23 मार्च 1931 को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को वैज्ञानिक समाजवादी दिशा देने के लिए संघर्षरत तीन महान क्रांतिकारियों—भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव—को अंग्रेजी सरकार ने लाहौर की केंद्रीय जेल में फांसी पर लटका दिया। आज लगभग एक सदी बीत जाने के बाद भी इन शहीदों को पूरी दुनिया में याद किया जाता है। इनमें भगत सिंह का नाम सबसे प्रमुख रूप से लिया जाता है।
प्रश्न उठता है कि लगभग सौ वर्ष बाद भी भगत सिंह इतने लोकप्रिय क्यों हैं? उनका हमारे वर्तमान जीवन से क्या संबंध है? क्या उनके विचार आज की व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याओं के समाधान में कोई मार्गदर्शन देते हैं?
इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए हमें भगत सिंह के दर्शन को समझना होगा। जब हम दर्शन जैसे गंभीर विषय पर विचार करते हैं, तभी यह स्पष्ट होता है कि आज की कई समस्याओं के समाधान की दिशा भगत सिंह के विचारों में ही निहित है।
मानव सभ्यता के प्रारंभ से ही मनुष्य ने समस्याओं का सामना करना और उनके समाधान खोजना सीखा है। प्रारंभिक काल में मनुष्य का जीवन सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे उसने उपकरण बनाए, प्रकृति को समझा और अपने जीवन को अधिक व्यवस्थित और सरल बनाया। आज मानव जीवन वैश्विक हो चुका है। दुनिया के एक हिस्से की घटना दूसरे हिस्से को प्रभावित करती है, क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था वैश्विक रूप से जुड़ी हुई है।
आज उत्पादन, वितरण, विनिमय और उपभोग की लगभग सभी आर्थिक गतिविधियाँ विश्व स्तर पर आपस में जुड़ी हुई हैं। अमेरिका में बने ट्रैक्टर, जापान की तकनीक, चीन और कोरिया के संचार साधन, रूस व अरब देशों का तेल और विभिन्न देशों की सांस्कृतिक-आर्थिक गतिविधियाँ—सब मिलकर आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण करती हैं और हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं। इसलिए इन गतिविधियों के प्रभाव भी वैश्विक होते हैं।
जब समस्याएँ पैदा होती हैं तो उनका समाधान खोजना भी मानव सभ्यता की विशेषता है। प्रारंभिक काल में मनुष्य प्राकृतिक शक्तियों को ही अपने सुख-दुख का कारण मानता था और उनकी पूजा करता था लेकिन जैसे-जैसे समाज और अर्थव्यवस्था विकसित हुई, समाज में वर्गों का निर्माण हुआ। कुछ वर्ग आर्थिक संसाधनों पर अधिकार रखने लगे और कुछ वर्ग उनसे वंचित रह गए। तब दार्शनिकों ने सामाजिक समस्याओं के कारणों को इन वर्गीय संबंधों में खोजने का प्रयास किया।
यहीं से दर्शन की दो प्रमुख धाराएँ सामने आती हैं।
पहली धारा विचारवाद (Idealism) की है, जो मानती है कि इस संसार की रचना किसी विचार या परम शक्ति ने की है और वही मनुष्य के सुख-दुख का कारण है।
दूसरी धारा पदार्थवाद (Materialism) की है जो कहती है कि संसार अनंत और गतिशील भौतिक प्रक्रियाओं का परिणाम है। सामाजिक समस्याओं का कारण भी भौतिक परिस्थितियों में ही निहित है और इन परिस्थितियों को राजनीतिक रूप से बदलकर ही जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है।
आधुनिक वैज्ञानिक दर्शन, ‘भौतिकवाद-द्वंद्वात्मक’ है, जिसके अनुसार परिस्थितियाँ ही विचारों को जन्म देती हैं और फिर वही विचार मनुष्य के माध्यम से परिस्थितियों को बदलने का काम करते हैं, अर्थात मनुष्य सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष के माध्यम से व्यवस्था को बदल सकता है।
भगत सिंह इसी ‘भौतिकवादी-द्वंद्वात्मक’ दर्शन से प्रभावित थे। उन्होंने विश्व इतिहास, विशेषकर आयरिश क्रांतिकारी और रूसी क्रांति का अध्ययन किया। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में चाफेकर बंधुओं, काकोरी कांड और कूका आंदोलन जैसे संघर्षों का भी विश्लेषण किया। उस समय रूस में समाजवादी क्रांति हो चुकी थी और उसके परिणाम पूरी दुनिया के सामने थे।
अपने अध्ययन के आधार पर भगत सिंह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भारत की सामाजिक समस्याएँ—जैसे जातीय उत्पीड़न, गरीबी और बेरोजगारी—तथा विश्व स्तर पर उत्पन्न आर्थिक संकटों का मूल कारण पूंजीवादी व्यवस्था है।(उस समय तीसा की वैश्विक मंदी छाई हुई थी)। पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन के साधन—जैसे कृषि, कारखाने और उद्योग—कुछ पूंजीपतियों के हाथों में केंद्रित होते हैं, जबकि साधन विहीन विशाल मेहनतकश वर्ग केवल अपनी श्रम शक्ति का ही मालिक होता है। केवल अपनी श्रम शक्ति को बेचकर ही जिंदा रह सकता है। उत्पादन के साधनों का मालिक बुर्जुआ वर्ग उसकी मेहनत का शोषण करके ही फल फूल सकता है। द्वंद्व के रूप में यही प्रोलिटेरिएट वर्ग नई समाजवादी समाज का निर्माता भी होता है।
क्योंकि पूंजीपति वर्ग का मुनाफा मजदूरों के श्रम के शोषण पर आधारित होता है। अधिक मुनाफा कमाने के लिए पूंजीपति नई तकनीकों का उपयोग करते हैं, लेकिन उसका लाभ समाज के बजाय केवल अपने हितों के लिए उठाते हैं।
पूंजी भी अपना विकास करते हुए रूप तथा चरित्र बदलती है। पूंजी का आरंभिक रूप व्यापारिक पूंजी था फिर औद्योगिक पूंजी तथा पिछली सदी के आरंभ में इसने वित्तीय पूंजी का रूप धारण कर लिया जिसको लेनिन ने ‘पूंजी का प्रवाह’ तथा ‘पूंजीवाद की चरम अवस्था- साम्राज्यवाद’ नामक रचना में स्पष्ट लिखा।
वर्तमान दौर में भी वित्तीय पूंजी ही दुनिया पर शासन कर रही है। वित्तीय पूंजी तभी जिंदा रह सकती है जब उसको कर्ज लेने वाले ग्राहक मिलें। ग्राहक पैदा करने के लिए राजनीतिक कानूनों के माध्यम से शिक्षा, चिकित्सा , मूलभूत आवश्यकताओं को महंगा कर लोगों को कर्ज लेने के लिए मजबूर किया जाता है जिसका परिणाम आज हम देख रहे हैं कि समाज का अधिकांश भाग कर्ज से पीड़ित है । कर्ज तथा ब्याज चुकाने की असमर्थता आत्महत्या तथा अपराध की ओर धकेल रही है दूसरी तरफ पूंजी कर्ज देने के लिए उनके दरवाजे पर हर रोज निरंतर दस्तक दे रही है और उसे कर्ज के जाल में फसाने के हर प्रकार के प्रयास कर रही है। उस कर्ज के बोझ की छटपटाहट पूरे समाज में देखी जा सकती है। परिणामस्वरूप एक ओर पूंजी का केंद्रीकरण होता है और दूसरी ओर बेरोजगारी और गरीबी, असमानता बढ़ती चली जाती है।
इतिहास में हम देख चुके हैं कि अपने बाजारों और मुनाफे को बचाने और विस्तार करने के लिए पूंजीवादी शक्तियाँ युद्धों तक का सहारा लेती हैं। भगत सिंह के समय का प्रथम विश्व युद्ध तथा बाद का द्वितीय विश्व युद्ध और आज तक लगने वाले विभिन्न देशों के बीच तथा वर्तमान यूक्रेन रूस और अरब-इजराइल युद्ध भी इसी के उदाहरण हैं।
आज भी वैश्विक स्तर पर वित्तीय पूंजी का प्रभुत्व दिखाई देता है, जो अपने मुनाफे को बनाए रखने के लिए युद्ध, आर्थिक संकट और पर्यावरणीय विनाश जैसी स्थितियाँ पैदा कर रहा है।
भगत सिंह ने अपने लेख “क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा” जो उनका घोषणा पत्र कहा जा सकता है, में इन समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत किया। उन्होंने युवाओं और विद्यार्थियों से आह्वान किया कि केवल सत्ता परिवर्तन से समस्याएँ हल नहीं होंगी, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन आवश्यक है। उनका मानना था कि पूंजीवाद के स्थान पर ऐसी समाजवादी व्यवस्था स्थापित की जानी चाहिए जिसमें उत्पादन के साधनों का समाजीकरण हो और उत्पादन का वितरण समाज की आवश्यकताओं के अनुसार हो।
उन्होंने शिक्षा के सार्वजनिककरण, सामंती अवशेषों के अंत और श्रमिकों के लिए “आवश्यकतानुसार कार्यदिवस की सीमा को नयूनतर” करने की बात कही। उनका विचार था कि तकनीकी प्रगति का लाभ समाज के सभी लोगों को मिलना चाहिए।
आज की परिस्थितियों में भी यह विचार अत्यंत प्रासंगिक है। यदि आधुनिक तकनीक के सहारे उत्पादन करते हुए बुर्जुआ वर्ग काम के दिन को विस्तारित कर 12 घंटे या उससे भी अधिक कर रहा है तथा श्रम कानूनों में बदलाव कर श्रमिकों के शोषण को तेज कर रहा है, तब भगत सिंह के ‘भौतिकवाद- द्वंद्वात्मक’ दर्शन के अनुरूप कार्यदिवस को कम किया जाए—जैसे 8 घंटे से घटाकर 6 घंटे और सभी के लिए रोजगार की गारंटी सुनिश्चित की जाए तो बेरोजगारी और सामाजिक असमानता को समाप्त किया जा सकता है। जब लोगों के पास रोजगार और क्रय-शक्ति होगी, तभी उत्पादन का वास्तविक उद्देश्य—मानव आवश्यकताओं की पूर्ति—सार्थक हो सकेगा।
आज दुनिया जिन समस्याओं का सामना कर रही है—बेरोजगारी, रोजगार के लिए स्थानीय से लेकर वैश्विक स्तर तक का पलायन, महंगाई, पर्यावरण संकट और सामाजिक असमानता—उनके समाधान की दिशा में भगत सिंह का वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टिकोण महत्वपूर्ण मार्गदर्शन देता है।
कल्पना करें की भारत की संसद में भगत सिंह के नाम पर “भगत सिंह राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून” पारित कर दिया जाए इसमें 18 से 58 साल के प्रत्येक काम मांगने वाले अकुशल को 35000 अर्ध कुशल को 40000 कुशल को 45000 तथा उच्च कुशल को 60000 रुपए मासिक के रोजगार की गारंटी तथा काम के दिन को 6 घंटे या उससे भी कम कर दिया जाए तो सारी सामाजिक समस्याएं हल हो जाएंगी। पर्यावरण सुरक्षा भी हो जाएगी। नशों का कोढ़ भी खत्म हो जाएगा। युवाओं की निराशा और अपराध भी खत्म हो जाएंगे। बच्चियों के प्रति होने वाले अपराध और भेदभाव भी समाप्त हो जाएंगे तथा इन समस्याओं को रोकने वाले कानून बनाने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी । पूरी संस्कृति ही बदल जाएगी
इसलिए भगत सिंह को याद करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं है बल्कि उनके विचारों का अध्ययन, चिंतन और उन्हें व्यवहार में उतारना भी है। यदि हम सचमुच एक न्यायपूर्ण और खुशहाल समाज बनाना चाहते हैं तो भगत सिंह के बताए रास्ते—अध्ययन, संघर्ष और व्यवस्था परिवर्तन—की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
सरदूल सिंह
