भारत विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है और वर्ष 2023 में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के अनुसार देश की जनसंख्या लगभग 142.8 करोड़ आंकी गई, जिससे वह चीन से आगे निकल गया। यह स्थिति केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि या वैश्विक रैंकिंग का विषय नहीं है, बल्कि यह देश के संसाधनों, प्रशासनिक क्षमता, पर्यावरणीय संतुलन और सामाजिक संरचना पर गहरे प्रभाव डालने वाली वास्तविकता है। लंबे समय तक भारत में जनसंख्या वृद्धि को विकास की शक्ति और श्रमबल की उपलब्धता के रूप में देखा जाता रहा, किंतु जैसे-जैसे जनसंख्या का दबाव भूमि, जल, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं पर बढ़ा, यह स्पष्ट होता गया कि अनियंत्रित वृद्धि देश की अनेक जटिल समस्याओं को जन्म दे रही है या उन्हें और गंभीर बना रही है।
भारत में जनसंख्या वृद्धि का स्वरूप जटिल है, क्योंकि एक ओर कुल प्रजनन दर में गिरावट देखी जा रही है, तो दूसरी ओर जनसंख्या का कुल आकार इतना विशाल है कि प्रतिवर्ष करोड़ों लोगों की वृद्धि अभी भी हो रही है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार देश की कुल प्रजनन दर लगभग 2.0 के आसपास आ चुकी है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे है, फिर भी जनसंख्या कई दशकों तक बढ़ती रहेगी क्योंकि देश में प्रजनन आयु वर्ग की आबादी अत्यधिक बड़ी है। इस स्थिति को जनसांख्यिकीय जड़त्व या पॉपुलेशन मोमेंटम कहा जाता है, जिसके कारण प्रजनन दर घटने के बावजूद कुल जनसंख्या बढ़ती रहती है। यही कारण है कि भारत की समस्याओं का संबंध केवल जन्मदर से नहीं, बल्कि पहले से मौजूद विशाल जनसंख्या आधार से भी है।
भारत की आर्थिक चुनौतियों को समझने में जनसंख्या का प्रभाव सबसे स्पष्ट रूप से रोजगार क्षेत्र में दिखाई देता है। प्रत्येक वर्ष लाखों युवा कार्यबल में प्रवेश करते हैं, किंतु उद्योग, सेवा और कृषि क्षेत्र इतने रोजगार सृजित नहीं कर पाते कि सभी को समुचित अवसर मिल सके। परिणामस्वरूप बेरोजगारी और अधरोजगारी दोनों बढ़ती हैं, जिससे सामाजिक असंतोष, प्रवासन और अनौपचारिक क्षेत्र पर निर्भरता बढ़ जाती है। जब श्रम की आपूर्ति अत्यधिक हो और अवसर सीमित हों, तो मजदूरी का स्तर भी दबाव में रहता है, जिससे गरीबी उन्मूलन की गति धीमी पड़ जाती है। इस प्रकार जनसंख्या का दबाव सीधे-सीधे आर्थिक असमानता और रोजगार संकट से जुड़ जाता है।
शिक्षा व्यवस्था पर जनसंख्या वृद्धि का प्रभाव भी अत्यंत गहरा है। देश में प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक संस्थानों की संख्या में वृद्धि अवश्य हुई है, लेकिन छात्र संख्या की तुलना में संसाधन अभी भी अपर्याप्त हैं। अनेक सरकारी विद्यालयों में शिक्षक-छात्र अनुपात मानकों से अधिक है, कक्षाओं में भीड़ है और बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी रहती है। उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए प्रतिस्पर्धा इतनी तीव्र है कि लाखों योग्य छात्र सीटों के अभाव में वंचित रह जाते हैं। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत अवसरों को सीमित नहीं करती, बल्कि देश की मानव संसाधन क्षमता को भी प्रभावित करती है।
स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ती जनसंख्या का दबाव और भी स्पष्ट दिखाई देता है। अस्पतालों में भीड़, चिकित्सकों की कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और सरकारी योजनाओं के सीमित संसाधन—ये सभी समस्याएँ उस स्थिति से जुड़ी हैं जहाँ जनसंख्या वृद्धि की गति के अनुरूप स्वास्थ्य अवसंरचना का विस्तार नहीं हो पाता। भारत में प्रति हजार जनसंख्या पर चिकित्सकों और अस्पताल बेड की संख्या अभी भी विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। ऐसे में महामारी या आपात स्थितियों में स्वास्थ्य तंत्र पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, जैसा कि कोविड-19 के दौरान देखा गया था।
जनसंख्या वृद्धि का सबसे गंभीर प्रभाव पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ता है। भूमि सीमित है, लेकिन आबादी लगातार बढ़ रही है, जिससे कृषि भूमि का विभाजन होता है, शहरीकरण बढ़ता है और जंगलों पर दबाव पड़ता है। जल संसाधनों की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता पिछले दशकों में तेजी से घटी है और कई शहरों में जल संकट नियमित समस्या बन चुका है। जब अधिक लोग सीमित संसाधनों पर निर्भर होते हैं, तो पर्यावरणीय क्षरण, प्रदूषण और जैव विविधता में कमी जैसी समस्याएँ भी तीव्र हो जाती हैं।
शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धि का प्रभाव अव्यवस्थित विस्तार, झुग्गी बस्तियों की वृद्धि और बुनियादी सुविधाओं की कमी के रूप में दिखाई देता है। रोजगार और शिक्षा के अवसरों की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन बढ़ता है, जिससे शहरों की जनसंख्या उनकी नियोजित क्षमता से अधिक हो जाती है। परिणामस्वरूप सड़कों पर भीड़, सार्वजनिक परिवहन पर दबाव, कचरा प्रबंधन की समस्या और आवास संकट जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। यह केवल शहरी प्रशासन की विफलता नहीं, बल्कि जनसंख्या और संसाधनों के असंतुलन का प्रत्यक्ष परिणाम है।
भारत में गरीबी और जनसंख्या वृद्धि के बीच गहरा संबंध है। जिन परिवारों की आय कम होती है, उनमें बच्चों की संख्या अधिक होने की प्रवृत्ति लंबे समय तक देखी गई है, जिससे संसाधनों का विभाजन और भी अधिक हो जाता है। हालांकि हाल के वर्षों में शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और परिवार नियोजन कार्यक्रमों के कारण यह प्रवृत्ति बदल रही है, फिर भी कुछ क्षेत्रों में उच्च जन्मदर अभी भी सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन से जुड़ी हुई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जनसंख्या नियंत्रण केवल स्वास्थ्य या परिवार नियोजन का विषय नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक विकास का प्रश्न भी है।
यह भी सत्य है कि जनसंख्या को केवल समस्या के रूप में देखना पूर्णतः उचित नहीं है। विशाल जनसंख्या भारत के लिए एक संभावित जनसांख्यिकीय लाभांश भी है, क्योंकि देश में कार्यशील आयु वर्ग की संख्या बड़ी है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भारत की लगभग 68 प्रतिशत आबादी 15 से 64 वर्ष के बीच है, जो आर्थिक विकास के लिए अनुकूल स्थिति मानी जाती है। किंतु यह लाभांश तभी वास्तविक संपदा बन सकता है जब शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हों। अन्यथा यही युवा जनसंख्या सामाजिक असंतोष और आर्थिक दबाव का कारण बन सकती है।
भारत सरकार ने 1950 के दशक से ही परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू कर दिए थे और समय-समय पर विभिन्न नीतियों के माध्यम से जनसंख्या स्थिरीकरण का प्रयास किया गया। राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 का उद्देश्य वर्ष 2045 तक जनसंख्या को स्थिर स्तर पर लाना था। इसके अंतर्गत गर्भनिरोधक साधनों की उपलब्धता, महिलाओं की शिक्षा, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और विवाह की न्यूनतम आयु के पालन जैसे उपाय शामिल किए गए। इन प्रयासों का प्रभाव यह हुआ कि पिछले दो दशकों में जन्मदर और प्रजनन दर में उल्लेखनीय कमी आई है, जो यह दर्शाता है कि सामाजिक विकास और जनसंख्या नियंत्रण के बीच सीधा संबंध है।
फिर भी यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जा सकता कि भारत की वर्तमान अनेक समस्याएँ—जैसे बेरोजगारी, पर्यावरणीय दबाव, शहरी अव्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य पर बोझ—जनसंख्या के आकार और उसके असंतुलित वितरण से गहराई से जुड़ी हुई हैं। यदि किसी देश की जनसंख्या उसकी आर्थिक, भौगोलिक और प्रशासनिक क्षमता से अधिक गति से बढ़ती है, तो विकास की उपलब्धियाँ भी प्रति व्यक्ति स्तर पर कम प्रभावी दिखाई देती हैं। यही कारण है कि सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि के बावजूद प्रति व्यक्ति आय और जीवन स्तर में अपेक्षित सुधार सभी तक समान रूप से नहीं पहुंच पाता।
समाधान के रूप में केवल कठोर जनसंख्या नियंत्रण कानूनों की मांग करना सरल प्रतीत हो सकता है, किंतु अनुभव बताता है कि स्थायी और मानवीय समाधान शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, महिला सशक्तिकरण और आर्थिक अवसरों के विस्तार से ही संभव है। जिन राज्यों में महिला साक्षरता, शहरीकरण और स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर हैं, वहाँ जन्मदर स्वाभाविक रूप से कम हुई है। यह संकेत देता है कि जब परिवारों को यह विश्वास होता है कि कम बच्चों के साथ भी उनका भविष्य सुरक्षित रहेगा, तब वे स्वेच्छा से छोटे परिवार को अपनाते हैं।
अंततः यह निष्कर्ष निकलता है कि भारत की अनेक संरचनात्मक समस्याओं के पीछे जनसंख्या का दबाव एक महत्वपूर्ण कारक रहा है, यद्यपि वह अकेला कारण नहीं है। शासन की गुणवत्ता, संसाधनों का वितरण, आर्थिक नीतियाँ और सामाजिक असमानता जैसे अन्य तत्व भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। फिर भी यदि जनसंख्या वृद्धि को संतुलित और नियंत्रित नहीं किया गया, तो विकास की गति चाहे जितनी भी तेज क्यों न हो, उसका लाभ प्रति व्यक्ति स्तर पर सीमित ही रहेगा। इसलिए आवश्यक है कि जनसंख्या संबंधी विमर्श को भावनात्मक या राजनीतिक मुद्दा बनाने के बजाय उसे वैज्ञानिक, मानवीय और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से समझा जाए और उसी के अनुरूप नीतियाँ बनाई जाएँ, ताकि देश की विकास यात्रा संसाधनों और जनसंख्या के बीच संतुलन स्थापित करते हुए आगे बढ़ सके।
डॉ. शैलेश शुक्ला
