बुढ़ापे की कुछ परेशानियां

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ज्यों ज्यों चिकित्सा की सुविधाएं  बढ़ती जा रही हैं, त्यों त्यों समाज में बूढ़ों का अनुपात भी बढ़ता जा रहा है। अतिव्यस्त जीवन में संतानों को अपने बूढ़े मां-बाप की हर जरूरत यथाविधि पूरी करने की फुरसत और सुविधा नहीं मिलती हैं? जहां पति-पत्नी दोनों नौकरी कर रहे हों वे अपने बच्चों के लिए भी पर्याप्त समय नहीं निकाल पाते। ऐसी हालत में बूढ़े मां-बाप के लिए कैसे समय निकालें?
भारतीय संस्कृति की यह विशेषता है कि संतानें अपने बूढ़े मां-बाप को उनकी इच्छा के विरुद्ध, बलपूर्वक वृद्ध सदनों में पहुंचा देने की घटनाएं बहुत कम ही होती है।
बुढ़ापे की कुछ परेशानियां हैं जिन पर घर के अन्य सदस्यों को करूणापूर्वक ध्यान देना होता है।
बुढ़ापे में तरह-तरह की बीमारियां आ जाना स्वाभाविक है। वर्तमान समाज में जीवनशैली से संबंधित बीमारियों का अधिक प्रचलन है जैसे मधुमेह, रक्तचाप, कोलस्ट्रोल इत्यादि। ये ऐसी बीमारियां हैं जिनकी विधिवत चिकित्सा अच्छे चिकित्सकों से करानी होती हैं। थोड़ी सी उपेक्षा हुई तो बीमारियां एक दम तीव्रतर हो सकती हैं। इसके परिणाम बहुत दुखद हो सकते हैं।
मेरे एक परिचित मित्र हैं जो कैमिस्ट्री के प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद एक कोचिंग सेंटर में पढ़ाते रहे। एक दिन उन्होंने बोर्ड पर कुछ लिखने के लिए चॉक उठा लेने की कोशिश की तो हाथ उठ नहीं रहा था। वे एक दम बेहोश होकर गिर गए। सहकर्मियों ने तुरंत उन्हें अस्पताल पहुंचाया पर तब तक उन्हें स्ट्रोक हो चुका था। बताया जाता है कि उस दिन सुबह वे रक्तचाप की दवा खाना भूल गए थे।
मेरे एक और परिचित व्यक्ति की बात बताऊँ? वे अपनी पत्नी के साथ सेवानिवृत्त जीवन बिता रहे थे। मधुमेह से पीडि़त थे। वर्षों से उसकी दवाई नियमित रूप से ले रहे थे। एक दिन शाम को वे टहलने गए तो अचानक बेहोश होकर सड़क की नाली में गिर गए। सौभाग्य से किसी ने उन्हें पहचान लिया और उनके पुत्र को फोन पर बुला लिया और उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया।
कहते हैं कि कुछ दिनों से उन्होंने मधुमेह की दवा खाना छोड़ दिया था। एक और मित्र ने दवा लेने में ऐसी असावधानी की थी जिसके परिणाम स्वरूप उनके दाएं पांव की उंगलियों के बीच जो छोटा सा व्रण उत्पन्न हुआ, वह तेजी से गैंगरीन में परिणित हुआ। आखिर उनका वह पांव घुटने के ऊपर से कटवाना पड़ा।
बूढ़ों की स्मृति क्षीण रहती है, अतः समय पर दवा लेना वे अक्सर भूल जाते हैं। घर के अन्य सदस्यों का यह कर्तव्य हो जाता है कि उन्हें समय पर याद दिलाएं और आवश्यक लगे तो उन्हें दवाई खिला, पिला दें।
अल्जीमर्स जैसी कुछ बीमारियां भी हैं जिनके लिए अब तक कोई असरदार दवा अविष्कृत नहीं हो पायी है। इस बीमारी से ग्रस्त रोगी अपने सगे संबंधियों का नाम तक भूल जाते हैं। अपनी प्यारी पत्नी और संतानों को कभी कभी पहचान नहीं पाते। यह भी भूल जाते हैं कि उन्होंने आज नाश्ता किया था कि नहीं। नाश्ता करने के उपरांत भी फरियाद कर सकते हैं कि मुझे नाश्ता नहीं दिया गया। कभी वे घर से निकल कर कहीं चले जाते हैं, रास्ता भटक जाता है, घर लौट नहीं पाते। ऐसे रोगियों की सेवा सुश्रूषा में घरवालों को ज्यादा कष्ट उठाना पड़ता है। मनोवैज्ञानिक ढंग से उनकी सुश्रूषा करनी होती है प्रेमपूर्वक।
बूढ़ों के भोजन के संबंध में यह ध्यान रखें कि उन्हें ठीक समय पर भोजन दें। भोजन उनके लिए हितकर हो। मधुमेह के रोगियों के लिए बिना शक्कर की चाय देनी है। उच्च रक्तचाप के रोगी को भोजन में नमक की मात्रा कम रहे। कुछ बूढ़ों को ज्यादा मिर्च लगा  भोजन अप्रिय लगता है। वे ऐसा भोजन खा ही नहीं पाते। हो सकता है घर के अन्य सभी सदस्यों को ज्यादा मिर्च लगा भोजन ही पसंद हो। ऐसी हालत में बूढ़ों के लिए विशेष रूप से कुछ पकाना पड़े तो भी उसके कारण उन पर नाराज नहीं होना चाहिए।
घर में जो अतिथि आते हैं उनसे मिलने की इच्छा कुछ बूढ़ों में हो सकती है। प्रायः बूढ़ों को किसी ऐसे तंग कमरे में रखा जाता है जहां अतिथियों को सामान्यतः प्रवेश नहीं दिया जाता। एक ऐसा परिवार भी मैंने देखा है जहां बूढ़ी माता जी को स्वच्छ वस्त्र पहना कर बैठक में ही एक आराम कुर्सी पर बिठाया जाता है और हर अतिथि से उनका परिचय प्रेम और आदर के साथ कराया जाता है।
बूढ़ों को आराम की नींद तभी मिल सकती है जब तक उनका परिवेश ध्वनि प्रदूषण से बाधित न रहे। प्रायः हमारे घरों में टीवी की ध्वनि का वोल्यूम इतना ज्यादा रखा जाता है कि समीप के कमरों में भी उसकी आवाज पहुंच जाती है। ऐसी स्थिति में बेचारे बूढ़े कैसे आराम से सो सकेंगे? यदि समीप के किसी कमरे में घर का कोई बूढ़ा पड़ा हुआ हो तो कृपया टीवी, रेडियो की ध्वनि का वोल्यूम कम रखें ताकि वे शांति के साथ सो सकें। 

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