एक प्रसिद्ध कहावत है, ’अपना आज संभालो, आपका कल सुरक्षित हो जाएगा। आज बूंद-बूंद घड़ा भरो, कल वह घड़ा आपके काम आएगा। जवानी संभाल कर रखो, बुढ़ापा संवर जाएगा।‘ सौ वर्ष जीने वालों के सर्वेक्षण से पता चला कि उन्होंने जवानी में भरपूर स्वास्थ्यवर्धक पौष्टिक भोजन किया, व्यायाम किया और चिंतामुक्त जीवन बिताया। जो लोग आलसी नहीं हैं, वे हर समय उत्साह से भरे रहते हैं। जो किसी न किसी कार्य में संलग्न रहते हैं वे प्रायः दीर्घजीवी होते हैं। वैसे तो, मृत्यु और जीवन का समय निश्चित है, घटाना बढ़ाना किसी के बस में नहीं लेकिन जीवन को सुंदर बनाना, सफर को सुहावना और आनन्दमय बनाना तो आपके बस में है। कोई भी बीमारी अकस्मात नहीं आती। पहले उसका कारण एवं जड़ बनती है, तभी वह पनपती है। बीमारी कभी अपने आप नहीं आती। उसे हम निमंत्रण देते हैं, तभी वह आ घेरती है। यह प्रकृति के अनुसार ही है कि ‘जीवेम शरदःशतम्‘। चलता हुआ आदमी और दौड़ता हुआ घोड़ा कभी बूढ़ा नहीं होता। आप सोएं तो सुहाने विचार ले कर, जागें तो सुनहरे सपने लेकर, जिएं तो जि़ंदादिली एवं खुशमिज़ाजी एवं खुशदिली के साथ। मन का बुढ़ापा ही तन का बुढ़ापा लाता है। मानसिक थकान से ही शारीरिक थकान आती है। मानसिक परेशानियां शरीर को जर्जर और खंडहर बना देती हैं। भोजन खाते वक्त प्रसन्न मन से एवं डूब कर खाना चाहिए। हम महंगी दवा तो खा सकते हैं परन्तु पौष्टिक भोजन नहीं खा सकते। हम सब कई बार रात का रखा भोजन प्रातः गर्म करके खाने के आदी हैं। इससे हमारी सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है क्योंकि 12 घण्टे में भोजन में रासायनिक एवं जैविक क्रियाएं संभावित हैं। चिड़चिड़ा स्वभाव, बात बात में झुंझलाना, क्रोधित होना, मीन मेख निकालना एक भयंकर रोग है। इससे जितनी जल्दी हो सके, छुटकारा पा लेना चाहिए अन्यथा जल्दी बीमारियां शुरू हो सकती हैं। हमेशा सुखद विचार, सुन्दर कल्पनाएं व उत्तम व्यवहार बनाए रखें। तन मन, घर परिवार, मित्र परिचित, सभी आपसे प्रसन्न रहेंगे। मधुर बोलें। कड़वी बात किसी के मुंह पर मत कहें। विनम्र एवं प्रसन्न रहने की आदत डालें। वैज्ञानिकों का कथन है कि यदि कुविचार दिमाग में आयें तो उनका विपरीत प्रभाव शरीर की कोशिकाओं पर जरूर पड़ता है। इसी प्रकार प्रसन्न मानसिक स्थिति का शरीर कोशिकाओं पर उचित एवं ठीक प्रभाव पड़ता है। बातूनी व्यक्तियों की अपेक्षा शांतचित्त वाले व्यक्ति दीर्घजीवी होते हैं। यह शोध का परिणाम है, अतः शांत एवं प्रसन्न रहें और दीर्घजीवी बनें।