मनुष्य के हितकारी पशु-पक्षी

यूं तो हर पशु-पक्षी किसी न किसी रूप में मनुष्य के लिए हितकारी हैं लेकिन कुछ पशु-पक्षियों का मनुष्य के साथ निकट का संबंध है। विभिन्न क्षेत्रों में ये मनुष्य के लिए उपयोगी साबित होते हैं। खाने, पहनने, रहने से लेकर आने-जाने, सोने-जागने, पढ़ने-लिखने आदि हर काम में ये हमारे साथी रहे हैं।


पशु-पक्षियों को साथी मानना या उनका अपने हित में उपयोग करना नई बात नहीं है। पर्यावरण और प्रदूषण की रट लगाकर पशु-पक्षियों के साथ मानवीय संबंधों को जोड़ने का सैद्धांतिक प्रयास आज भले नया हो मगर व्यावहारिक रूप से पशु-पक्षियों की निवास स्थली वनों में ही आदिम सभ्यता का विकास हुआ है।


सभ्यता के विकास में पशु-पक्षियों का साहचर्य और भरपूर योगदान रहा है। कभी ये आहार बनकर हिरण, सूअर, बकरा तो कभी पोषण देकर गाय, बकरी, भैंस तो कभी रक्षक बनकर भेड़, कुत्ता, घोड़ा, हाथी तो कभी सवार बनकर घोड़ा, हाथी बैल, ऊंट, हमारी सहायता करते रहे हैं।


युद्ध भूमि में राम की सहायता करने वाले हनुमान, बाली और सुग्रीव वानर थे। संपाति और जटायु गरुड़ के पुत्रा थे। लक्ष्मण को नागास्त्रा लगने पर गरुड़ास्त्रा से उनकी जान बचाई गयी थी। युद्ध में राम की सहायता करने वाला जामवंत एक भालू था। रावण से युद्ध के लिए समुद्र पर पुल बांधने में नन्हीं सी गिलहरी ने भी राम को सहायता पहुंचाई थी।


मनुष्य सुनने से अधिक देख कर सीखता है इसलिए प्राचीन लेखकों ने अपनी उपदेश-कथाओं में पशु-पक्षियों को ही पात्रा बनाया था। जातक कथाएं हों या बोधकथाएं, पंचतंत्रा की कथाएं हों या अन्य उपदेश-कथाएं, सभी में पशु-पक्षियों को ही पात्रा बनाया था। उन कथाओं में दुनियावी ज्ञान की  बातें पशु-पक्षियों द्वारा ही कहलाई गई हैं।


कृषि हमारी अर्थ-व्यवस्था का मूलाधार है। अनेक पशु-पक्षी कृषि कार्य में हमारी सहायता करते हैं। कृषि को नुक्सान पहुंचाने वाले कीट-पतंगों को कीटभक्षी पशु ’पक्षी खा जाते हैं।

 टिड्डियों का दल जिस खेत के ऊपर से गुजर जाता है उसकी फसल स्वाहा हो जाती है लेकिन उस नन्हें मगर विकराल शत्रा को कीटभक्षी पक्षी चट करके हमारी फसल को सुरक्षा प्रदान करते हैं। चूहे भी हमारे कृषि के शत्रा माने जाते हैं। दिन में बाज आदि पक्षी उन चूहों को पकड़ कर गटक जाते हैं।



रात्रि के अंधेरे में पर्यावरण के महान संरक्षक उल्लूओं द्वारा वे पकडे जा़ कर उनका आहार बन जाते हैं।


कुछ कीट-पतंगे ऐसे हैं जो मोटे दरख्तों के तनों में छेद करके नुक्सान पहुंचाते हैं। ऐसे कीट-पतंगों को कठफोड़ा जैसे पक्षी खाकर हमारी प्राकृतिक संपदा को बचाये रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं।


सवारी के रूप में कुछ पशु-पक्षियों का प्रयोग किया ही जाता है। उनसे सामान ढलाने का काम भी लिया जाता है। हाथी, घोड़ा, गधा, बैल, ऊंट, आदि ऐसे ही पशु हैं। कहीं-कहीं शतुरमुर्ग से भी छोटी गाड़ी खिंचवाई जाती है।



कुछ पशु-पक्षियों द्वारा फलों और बीजों का प्रकीरणन किया जाता है। जब ऐसे पशु-पक्षी एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं तो अपने शरीर, चोंच, पंख या पेट में कुछ फल या बीज ले जाते हैं। नई जगह में गिरा कर वह फल या बीज अनुकूल परिस्थिति पाकर अंकुरित होता है और पौधा बनकर फूलने-फलने लगता है। इस तरह प्रकीरणन के माध्यम से पेड़-पौधों का न केवल एक से दूसरी जगह हस्तांरण हो जाता है बल्कि अनेक जगहों में प्रकीकरण हो जाने के कारण परिस्थितियों के थपेड़ों में नहीं पडे़ रहकर वे पृथ्वी पर अपना अस्तित्व बचाये रखने में सफल हो जाते हैं।



सौंदर्य और सजावट के साथ भी पशु-पक्षियों का गहरा संबंध है। हिरण के गिरे हुए तथाकथित सींग से ड्राइंग रूप की शोभा बढ़ जाती है। मोर तथा शुतुरमुर्ग के पंख और हाथी के दांत की सौंदर्यपूर्ण उपयोगिता किसी से छिपी नहीं है।



पशु-पक्षियों की कलाप्रियता से भी मनुष्य ने कम नहीं सीखा है। बया और दरजिन पक्षी का घौंसला देखने वाला मनुष्य क्या अपनी कला के प्रति अभिमान कर सकता है? चूहे और लोमड़ी  के बिल को देखकर बनाया गया दुर्ग किसके द्वारा जीता जा सकता है? पक्षियों का आकाश और दिशा संबंधी ज्ञान देखकर क्या मनुष्य उससे ईर्ष्या नहीं करता? या पक्षियों को आकाश में स्वछंद विचरते देखकर मनुष्य का मन आकाश यात्रा के लिए लालायित नहीं हो     जाता?



रात में मनुष्य सोया रहता है मगर कुत्ता जागकर उसकी संपत्ति की रखवाली  करता है। कुत्ता दिन में भी नवआगंतुकों को देखते ही भौंकने लगता है। यही नहीं, आज्ञा पालन के लिए कुत्ते को आदर्श माना गया है।



आज भले ही दूध-दही की कमी हो गई है लेकिन पहले गाय पालना बहुत जरूरी समझा जाता था। एक शताब्दी पूर्व तक गोधन से ही किसी की आर्थिक स्थिति का अंदाजा लगाया जाता था।



बिल्ली को मारना महापाप माना गया है। उसका एक रोयां भी नहीं टूटे, देहातों में इसका अभी भी ख्याल रखा जाता है। इसका मुख्य कारण बिल्ली की उपयोगिता है। बिल्ली घर के कोने-कोने में घुस कर चूहों का सफाया करती है जिससे हमारे कीमती अनाज का नुकसान होने से बच जाता है।




काग, गिद्ध और चील सर्वभक्षी पक्षी है। ये मृत पशु-पक्षियों को भी खा जाते हैं जिससे उनकी लाश सड़कर पर्यावरण प्रदूषित होने से बच जाता है। कोयल रोंयेदार कीड़ों को बड़े चाव से खा जाती है। नीलकंठ अकेले अपने वजन के बराबर कीड़े-मकौड़े रोज खा जाता है।
सर्पदंश के प्रतिवर्ष विश्व में पच्चीस हजार लोग मरते हैं लेकिन यह एक आश्चर्यजनक सत्य है कि अनेक असाध्य रोगों के लिए विषैले सांपों के विष का दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है।



घमंड भले बुरी चीज है परन्तु स्वाभिमान बहुत जरूरी है। स्वाभिमान की सीख कोई सिंह से ले। संगीतानुरागी बहुत से मनुष्य हैं मगर क्या हिरण से उनकी तुलना की जा सकती है।



मुर्गा अपनी कुकड़ू-कूं से सुबह-सुबह हमें जगाता है। मुर्गे से भी पहले कोयल की मधुर कूक सुनाई पड़ती है। चमगादड़ों के पंख की फड़फड़ाहट हमें शाम की सूचना दे देती है। पपीहे के पी कहां, पी कहां सुनकर किस विरही पति-पत्नी को एक-दूसरे की याद नहीं सताने लगती। कबूतरी की प्रणय-क्रीड़ा देखने के बाद भी कोई प्रेमी-प्रेमिका आपस में लड़े तो क्या शर्म की बात नहीं कही जायेगी। हिरण की किलकारी सुनकर किसका मन हरा नहीं हो जाता। नाचते हुए मोर को देखकर किसका मन मयूर नहीं नाच उठता।



स्वप्न विचार हो या शकुन-विचार, अलंकार वर्णन हो या दान, यज्ञ-पूजन, पशु पक्षियों का वर्णन आये बिना वह पूरा नहीं हो सकता। वस्तुतः पशु-पक्षियों के साथ मनुष्य का बहुत गहरा संबंध है। पशु-पक्षियों को देखकर मनुष्य कुछ देर के लिए प्रकृति से साहचर्य स्थापित कर लेता है जिससे उसके मन का सारा संताप दूर हो जाता है।