नयी दिल्ली, 14 अप्रैल (भाषा) कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने दिल्ली से सटे नोएडा में विभिन्न कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन का हवाला देते हुए मंगलवार को कहा कि मजदूर देश की रीढ़ हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने उन्हें बोझ समझ लिया है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने मजदूरों का समर्थन किया और यह दावा भी किया कि सरकार ने पिछले साल चार श्रम संहिताओं को जल्दबाजी में लागू किया जिससे रोजाना काम के घंटे बढ़कर 12 हो गए, लेकिन श्रमिकों के मानदेय में कोई वृद्धि नहीं हुई।
राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, “कल नोएडा की सड़कों पर जो हुआ, वो इस देश के श्रमिकों की आख़िरी चीख़ थी, जिसकी हर आवाज़ को अनसुना किया गया, जो मांगते-मांगते थक गया।”
उन्होंने कहा, ‘‘नोएडा में काम करने वाले एक मज़दूर की 12,000 रुपये महीने की तनख्वाह, 4,000-7,000 रुपये किराया। जब तक 300 रुपये की सालाना बढ़ोतरी मिलती है, मकान मालिक 500 रुपये किराया बढ़ा देता है।”
उनका कहना है कि तनख्वाह बढ़ने तक बेलगाम महंगाई ‘‘ज़िंदगी का गला घोंट देती है, कर्ज़ की गहराई में डुबा देती है और यही “विकसित भारत” का सच है।’’
राहुल गांधी ने कहा, “एक महिला मज़दूर ने कहा कि गैस के दाम बढ़ते हैं, पर हमारी तनख्वाह नहीं। इन लोगों ने शायद इस गैस संकट के दौरान अपने घर का चूल्हा जलाने के लिए 5000 रुपये का भी सिलेंडर खरीदा होगा।”
उन्होंने कहा, “यह सिर्फ़ नोएडा की बात नहीं है। और यह सिर्फ़ भारत की भी बात नहीं है। दुनियाभर में ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं, पश्चिम एशिया में युद्ध की वजह से आपूर्ति शृंखला टूट गई है। मगर, अमेरिका के टैरिफ़ वॉर, वैश्विक महंगाई, टूटती आपूर्ति शृंखला का बोझ मोदी जी के “मित्र” उद्योगपतियों पर नहीं पड़ा। इसकी सबसे बड़ी मार पड़ी है उस मज़दूर पर जो दिहाड़ी कमाता है, तभी रोज़ खाता है।”
कांग्रेस नेता का कहना है, “वो मज़दूर, जो किसी युद्ध का हिस्सा नहीं, जिसने कोई नीति नहीं बनाई – जिसने बस काम किया। चुपचाप। बिना शिकायत। और उसके बदले अपना हक मांगने पर उन्हें मिलता क्या है? दबाव और अत्याचार। “
राहुल गांधी के अनुसार, एक और ज़रूरी मुद्दा है कि मोदी सरकार ने 4 श्रम संहिताओं को जल्दबाज़ी में और बिना संवाद के नवंबर, 2025 से लागू कर दिया, जिसके तहत काम का समय 12 घंटे तक बढ़ा दिया।
उन्होंने कहा, “जो मज़दूर हर रोज़ 12-12 घंटे खड़े होकर काम करता है फिर भी बच्चों की स्कूल फ़ीस क़र्ज़ लेकर भरता है। क्या उसकी मांग ग़ैरवाजिब है? और जो उसका हक़ हर रोज़ मार रहा है – वो “विकास” कर रहा है?”
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के मुताबिक, नोएडा के मज़दूर 20,000 रुपये मासिक मानदेय की मांग कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, “यह कोई लालच नहीं, यह उसका अधिकार, उसकी जिंदगी का एकमात्र आधार है। मैं हर उस मज़दूर के साथ हूं, जो इस देश की रीढ़ है और जिसे इस सरकार ने बोझ समझ लिया है।”
