घड़ियाल कभी आंसू नहीं बहाते

हमारा जाना-पहचाना एक जल जीव है घड़ियाल। भारत में क्रोकोडाइल्स की तीन प्रजातियां मिलती हैं। ये हैं घड़ियाल, मगर तथा एस्चुरीन क्रोकोडायल मगर भारत से लेकर पश्चिम में ईरान तक मिलता है। यह श्रीलंका में भी पाया जाता है। घड़ियाल पतली थूथन वाला होता है। यह भारत में गंगा, ब्रम्हपुत्रा तथा महानदी की जल श्रृंखलाओं के अतिरिक्त बर्मा की ईरावदी नदी में भी पाया जाता है। घड़ियाल मगर की तुलना में बड़े आकार का होता है। साथ में इसकी शक्तिशाली पूंछ होती है।


घड़ियाल अधिकतर बड़ी नदियों के गहरे जल के कुंडों में निवास करता है जबकि मगर झीलों, तालाबों तथा छोटी-छोटी नदियों में भी पाया जाता है। यह अधिकांशतः मछली खाकर मस्त रहता है जबकि वयस्क मगर अवसर मिलने पर बकरी तथा अन्य पशुओं का शिकार करने में नहीं चूकता। घड़ियाल सामान्यतः बहु पत्नी वाला जीव है। एक वयस्क नर घड़ियाल तीन से चार मादा घड़ियालों से सहवास करता है। यह प्रायः शरद ऋतु के अंत में प्रजनन कार्य में सक्षम होते हैं।


मार्च के मध्य से मादा घड़ियाल अपनी तैयारी में व्यस्त हो जाती है। लगातार महीने भर रात में नदी से निकलकर, किनारों पर सुरक्षित स्थान ढूंढ़ कर गड्ढा खोदती है। इसमें वह अंडे देने की तैयारी करती है। अप्रैल के शुरू में वह गड्ढे में लगभग चालीस अंडे देती है। अंडे देने के बाद वह बालू से गड्ढे को अच्छी तरह ढक देती है। घड़ियाल अपने अंडे पानी के नजदीक देते हैं जबकि मगर अपने अंडे पानी से दो सौ मीटर की दूरी पर जमीन पर घड़े के आकार में बनाए गड्ढे में देती है।


60 से 80 दिन के भीतर अंडों को सेने के बाद भ्रूण अंडे से बाहर आता है। अंडे सेने का ताप लगभग 27 डिग्री से. से 35 डिग्री से. होता है। अंडा तब फूटता है या मां तब फोड़ती है, जब बच्चा अंदर से चहलकदमी करता है। नर और मादा दोनों मिलकर बच्चों को पानी में तैराते हैं। यह भी देखने में आया है कि दो मीटर तक लंबे होते-होते घड़ियालों की संख्या बहुत कम रह जाती है।


द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तो घड़ियालों की संख्या नगण्य के बराबर रह गई है। व्यापारियों ने मार-मारकर इसकी खालों को बेचकर खूब धन कमाया है। इस दुर्लभ प्राणी को सुरक्षित करने के लिए 1972 में वन्य जैव सुरक्षा अधिनियम बनाया गया। इसके अंतर्गत इन्हें संरक्षित घोषित किया गया। इसका शिकार एवं व्यापार अवैध घोषित कर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया गया। घड़ियाल तथा घड़ियाल के किसी भाग से बनी हुई वस्तुओं का निर्यात भी एक अन्य अधिनियम के द्वारा बंद कर दिया गया।  


कई लोग कहते हैं कि उन्हांने इन घड़ियालों को सचमुच आंसू बहाते देखा है। इसी कारण ‘घड़ियाली आंसू‘ यानी ‘नकली आंसू‘ की लोकोक्ति पैदा हुई पर वैज्ञानिकों ने जो खोज की उससे पता लगता है कि घड़ियाल कभी आंसू नहीं बहाते। जी हां, जब उनके शरीर में अश्रु ग्रंथि है ही नहीं तो आंसू कैसे बहेंगे? तो फिर घड़ियाल क्या बहाते हैं? शिकार को खाते समय घड़ियाल के गुर्दे अतिरिक्त नमक को उन विशेष ‘विलवणीकरण ग्रंथियों‘ की ओर भेज देते हैं जो पानी के जरिए इस बेकार नमक को घड़ियाल के शरीर से बाहर फेंक देती हैं। अब यह महज एक संयोग है कि ये ग्रंथियां घड़ियाल की आंखों के बिलकुल करीब अवस्थित हैं जिस कारण इस नमकीन जल को लोग घड़ियाली आंसू समझ बैठते हैं।


घड़ियालों के बारे में और भी अनेक अजीबोगरीब भ्रामक कहानियां सदियों से चली आ रही हैं। इनमें शायद सबसे अजीब कहानी मिस्र की नील नदी वाले घड़ियालों के बारे में है। बरसातों में नील नदी में अक्सर बाढ़ आ जाती थी जिसमें हजारों घड़ियाल बहकर निचले इलाकों में पहुंच जाते थे। मिस्र के प्राचीन निवासी तब यह समझते थे कि खेतों के लिए इतना ढेर सारा पानी यह घड़ियाल ही लाते होंगे। इस कारण घड़ियालों का गुणगान किया जाता था और घरों में ताल बनाकर उन्हें उनमें पाला-पोसा जाता था। इतना ही नहीं, इन घड़ियालों को सोने- चांदी के कंगन पहनाकर सुखपूर्वक रखा जाता था।


घड़ियालों के सिलसिले में नई कहानी यह है कि बायोनिक्स क्षेत्रा के अनुसंधानकर्ता घड़ियालों की उपरोक्त विलवणीकरण ग्रंथियों का गहरा अध्ययन अब इस उद्देश्य से कर रहे हैं कि इस ज्ञान से ऐसी झिल्ली बना सकें जो नमकीन जल से नमक को हटाने में खूब सस्ती और कारगर सिद्ध हो। ऐसा हुआ तो फिर फायदा ही फायदा।