वकील की प्रतिभा व न्यायाधीश की नैतिक जिम्मेदारी का स्थान नहीं ले सकता एआई : न्यायमूर्ति विक्रम नाथ

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हैदराबाद, 14 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने शनिवार को कहा कि बुद्धिमत्तापूर्ण तरीके से इस्तेमाल किए जाने पर कृत्रिम मेधा (एआई) समय बचा सकती है और कानूनी कार्य के कुछ पहलुओं को अधिक प्रबंधनीय बना सकती है, लेकिन यह एक वकील की प्रतिभा, न्यायिक अधिकारी की नैतिक जिम्मेदारी या न्यायाधीश से अपेक्षित अनुशासित निर्णय का स्थान नहीं ले सकती।

न्यायामूर्ति विक्रम नाथ ने यहां एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि प्रौद्योगिकी किसी नोट का मसौदा तैयार करने में मदद कर सकती है, लेकिन इसे कानून बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने उच्चतम न्यायालय में भी कृत्रिम मेधा से उत्पन्न सामग्री के लापरवाहीपूर्वक उपयोग के मामलों पर चिंता व्यक्त जताई, जिनमें ऐसे उद्धरणों और संदर्भों का उल्लेख शामिल है जो अस्तित्व में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि झूठे उद्धरण केवल तकनीकी त्रुटियां नहीं हैं, वे कानूनी दलीलों की शुचिता और स्वयं न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रहार करते हैं।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा, ‘‘लेकिन एक उपकरण को उपकरण ही रहना चाहिए। यह एक वकील के प्रशिक्षित दिमाग, अदालत के अधिकारी की नैतिक जिम्मेदारी या न्यायाधीश से अपेक्षित अनुशासित निर्णय का स्थान नहीं ले सकता।’’

उन्होंने कहा, ‘‘प्रौद्योगिकी किसी नोट का मसौदा तैयार करने में मदद कर सकती है, लेकिन इसे कानून बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। साथ ही, एआई के दुरुपयोग से हमें इसके विपरीत चरम सीमा तक नहीं पहुंचना चाहिए, जहां हम इससे पूरी तरह से संबंध तोड़ लें। इसका समाधान है जानकारीपूर्ण उपयोग, नैतिक अनुशासन और पेशेवर मानक। हमें इन उपकरणों का कुशलतापूर्वक, सावधानीपूर्वक और इनकी सीमाओं के प्रति पूर्ण जागरूकता के साथ उपयोग करना सीखना होगा।’’

न्यायमूर्ति ने कहा कि इसलिए, चुनौतियां वास्तविक हैं क्योंकि प्रौद्योगिकी पहुंच को व्यापक बना सकती है, लेकिन यह अलगाव को भी गहरा कर सकती है। उन्होंने कहा कि हालांकि यह पारदर्शिता बढ़ा सकती है, लेकिन यह विकृति को भी बढ़ावा दे सकती है।

उन्होंने कहा कि उन्नत तकनीकें और उपकरण कानूनी कार्यों में सहायता कर सकते हैं, लेकिन वे लापरवाही के नए रूप भी पैदा कर सकते हैं। ये अपराध से निपटने में मदद कर सकते हैं और साथ ही नए अपराधों को अंजाम देने का माध्यम भी बन सकते हैं।

शीर्ष अदालत के न्यायाधीश ने कहा, ‘‘यह हमारे युग का विरोधाभास है, लेकिन इस विरोधाभास का बुद्धिमत्तापूर्वक समाधान करना हमारी संस्थाओं की जिम्मेदारी भी है। इसलिए हमारा दृष्टिकोण सैद्धांतिक अनुकूलन का होना चाहिए। हमें प्रौद्योगिकी को केवल इसलिए अस्वीकार नहीं करना चाहिए क्योंकि यह नई है। हमें इसे अंधाधुंध स्वीकार नहीं करना चाहिए क्योंकि यह कारगर है।’’

उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था का भविष्य केवल प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण से सुरक्षित नहीं होगा। यह सुनिश्चित करने से सुरक्षित होगा कि प्रौद्योगिकी कानूनी व्यवस्था के मूलभूत आदर्शों से जुड़ी रहे।

उच्चतम न्यायालय के एक अन्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और तेलंगाना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अपारेश कुमार सिंह ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया।

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