बदरंग हुए संस्कृति, प्रेम व मर्यादा के रंग ।
मेल-मिलाप और खुशी के रंगों से सराबोर करने की परम्परा का नाम है होली । सही मायनों में समझें तो होली केवल रंग बिखेरने या गुलाल लगा देने भर का त्यौहार नहीं वरन् वह बैर के भाव को धो डालने वाला जश्न है । ऐसा जश्न जो ऊँच नीच बड़े-छोटे, अपने-पराए के अंतर को धो डालता है । यदि ऐसे हम होली मनाते हैं तो वह अंग्रजी का ‘होली ’ यानि पावन पर्व बन जाता वरना तो हो हुल्लड़ बनकर रह जाता है ।
रंग,संस्कृति, प्रकृति और होली:
होली जैसे रंग, मस्ती और प्रेम के पर्व यूं ही नहीं बनाए गए थे हमारी संस्कृति में पर्व हमें अपनों और प्रकृति के समीप लाने का मौका देते थे । एक समय था जब होली के पर्व से करीब सवा महीने पहले वसंत पंचमी को होली का उपला रख दिया जाता था यानि प्रतीक रूप में खुशी भी अनायास नहीं क्रमागत आनी चाहिए । फिर गांव गलियों में मस्तों की टोलियां ‘फगवा’‘कामण’ या ‘धमाल’ गाते हुए घर घर जाती और होली का ईंधन इकट्ठा करती थी इसका भी एक सबब था सबका सहयोग लेना सबका योगदान पाना और इकट्ठे होकर मन के सारे पापों, गिले शिकवों को होली की आग में जला डालना होता था तब होली का मतलब । आज क्या है, सोचिए ।
एक होली, अनेक रूप:
अलग प्रदेशों में अलग अलग ढंग से होली आधार की स्थापना की जाती है पश्चिमी उत्तरप्रदेश में पांच उपले रख कर तो राजस्थान के जयपुर, सीकर, चुरु व झुंझुनूं सहित शेखावाटी में एक मोटा डण्डा गाड़ कर प्रहलाद के रूप में होलिका का आधार रखा जाता है और फिर प्रतिदिन सवा महीने तक प्रतिदिन ईंधन जमा करके लोकगीत व नृत्य ‘गींदड़’ आयोजित किए जाते हैं. डांडिया रास से मिलता जुलता नृत्य और मुंह में दो अलगोजे लेकर जब वातावरण में मधुर स्वर लहरी गूंजती है तो पूरा वातावरण ही सरस हो उठता है । वैसे ऐसा भी नहीं है कि होली के नाम पर बस गंदगी ही गंदगी हो आज भी कुछ सांस्कृतिक रूप से समृद्ध इलाकों में वहां के लोग होलिका के पर्व की महत्ता को जानते हैं यही वजह है कि आज भी बृज की लठ्ठमार होली, बस्तर की पत्थरमार होली, हरियाणा की कोड़ामार होली, राजस्थान की गाढ़े गुलाबी रंग की ‘गैर’, मथुरा की राधाकृष्ण होली व पंजाब के होलामहला का रंग आज भी सर चढ़़कर बोलता है और वातावरण में ‘होली आई रे कन्हाई, रंग बरसे बजा दे बांसुरी … जैसे सुमधुर गीत सुनाई देते हैं मगर फिर वही सवाल सांस्कृतिक होली घटती क्यों जा रही है।
गांवों की महकती होली:
उत्तर भारत के बहुत से गांवो में आज भी उल्लास के साथ न केवल होली-पूजन होता है वरन् वहां अब भी रात में होली के गीत की गूंजते हैं । होलिका को सूत की डोर से बांधकर हल्दी ,बेर, बताशे आदि से पूजा जाता है और रात्रि में शुभ मुहुर्त में होलिका दहन किया जाता है। वहां आज भी माना जाता है कि होलिका के दहन करने से मनुष्य के सारे पाप उसकी अग्नि में जल जाते हैं । आज के ही दिन नए अनाज की प्रथम आहुति भी अग्निदेव को अर्पित करते हैं ।
यह क्या हो गया ? :
एक निगाह डालिए अपने चारों तरफ क्या सच में हम सच में खुशी और प्रेम की होली मना रहे हैं ? क्या किसी भी तरह से हम मिथकों में वर्णित प्रहलाद रूपी भक्ति व आस्था को जला देने के लिए अपने वरदान का दुरूपयोग करने वाली होलिका का दहन मन से कर पा रहे हैं ? क्या आज पुराने बैर भाव को जलाने की बजाय होली बदला लेने या नशा करने का बहाना नहीं बनती जा रही है ?
बदरंग हो रही संस्कृति व मर्यादा:
क्या हम चाहते हैं कोई पड़ौसी या अजनबी हमारे घर होली पर आए ? हमारी बहनों, भाभियों या बहू बेटियों के साथ रंग खेले , उनके गालों पर गुलाल मले ? शायद नहीं । अब नहीं क्यों ? इसका जवाब भी हम जानते ही हैं । अगर होली को सच में ‘होली भाव’ यानि पावनता से से मनाने की मानसिकता हम विकसित करलें तो बहुत सी अनैतिकता की बीमारियां तो स्वयमेव ही जल जाएंगी । मगर सभ्यता, संस्कृति और सोच की मर्यादा गायब दिख रही है।
कहां गई वह होली ? :
सन् चालीस, पचास या साठ के दशक की होली की एक झलक याद करें तो वातावरण में मस्ती संस्कृति एवं प्रेम की महक महसूस करेंगे । फगवा के गीतों के नाम पर कितनी गालियां बरसती थी तब पर कोई बुरा नहीं मानता था क्योंकि तब यें प्रेमपगीगालियां मन के निर्मल गंगाजल से नहा कर आती थी । उनमें राग, द्वेष ,ईर्ष्या या अपमान का भाव नहीं,वरन् अपनापन था । जराह खुद से ही पूछ कर देखिए आखिर कहां गई वह पावन होली?
जला डालें मनोविकार:
होली जहां एक और मनोविकारों के दहन का पर्व माना जाता है वहीं ओझा, तांत्रिक व टोने -टोटके वाले भी इस दिन अपना मायाजाल फैलाते हैं । इसलिए इस दिन अपने बच्चों का ख़ास ख़्याल रखना ज़रुरी है । बेहतर हो कि होली की अग्नि में पूर्वाग्रह, प्रतिशोध, बैर भाव सहित सारे मनोविकार जला डालें
मैले होते रंग :
खेद का विषय है कि अधिकांश क्षेत्रों में होलिका का पर्व हो-हुल्लड़, हुड़दंग, हिंसा या धींगामस्ती का पर्याय बन कर रह गया है । रंगों की जगह कैमिकल्स, गोबर कीचड़ व अन्य हानिकारक पदार्थों ने होली की गरिमा को लगातार कम किया है वहीं बढ़ती शराबखोरी, भांग व ड्रग्स का इस्तेमाल इस पावन पर्व को अपवित्र कर रहा है । होली के बहाने छेड़छाछ़ व अश्लीलता पर रोक लगाने का प्रयास अगर नहीं किया गया तो होली का आनंद व पर्व दोनों ही संकट में पड़ जाएंगें ।
लौटाने होंगे वें रंग :
होली के जश्न में समय के साथ बदलाव लाने होगें , ऐसे बदलाव जिससे होली की गरिमा व रंग की मस्ती दोनों बचे रहें । होली के मान, मर्यादा व मस्ती के बीच एक संतुलन बनाना होगा।फूहड़ता, अश्लीलता,बदले की भावना छेड़खानी व नशाखोरी को होली से हटाना होगा । मनोविकारों का दहन यदि हम होली में कर पाएंगें तो फाग के रंग अपने आप ही निखर कर चारों ओर बिखर जाएंगें और होली सचमुच ही ‘होली’ यानी पावन पर्व बन जाएगा।
