हमारा भारत विश्व के उन गिने चुने देशों में से एक देश है जहां वर्ष में छः ऋतुएं हुआ करती हैं। हर ऋतु अपने-अपने गुण-धर्म के अनुसार प्राणियों के तन और मन पर प्रभाव डाला करती हैं। इसलिए हमारे आयुर्वेदाचार्यों ने अपने-अपने ग्रंथों में हर ऋतु के पथ्यापथ्य का निरूपण किया है।
जो व्यक्ति ऋतुओं के अनुसार पथ्यापथ्यों का पालन करता है वह निश्चित रूप से निरोगता को धारण करता है तथा जो व्यक्ति जाने या अनजाने में ऋतु धर्म के विपरीत रसों का सेवन करता है, वह चाहे कितना ही बलवान क्यों न हो, अपने स्वास्थ्य को हानि पहुंचाता है।
शीतकाल में गरिष्ठ और भारी पदार्थों का सेवन बल को प्रदान करता है तो ये ही पदार्थ बसन्त, गर्मी और वर्षां में स्वास्थ्य को हानि पहुंचाते हैं। इसी प्रकार शीतकाल में कड़वे और कसैले पदार्थ हानिकारक होते हैं तो बसन्त ऋतु में कड़वे और कसैले पदार्थ लाभदायक बन जाते हैं। हां, प्रत्येक रस का
अपने शरीर के बलाबल और रूचि से अधिक सेवन करना भी हानिकारक होता है
दोषों का कोप और शमन:-
आयुर्वेद और हकीमात के अनुसार हमारे शरीर को धारण करने वाले तीन दोष हैं वात या वायु (सफरा), पित्त (सोदा) और कफ (बलगम)। इन्हें धातु भी कहा जाता है।
आचार्य बंगसेन के मतानुसार वात वर्षा, हेमन्त और शिशिर ऋतु में कुपित होता है। पित्त शरद और ग्रीष्म ऋतु में कुपित होता है और कफ बसन्त ऋतु में कुपित हुआ करता है।
आचार्य सुश्रुत के अनुसार पित्त के कोप से होने वाले रोगों की शांति हेमन्त ऋतु में अपने आप हो जाया करती है तो कफ रोगों की शान्ति ग्रीष्म ऋतु में और वात यानी वायु के रोगों की शांति शरद ऋतु में हो जाती है।
वर्ष का ऋतु ज्ञान
हमारे भारत का ऋतु चक्र दो भागों में बंटा हुआ है ;1, भारत का यह भाग विशेष कर उत्तरी भारत जहां वर्ष में लगभग चार माह का शीतकाल होता है. वहां बसंत ऋतु चैत्र बैसाख में आती है। ;2. भारत का दक्षिणी भाग जहां वर्षा की दो ऋतुएं हुआ करती हैं। यहां बसंत ऋतु 19 फरवरी से 19 अप्रैल तक रहती है।
विशेष
पृथ्वी परिक्रमण के हिसाब से तो ऋतुओं का गमनागमन उपरोक्त सारणियों के अनुसार ही होता है पर कुछ कारणों से किसी भाग या क्षेत्र का ऋतु चक्र 10-20 दिन आगे हो जाया करता है अतः ऋतु के आहार-विहार को धारण करते समय अपने निवास के वातावरण, आबो-हवा को विशेष महत्त्व दिया जाना चाहिए।
बसंत की महिमा
वर्ष की छः ऋतुओं में बसंत और शरद दोनों ही ऋतु श्रेष्ठ मानी गई हैं। वैसे तो दोनों ही ऋतुएं प्राणियों-जड़ और चेतन के लिए सुखद रहती हैं पर बसंत के तो नाम की महिमा ही निराली है, जैसे बयारों के बासंती प्राणियों को बल प्रदान कराने वाली दक्षिणानल बयार, रंगों में बासंती रंग देखने मात्रा से ही सुख और बल प्रदान कराने वाला रंग, रागों में बसंत राग कानों को सुखद और मन को खिला देने वाला एक राग तो औषधियों में बसंत मालती जैसी बल प्रदान कराने वाली औषधि प्रसिद्ध है।
आयुर्वेद में भी बसंत ऋतु को सर्वश्रेष्ठ ऋतु माना गया है क्योंकि यह ऋतु प्राणियों में बल और सौन्दर्य कान्ति दोनों ही प्रदान कराती है पर इसके लिये इस ऋतु के पथ्य को धारण किया जाए और सौन्दर्य प्रदान कराने वाले आयुर्वेदिक योगों का प्रयोग किया जाए।
बसंत के पथ्यापथ्य
बसंत ऋतु में सूर्य की गर्मी के कारण कफ पिघलकर कुपित हो जाया करता है अतः रोगियों को अपने स्थानीय कुशल वैद्य या हकीमों की देख-रेख में तीक्ष्ण वमन व विरेचन द्वारा कफ को निकलवा देना चाहिये तथा कफ को सुख देने के लिये उचित मात्रा में कड़वे पदार्थों का सेवन और उबटन करना चाहिए।
बसंत में पुराने जौ, गेहूं, चावल तथा चने का प्रयोग करना चाहिए। बसंत में कचनार की फली, सहजन का साग, मेथी, बथुआ, चैलाई, लौकी, बैंगन, घीया या तुरई, मूली, पेठा, परवल, अदरक और मसूर की दाल हितकारी रहती है।
बसंत ऋतु में खट्टी, चिकनी और पचने में भारी वस्तुओं और दिन में सोने को त्याग देना चाहिए। इसके अलावा रबी फसल में पैदा हुए सभी ताजा अन्नों, बाजरा, उड़द, गुड़, भैंस का दूध, दही, खिचड़ी, चिवड़ा, आलू, सिंघाड़ा, सावां, पोई, बड़ी प्याज और नाड़ीशाकों का भी कम से कम प्रयोग करना चाहिए। मांसाहारियों को भेड़ व मुर्गे का मांस त्याग देना चाहिए। बसंत में अधिक मीठी वस्तुओं का सेवन करना भी हानिकारक रहता है अतः मीठे रसों का कम से कम प्रयोग करें।
बल और सौन्दर्य के लिये
वैसे तो बसंत अपने गुण-धर्मों के अनुसार प्राणियों को अपने आप ही बल और सौन्दर्य प्रदान करता है। यदि बसंत ऋतु में बल और सौन्दर्य को बढ़ाने के लिए कुछ उपयुक्त योग अपनाया जाये तो उसमें चार चांद लग जाया करते हैं।
