गत अक्तूबर माह में एक प्रतिनिधि मंडल संग मॉरीशस जाना हुआ। यूं तो इससे पूर्व भी दुनिया के अनेक देशों में जाने का अवसर मिला लेकिन मॉरीशस रवाना होते हुए विदेश नहीं बल्कि अपनों से मिलने की अनुभूति हो रही थी क्योंकि वह भारतवंशियों का देश है। भारतवंशियों ने अपने पुरुषार्थ से न केवल उस धरती को स्वर्ग बनाया बल्कि पर्याप्त यश भी अर्जित किया।
गंगा सा पवित्रा अपनत्व मॉरीशस की विशेषता है। उस धरती को प्रणाम करने और अपने बन्धुओं की यशोगाथा को बार-बार सुनने के बाद स्वयं अपनी आंखों से देखने, अनुभव करने के इस अवसर पर गौरवान्वित महसूस करते हुए दिल्ली के इन्दिरा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट के टर्मिनल-3 से प्रातः 8 बजे एयर मॉरीशस की फ्लाइट पर सवार हुए।
साढ़े सात घंटे की सुखद यात्रा के बाद पोर्ट लुई के सर शिवसागर रामगुलाम अन्तर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट पर पहुंचे। दिल्ली के एयरपोर्ट के मुकाबले काफी छोटा। मात्र कुछ विमान ही वहां खड़े दिखाई दिये। औपचारिकताओं में भी अधिक समय नहीं लगा क्योंकि हर काउंटर पर हमारे ही साथी थे। यहां और भारतीय समय में डेढ़ घंटे का अंतर।
बाहर निकले तो अनेक मित्रों संग रिमझिम फुहार ने स्वागत किया। हमें ली ग्रान्ड ब्लयू होटल ले जाने के लिए वाहन तैयार थे। एयरपोर्ट दक्षिणी छोर पर तो हमारा होटल उत्तर में समुद्र के बिलकुल पास था। लगभग 40 किमी की दूरी तय करते हुए पहली नजर में मॉरीशस साफ सुथरा, सड़कें ओमपुरी नहीं, सचमुच हेमामालिनी के गाल जैसी दिखी। गन्ने के देश में चारों ओर हरियाली। होटल में भी पूरी तरह से प्राकृतिक वातावरण। बढि़या हिंदी बोलते भारतीय मूल के भले लोग। रात्रि में सुन्दर भोजन, घर जैसा अपनापन।
अगली सुबह जल्दी समुद्र की ओर सैर के लिए जाना हुआ। बहुत खुशनुमा मौसम, हल्की सर्दी, तट पर नारियल के घने ऊंचे पेड़, विस्तृत नीले समुद्र में कहीं-कहीं काली पत्थर की चट्टानें आकर्षित कर रही थी। समुद्र तट पर सफेद रेत। कहीं-कहीं शंख, सिप्पी भी। दूर से हड्डियों जैसे दिखाने वाले क्रीम रंग के पतले- कमजोर पत्थरों के ढेर भी। वहां से लौटकर स्नान और फिर यज्ञ। होटल में बनी एक विशाल कुटिया में प्रतिदिन यज्ञ की व्यवस्था थी। साढ़े आठ बजे होटल के विशाल डाइनिंग हाल में नाश्ता, फल, ब्रेड-बटर, जैम, दूध, दही के अतिरिक्त राजमा, पूरी भी।
लगभग 10 बजे मुद्रा विनिमय (आश्चर्य कि मॉरीशस रुपये का मूल्य भारतीय रुपये से लगभग दुगना है) मॉरीशस में 25 रुपये का नोट चलन में है तो 200 और 2000 का भी। नये नोट प्लास्टिक के हैं तो पुराने हमारी तरह कागज के ही लेकिन वहां पैसे को सेन्ट कहा जाता है। प्रथम दिवस अनेक समुद्र तटों का अवलोकन। एक स्थान पर अम्बरीश जी ने समुद्र में डूबी रेल की पटरी की ओर ध्यान आकर्षित किया जो ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव था। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, बढ़ती जनसंख्या से बिगड़ते पर्यावरण के कारण केवल मॉरीशस में ही नहीं, हमारे समुद्र तटों को भी खतरा बढ़ रहा है। विशेषज्ञ जिस ग्लोबल वार्मिंग को मुंबई सहित अनेक नगरों के अस्तित्व के लिए खतरा बताते हैं, उसका साक्षात्कार समुद्र में डूबी रेल की वह पटरी करा रही थी।
वहां से हम एक मॉल का अवलोकन करते हुए बोटानिकल गार्डन पहुंचे। द्वार से 200 रूपये का टिकट लेकर विशाल गार्डन में प्रवेश हुआ। अनेक प्रकार के विशाल वृक्ष। कुछ तो सैकड़ों वर्ष पुराने भी। कुछ की जड़ें इतनी विशाल और अजीब आकृतियों वाली कि आँखें फटी रह गई। विशेष बात यह कि इस बाग में एक ऐसा पेड़ है जो साठ से सत्तर साल में एक बार फूलता है और इस का नाम ‘तालीपो’ है।
एक स्थान पर विशाल कछुए थे। भारत में पाये जाने वाले कछुओं से बिलकुल भिन्न, आकार में किसी बछड़े से बिल्कुल कम नहीं लेकिन वजन निश्चित रूप से उससे भी अधिक। चाहें तो सवारी भी कर सकते हैं। एक बाड़े में कुछ बारहसिंघे विचरण कर रहे थे। इसी गार्डन में मॉरीशस के राष्ट्रपिता सर शिवसागर रामगुलाम की समाधि है जिसपर पत्थर का विशाल कमल बना है तो देवनागरी लिपि में लिखा है- ‘राष्ट्रपिता की पुण्यस्मृति में’।
इसी गार्डन के छोर पर गन्ने के देश मॉरीशस में स्थापित प्रथम शुगर मिल की मशीनें प्रदर्शित की गई थी। अनेक घंटे इस मनोहर पार्क में बिताने के बाद थके हुए हम अपने होटल की ओर रवाना हुए। रास्ते में हर तरह गन्ने के खेत तो कुछ स्थानों पर अनन्नास की फसल देखने को मिली।
यहाँ का यातायात अनुशासन प्रशंसनीय है। कहीं कोई हड़बड़ाहट नहीं, कोई आगे निकलने की होड़ नहीं, लाल बत्ती उल्लंघन नहीं। यहाँ तक कि दूसरी तरफ की सड़क खाली हो, तब भी चुपचाप लाइट ग्रीन होने का इन्तजार। खास बात यह कि पुलिस की उपस्थिति भी न के बराबर। कहीं कोई हार्न नहीं बजाता, सामने वाहन आते देख उसे पहले निकलने का संकेत। एक स्थान पर ट्रैफिक जाम दिखा लेकिन आश्चर्य कि दूसरी ओर की सड़क खाली होते हुए भी कोई भी हम भारतीयों की तरह ‘पूर्ण’ जाम का कारण नहीं बना, इसलिए कुछ मिनटों में स्थिति सामान्य हो गई।
यातायात प्रबंधन के लिए अति आधुनिक संसाधनों की मदद ली जाती है जैसे स्थान-स्थान पर कैमरे लगे होना, सड़क विस्तार अथवा मरम्मत वाले स्थान पर विशेष व्यवस्था। मॉरीशस पुलिस की वर्दी भी हमसे भिन्न है। खाकी के स्थान पर आसमानी रंग की कमीज तो नेवी ब्ल्यू रंग की पैंट, इसी रंग की कैप, रात्रि में दूर से चमकने वाली बेल्ट। कारों की भरमार है परंतु दोपहिया वाहन यहां बहुत कम हैं। दोपहिया पर दोनों सवारियों के लिए हेल्मेट जरूरी है तो अंधेरे में दूर से चमकने वाली क्रास बेल्ट भी। मजाल कि कोई नियम का उल्लंघन करने की सोचे भी। एक मित्र हमसे मिलने आए तो उन्होंने त्रियोले स्थित सर्वोदय आश्रम और ऐतिहासिक शिव मंदिर चलने का आग्रह किया। उनके साथ चलने को तैयार हुआ लेकिन उन्होंने दूसरे हेल्मेट की व्यवस्था करने के बाद ही बाइक पर बैठाया।
इतनी ही नहीं, अपने दो सप्ताह के प्रवास के दौरान हमें कहीं भी कोई नशे में ‘टुल’ नहीं मिला- न झूमना, न हंगामा, न सड़क पर लेटना। हाईवे किनारों पर दुनिया भर की तरह विशाल होर्डिंग तो हैं लेकिन हमारे तथाकथित ‘सुसंस्कृत’ विज्ञापनों से पूरी तरह अलग। कहीं भी नारी देह नहीं। सब शालीन, स्पष्ट। यह सब देख हृदय गद्-गद् हो उठा। आखिर यह जरुरी हो कि लघु भारत ही भारत से सीखेगा। क्या बड़ा भाई छोटे भाई कुछ नहीं सीख सकता? क्या भारत को एक विशाल मॉरीशस नहीं बनाया जा सकता?
भारत से दूरी 5815 किमी है। हिन्द महासागर भारत और मारीशस को जोड़ता है। छोटे चमकदार मोती जैसा प्राकृतिक सौंदर्य का पर्याय है यह देश है। चारों ओर समुद्र घिरा हुआ। हर तरफ हरियाली ही हरियाली। नारियल के पेड़ों के झुण्ड हैं तो चीड़ के पेड़ भी बहुत हैं।
हर समुद्र तट विशेषता लिए हुए। बिलकुल साफ चमकदार पारदर्शी है समुद्र का पानी, सफेद रेत। मजेदार बात यह है कि यहाँ न तो कोई जहरीले जीव जंतु (सांप, बिच्छु आदि) हैं और न ही शेर, चीते जैसे हिंसक जीव लेकिन एक बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि नारियल पानी का स्वाद हमारे यहाँ से बिलकुल कुछ अलग, लगभग फीका सा है। पहली बार ऐसा महसूस हुआ मानो सादा पानी पी रहे हों।
