सीओपी31 सभी के हित में काम करे: ऑस्ट्रेलियाई राजदूत ग्रीन

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नयी दिल्ली, 22 मार्च (भाषा) भारत में ऑस्ट्रेलिया के उच्चायुक्त फिलिप ग्रीन ने कहा कि उनका देश अपने प्रशांत पड़ोसी देशों के साथ तो मजबूती से खड़ा ही है, साथ ही भारत जैसे अहम साझेदारों को भी सक्रिय रूप से जोड़ रहा है, ताकि ‘यूएन कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज’ (सीओपी) सभी देशों के हितों के अनुरूप काम करे।

31वां यूएन कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (सीओपी31) तुर्किये के अंताल्या में आयोजित होने वाला है, जहां ऑस्ट्रेलिया वार्ता प्रक्रिया की अध्यक्षता करेगा।

ग्रीन ने ‘पीटीआई वीडियो’ से कहा कि संयुक्त राष्ट्र की जलवायु वार्ताएं ऑस्ट्रेलिया के लिए घरेलू स्तर पर भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं, जितनी उसके निकटवर्ती क्षेत्र ‘प्रशांत द्वीप देशों’ के लिए। यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया आगामी ‘प्री-सीओपी’ बैठकों में भारत जैसे देशों की भागीदारी सुनिश्चित करने के प्रयास कर रहा है।

ये बैठकें फिजी और तुवालु जैसे प्रशांत देशों में होंगी, जिनके बाद तुर्किये में शिखर सम्मेलन आयोजित किया जाएगा।

ग्रीन ने कहा, “ऑस्ट्रेलिया अपने प्रशांत पड़ोसी देशों के समर्थन में बड़े सोच-समझकर आगे बढ़ रहा है और भारत जैसे अहम देशों के साथ सक्रिय संवाद कर रहा है ताकि संयुक्त राष्ट्र का ‘कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज’ (सीओपी) सबके हित में काम करे।’’

जब उनसे यह पूछा गया कि दुनिया के प्रमुख जीवाश्म ईंधन निर्यातकों में शामिल होने के बावजूद ऑस्ट्रेलिया सीओपी-31 की वार्ताओं का नेतृत्व कैसे करेगा, तो ग्रीन ने स्पष्ट किया कि उनका लक्ष्य ऐसा ठोस और व्यावहारिक परिणाम सुनिश्चित करना है जो जलवायु परिवर्तन से निपटने के रास्ते तय करे और वे रास्ते हर देश की परिस्थितियों, चुनौतियों और ‘नेट-जीरो’ तक पहुंचने की अलग-अलग रणनीतियों के अनुरूप हों।

‘नेट जीरो’ उत्सर्जन का मतलब है कि कोई देश जितना कार्बन उत्सर्जन करता है, उतना ही कार्बन खत्म करने की व्यवस्था भी करे। नेट जीरो का मतलब यह नहीं है कि कार्बन का उत्सर्जन शून्य हो जाएगा।

उन्होंने पीटीआई से कहा, “ऑस्ट्रेलिया जलवायु संरक्षण कार्य के महत्व में गहरा विश्वास रखता है। घरेलू स्तर पर हमने लक्ष्य तय किया है कि 2030 तक हमारे राष्ट्रीय ग्रिड की 80 प्रतिशत बिजली नवीकरणीय स्रोतों से आएगी। 2050 तक ‘नेट-ज़ीरो’ हासिल करने का हमारा संकल्प है और 2035 के लिए भी हमने अपेक्षाकृत अग्रिम और महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए हैं।”

सीओपी की अध्यक्षता संयुक्त राष्ट्र के पांच मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय समूहों के बीच क्रमवार बदलती रहती है-अफ्रीकी समूह, एशिया-प्रशांत समूह, पूर्वी यूरोपीय समूह, लातिन अमेरिका और कैरेबिया समूह (ग्रुलैक) तथा पश्चिमी यूरोपीय और अन्य समूह (डब्ल्यूईओजी)।

‘यूनाइटेड नेशन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज’ (यूएनएफसीसीसी) के मसौदा प्रक्रिया नियम सीओपी अध्यक्षता के लिए औपचारिक ढांचा तो प्रदान करते हैं, लेकिन इनमें ‘प्रेसिडेंट ऑफ नेगोशिएशंस’ जैसी कोई अलग पदवी निर्धारित नहीं है।

हालांकि, सीओपी-31 के लिए तुर्किये और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक द्विपक्षीय व्यवस्था की गई है, जिसके तहत तुर्किये औपचारिक रूप से सीओपी की अध्यक्षता संभालेगा, जबकि वार्ताओं का नेतृत्व ऑस्ट्रेलिया ‘प्रेसिडेंट ऑफ नेगोशिएशंस’ के रूप में करेगा।

‘फॉसिल फ्यूल ट्रिटी’ के निदेशक एलेक्स रफालोविच ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “यूएनएफसीसीसी के पास मेजबान चुनने के लिए कोई विशेष मानदंड नहीं हैं, और 2021 के बाद से अधिकांश मेजबान देश जीवाश्म ईंधन निर्यातक रहे हैं। इससे वार्ताओं के नतीजे उद्योग के पक्ष में ज्यादा दिखाई देते हैं।”

उन्होंने कहा कि यदि ऑस्ट्रेलिया जलवायु वार्ताओं के नेतृत्व को विश्वसनीय बनाना चाहता है, तो उसे कोयला और गैस निर्यात से होने वाले नुकसान पर भी गंभीरता से ध्यान देना होगा।

रफालोविच ने कहा, “अल्बनीज (प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज) की सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन वार्ताओं की मेजबानी के लिए जोरदार पैरवी की और अपनी दावेदारी इस आधार पर रखी कि वह प्रशांत क्षेत्र के देशों की सहयोगी है। लेकिन इसी दौरान उसने 35 कोयला और गैस परियोजनाओं या उनके विस्तार को मंजूरी भी दी।”

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