अंकतालिका से रिपोर्ट कार्ड तक, क्या शिक्षा का सच बदला है?

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गजेंद्र सिंह

मार्च महीने के अंत और अप्रेल के शुरुआती सप्ताह में देशभर में बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम घोषित होने लगते है, राजस्थान बोर्ड ने भी दसवीं कक्षा का परिणाम घोषित कर दिया है। इसी तरह केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और अन्य राज्य बोर्ड के भी परिणाम घोषित होंगे । हर वर्ष की भांति यह समय भी छात्रों और परिवारों के लिए मिश्रित भावनाओं से भरा होता है, खुशी, राहत, गर्व, चिंता और कभी-कभी निराशा।
 
अधिकांश घरों में चर्चा एक ही चीज़ के इर्द-गिर्द घूमती है,  जिसे कभी अंक, कभी अंकतालिका , कभी प्रगति  और कभी प्रगति-पत्र  कहा जाता है । ये शब्द भले ही समान लगते हों, लेकिन इनके मायने काफी गहरे हैं। जब हम छोटे थे, तब वार्षिक परिणाम को “अंक” और “अंकतालिका” कहा जाता था। समय के साथ शब्द बदले—अंक “रिपोर्ट” बन गए और अंकतालिका “रिपोर्ट कार्ड” हो गई। शिक्षा विशेषज्ञ इस बदलाव को शिक्षा में एक सकारात्मक परिवर्तन के रूप में देखते हैं। वहीं, निजी शिक्षण संस्थान दावा करते हैं कि अब रिपोर्ट कार्ड में छात्र के ज्ञान, कौशल, व्यवहार और सह-शैक्षिक गतिविधियों को जोड़कर समग्र मूल्यांकन किया जा रहा है। इसे वे बाल विकास के एक व्यापक दृष्टिकोण के रूप में भी प्रस्तुत करते हैं ।
 
हकीकत, आंकड़ों और अनुभवों के आधार पर, कुछ और ही कहानी बताती है । परंपरागत रूप से हम अंकों को ही सफलता का पैमाना मानते हैं । सोचते है की अंक सटीक, मापने योग्य और तुलना करने में आसान होते हैं, इसलिए बड़े पैमाने पर मूल्यांकन के लिए सुविधाजनक हैं । अंकतालिका इन अंकों को एक आधिकारिक दस्तावेज़ के रूप में प्रस्तुत करती है। लेकिन इस संख्यात्मक व्यवस्था की एक बड़ी कीमत भी है । राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो  के अनुसार, वर्ष 2022 में कुल आत्महत्याओं में से 7.6 प्रतिशत मामले विद्यार्थियों से जुड़े थे, जिनमें 2200 से अधिक मौतें सीधे परीक्षा में असफलता से संबंधित थीं। पिछले एक दशक में विद्यार्थी आत्महत्याओं में लगभग 65 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ये केवल आंकड़े नहीं हैं, यह एक चेतावनी है। यह उस व्यवस्था का संकेत है, जिसमें अंक केवल प्रदर्शन का नहीं, बल्कि पहचान और आत्मसम्मान का आधार बन गए हैं। परिणाम के दिनों में यह दबाव और स्पष्ट हो जाता है। कई राज्यों में हेल्पलाइन कॉल्स अचानक बढ़ जाती हैं। पिछले वर्ष तमिलनाडु में कक्षा 12 के परिणाम वाले दिन कॉल्स 1800 से बढ़कर 4200 से अधिक हो गईं । यह विद्यार्थियों पर बढ़ते भावनात्मक दबाव का स्पष्ट संकेत है ।
 
रिपोर्ट कार्ड शब्द एक व्यापक और समग्र मूल्यांकन का वादा करता है। लेकिन व्यवहार में यह अक्सर केवल अंकों का ही विस्तार बनकर रह जाता है। एक राष्ट्रीय सर्वे बताता है कि हर पाँच में से एक विद्यार्थी खुद को शांत या प्रेरित महसूस नहीं करता, जिसका मुख्य कारण शैक्षणिक दबाव और भविष्य की चिंता है। कई अध्ययनों ने यह भी दिखाया है कि किशोरावस्था में अत्यधिक शैक्षणिक दबाव अवसाद, आत्म-हानि और आत्महत्या के जोखिम को बढ़ाता है।
 
असल समस्या मूल्यांकन में नहीं, बल्कि उसके एकतरफा स्वरूप में है। क्या तीन घंटे की परीक्षा किसी बच्चे की पूरी क्षमता बता सकती है? ऐसी परीक्षा मुख्यतः याददाश्त, गति और परीक्षा देने की क्षमता को मापती है । यह रचनात्मकता, संवेदनशीलता, सहयोग, नेतृत्व और समस्या-समाधान जैसी क्षमताओं को नहीं आंक पाती, जबकि जीवन में यही गुण सबसे अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। फिर भी, समाज इन्हीं परीक्षाओं को सफलता का अंतिम पैमाना मानता है। यानी, हम बच्चों को नहीं, अंकों को माप रहे हैं। वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक है। कुछ छात्र पढ़ाई में उत्कृष्ट होते हैं, तो कुछ खेलों में अपने स्कूल, जिले और देश का नाम रोशन करते हैं। कई छात्र संगीत, नृत्य, थिएटर और कला के माध्यम से अपनी पहचान बनाते हैं। कुछ में नेतृत्व और सामाजिक जिम्मेदारी की गहरी समझ होती है। इन सभी को एक प्रतिशत में समेट देना न केवल सीमित सोच है, बल्कि अन्याय भी है। प्रतिस्पर्धात्मक माहौल, जैसे कोचिंग हब और प्रतिष्ठित संस्थान इस दबाव को और बढ़ा देते हैं। पिछले दो दशकों में भारतीय प्रौद्योगिकी जैसे संस्थानों में 160 से अधिक छात्रों की मृत्यु दर्ज की गई है। यह इस धारणा को चुनौती देता है कि केवल शैक्षणिक सफलता ही संतुलित और संतुष्ट जीवन की गारंटी है।
 
अंक से प्रगति और अंकतालिका  से प्रगति-पत्र तक का यह बदलाव सतही रूप से प्रगतिशील लग सकता है, लेकिन जब तक सोच नहीं बदलेगी, तब तक इसका कोई वास्तविक प्रभाव नहीं होगा। केवल शब्द बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती । जरूरत इस बात की है कि हम सफलता की परिभाषा को नए सिरे से समझें । जहाँ पूर्णता से अधिक प्रगति को महत्व मिले, तुलना से अधिक प्रयास को सराहा जाए, और अंकों से अधिक सीखने को प्राथमिकता दी जाए । शिक्षा प्रणाली में भी बदलाव जरूरी है, जैसे निरंतर और विविध मूल्यांकन, जीवन कौशल का समावेश, और स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता को मजबूत करना । साथ ही, समाज और अभिभावकों को भी अपने सवाल बदलने होंगे—“कितने अंक आए?” से “क्या सीखा?” तक । आज जब परिणाम घोषित हो रहे हैं, यह एक अवसर है, अपनी सोच बदलने का। हमें केवल अधिक अंक लाने वाले छात्रों का ही नहीं, बल्कि हर उस छात्र का सम्मान करना चाहिए जिसने प्रयास किया, संघर्ष किया और आगे बढ़ने की हिम्मत दिखाई। अंततः, यह अंक नहीं हैं जो किसी व्यक्ति को परिभाषित करते हैं, बल्कि उसका दृष्टिकोण, उसके कौशल और उसके मूल्य हैं। एक छात्र केवल एक संख्या नहीं है। मार्कशीट उसकी क्षमता का आईना नहीं है। परिणाम जीवन का अंतिम फैसला नहीं है। और रिपोर्ट कार्ड केवल अंकों का कागज़ नहीं, बल्कि विकास की कहानी होना चाहिए। शब्द बदलना आसान है, लेकिन सोच बदलना ही असली बदलाव है।

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