदों की रचना की जिनमें मातृभूमि की दुर्गा के रूप में स्तुति की गई है। इस गीत ने भारत माता के सगुण साकार रूप को जन-जन के हृदय में प्रतिष्ठित किया और ‘भारत माता की जय’ के उदघोष का प्रचलन तेजी से विस्तारित हुआ।
इस गीत को व्यापक समर्थन मिला इसीलिए 1886 में कोलकाता में हुए कांग्रेस अधिवेशन के मंच से वन्दे मातरम् गाया गया। 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में इसे गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने गाया। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की वन्दे मातरम् के प्रति इतनी श्रद्धा थी कि उन्होंने इसे छत्रपति शिवाजी महाराज के स्मारक के तोरण पर उत्कीर्ण करवाया। 6 अगस्त 1905 को बंग भंग के विरोध में टाउन हॉल की सभा में हजारों देशभक्तों ने इस गीत को एक साथ गाकर अंग्रेज सरकार को अपना निर्णय बदलने के लिए बाध्य किया। लगभग हर कांग्रेस-अधिवेशन के अतिरिक्त स्वतंत्रता आन्दोलन में भी ‘वन्दे मातरम्’ गीत प्रस्तुति के अनेक उदाहरण मिलते हैं। लाला लाजपत राय ने लाहौर से प्रकाशित अपने पत्र का नाम वन्दे मातरम् रखा।
अंग्रेजों की गोली से प्राण त्यागने वाली मातंगिनी हाजरा की जिह्वा पर आखिरी शब्द वन्दे मातरम् ही थे। 1929 में प्रकाशित काकोरी के शहीद पं. रामप्रसाद बिस्मिल की प्रतिबन्धित पुस्तक ‘क्रान्ति गीतांजलि’ में पहला गीत मातृ-वन्दना वन्दे मातरम् ही था। देश ही नहीं, विदेशों में भी इस गीत की गूंज सुनाई दी। 1907 में बर्लिन (जर्मनी) में मैडम भीकाजी कामा द्वारा फहराये तिरंगे पर वंदे मातरम् अंकित था। 17 अगस्त 1909 को इंग्लैंड में फांसी पर चढ़ने से पहले महान क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा के मुख से निकले अंतिम शब्द ‘वंदे मातरम्’ थे। अक्टूबर 1912 को केप टाउन, दक्षिण अफ्रीका पहुंचे गोपाल कृष्ण गोखले का स्वागत ‘वंदे मातरम्’ के नारे लगाते एक बड़े जुलूस के साथ किया गया। अंग्रेज सरकार इस गीत से बुरी तरह चिड़ी हुई थी। सरकार द्वारा वंदे मातरम् गाने पर दंडित करने के बावजूद जनमानस में इसके प्रति श्रद्धा और उत्साह कम होने की बजाय लगातार बढ़ता गया। इसीलिए 15 अगस्त, 1947 को जब माँ भारती अंग्रेजी की बेडियों से मुक्त हुई, आकाशवाणी से प्रसिद्ध गायक पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने ‘वंदे मातरम्’ प्रस्तुत कर जन उत्साह की अभिव्यक्ति दी।
स्वतंत्रता के पश्चात अपना संविधान बनाने के लिए बनी संविधान सभा की पहली बैठक का प्रारंभ ‘वंदे मातरम’ के साथ और समापन ‘जन गण मन’ के साथ हुआ। संविधान सभा ने अपने सभापति जो बाद में भारत के प्रथम राष्ट्रपति भी बने, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा 24 जनवरी 1950 को प्रस्तुत प्रस्ताव पर ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रगीत के रूप स्वीकार किया गया। वन्दे-मातरम् हमारे संविधान की मूल प्रति में प्रतिष्ठित है।
‘वंदेमातरम्’ गीत के 150 वर्ष पूर्ण होने पर 8 अगस्त 2025 को संसद में वन्दे मातरम् पर दस घंटे की एक विशेष चर्चा हुई। इसके अतिरिक्त 7 नवंबर, 2025 को देश में वर्षभर चलने वाले कार्यक्रमों का श्रीगणेश हुआ। इन कार्यक्रमों के माध्यम से देश की युवा पीढ़ी को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की कालजयी रचना और इसके प्रभावों के साथ-साथ स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पीढ़ियों को प्रेरित करने में इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व से परिचित कराया जा रहा है। यह विशेष उल्लेखनीय है कि वर्ष 2002 में बी.बी.सी. द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार ‘वंदे मातरम्’ विश्व का दूसरा सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है। यह सर्वविदित है कि हमारी जननी तो मात्र 9 माह अपने गर्भ में रखती है परंतु जन्मभूमि हमें आजीवन अपनी गोद में स्थान देती है। अतः हमारी धार्मिक आस्था कुछ भी हो, वंदेमातरम् के गायन पर किसी सच्चे भारतीय को आपत्ति हो ही नहीं सकती। क्या कोई ऐसा भी विवेकशील हो सकता है जो अपनी मातृभूमि को सुजलाम सुजलाम मलयज शीतलाम (जल से भरपूर, फलों से समृद्ध, मलयज (चंदन) की हवाओं से शीतल, फसलों से हरी-भरी) न चाहता हो?
वंदे मातरम की साद्य सदी के अवसर पर वर्ष भर कार्यक्रम आयोजित किया जा रहे है ताकि देश के बच्चे बच्चे में अपनी मातृभूमि के प्रति विशेष श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव स्थाई रूप से स्थापित हो सके इसलिए आओ हम भी मातृभूमि को सम्मान देने वाले इस गीत को कण्ठस्थ करने और कराने का संकल्प लें। वंदे मातरम्!
डा. विनोद बब्बर
