मन को भेद पाना असंभव है। इसके खेल निराले हैं। कई बार यह जानते हुए भी कि कोई बात अतार्किक है, बचकानी है, व्यक्ति उसमें व्यर्थ समय जाया करता है।
अब अशुभ शंका की बात ही लें। मोनिका स्वयं डाक्टर हैं लेकिन उनके साथ रोज यही होता है कि हास्पिटल जाते हुए एकाएक उन्हें यह आशंका होने लगती है कि कहीं प्रेस का, गीज़र का स्विच आन तो नहीं रह गया या गैस पर दूध उबलता तो नहीं छोड़ दिया। वे ताला खोलकर संशय तो दूर कर लेती है लेकिन उनकी बस अक्सर देर होने पर छूट जाती है।
अचानक पीछे आने वाली कार के आप तक पहुंचने से पहले यह सूझता है कि सामने वाले बिजली के खंभे तक अगर आप पहुंच गए तो आपका मनचाहा पूर्ण होगा वर्ना नहीं। मनोरोग चिकित्साशास्त्रा में इन्हें आबसेशन (अशुभ शंका) और (कम्पलशन बेसिर पैर की गतिविधि) कहा जाता है।
किशन की उम्र अभी केवल बीस बाईस वर्ष है। कालेज जाते हुए वह अकेला ही अपने से बात करने लगता है। दरअसल एक लड़की उसके मन में गहरे समाई हुई है लेकिन वह उसे जरा भी लिफ्ट नहीं देती। उसने जब अपनी बड़ी बहन से इस बारे में सलाह मांगी जो मनोविज्ञान में पी एच डी कर रही थी, तो उस ने उसे राहत के लिए एक सरल उपाय बताया-मन को काबू में रखने के लिए चेहरे के हर हिस्से को अंगुलियों से सहलाना शुरू कर दिया करो-उपाय काम कर गया। किशन के मन का आवेग शांत होने लगता।
संभावना और किशन की तरह हज़ारों ऐसे लोग हैं जो इस तरह के मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं लेकिन कई बार उन्हें इसका पता ही नहीं रहता। वे इसे नार्मल मानवीय फितरत मानकर चलते हैं।
आबसेशन और कम्पलशन भिन्न-भिन्न प्रकार के हो सकते हैं। दरअसल कई बार जिसको हम बेहद जरुरी समझते हैं,उसे लेकर व्यक्ति आबसेशन का शिकार पाया जाता है, वह यूं कि चीज़ों को रखने का एक खास अंदाज वह जरूरत पड़ने पर भी बदल नहीं पाता। इसी तरह कई लोगों की आदत होती है चीजों को बार-बार चैक करते रहने की। किसी चीज में सफलता पाने को अंकों या किसी चीज से जोड़ना, पूरे किये कार्य को फिर दोहराना इसके कुछ प्रकार हैं। सफाई का आबसेशन एक बहुत ही कामन प्रकार का आबसेशन है। इसी तरह धर्म, सेक्स, व्यक्तिगत चीज़ों को लेकर अपवित्राता का आबसेशन भी लोगों में कामन है।
ये आबसेशन मर्ज का रूप तभी लेते हैं, जब इससे जीवन मुश्किल होने लगता है वर्ना ये अहसास हर व्यक्ति के जीवन में क्षणिक तौर पर आते जाते रहते हैं।
मनोवैज्ञानिकों की इस विषय में धारणा है कि इसका संबंध मरीज के पास्ट से है। वे दुखद क्षण जिन्हें वह भुला देना चाहता है, उनकी छवि उसकी स्मृति में गहरे खुद जाती है। घटना अपने आप में गौण होने पर भी उससे जुड़ी दुर्भावनाएं बनी रहती है। ये ही अवचेतन में आबसेशन का रूप ले लेती हैं।
उपचार:-
बिहेवियर थेरेपी के जरिए मरीज को विसंगत विचारों पर काबू पाने की टेªनिंग दी जाती है। मन को शांत करने तथा व्यग्रता से राहत दिलाने के लिए रिलेक्सेशन व्यायाम व ध्यान चिकित्सा आदि कराए जाते हैं, साथ ही दवाओं द्वारा भी उपचार किया जाता है।
मरीज के मस्तिष्क में व्याप्त गहरे अवसाद को हटाने के लिए इलेक्ट्रोकन्वलसिव थेरेपी भी एडवाइज की जाती है लेकिन यह सब एक होशियार मनःचिकित्सक की सलाह और देखरेख में ही होना चाहिए।
इस मर्ज में छिपाने जैसी कोई बात नहीं है। जैसे शरीर में कोई रोग हो जाता है ठीक वैसे ही मन के रोग हैं जिन पर स्वयं मरीज का कई बार वश नहीं होता। रोग भयंकर रूप धारण कर ले, इससे पूर्व ही आबसेसिव कम्पलसिव डिसआर्डर का उपचार होना जरूरी समझा जाना चाहिए।
