कच्चा तेल खरीद में अमेरिका की ‘दादागिरी क्यों?

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तेल खरीद में अमेरिका की हमेशा से दादागिरी चलती आ रही है। वर्तमान में जब आठवें दिन इजरायल-ईरान के जंग के बीच जब कच्चा तेल महंगा और सप्लाई भी बंद हो जाती है ऐसे में अमेरिका द्वारा भारत को 30 दिन की मौहलत का आशय ? कूटनीतिक संदेश या दबाव ? । ऐसे समय में शांति की पहल केवल राजनीतिक जरूरत नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता की भी अनिवार्य शर्त है।


वैश्विक राजनीति में ऊर्जा हमेशा से शक्ति और दबाव का बड़ा हथियार रही है। हाल के घटनाक्रम में एक बार फिर यह स्पष्ट हो गया है कि दुनिया की महाशक्तियाँ तेल को केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि कूटनीतिक दबाव के औजार के रूप में भी इस्तेमाल करती हैं। अमेरिका द्वारा कुछ देशों से तेल खरीद को लेकर कड़े प्रतिबंधों की नीति और भारत को 30 दिन की मौहलत देना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
अमेरिका लंबे समय से उन देशों पर दबाव बनाता रहा है जिनसे उसका राजनीतिक टकराव है। ऐसे में यदि कोई तीसरा देश उनसे तेल खरीदता है तो वह भी अमेरिकी प्रतिबंधों की जद में आ सकता है। यही कारण है कि भारत जैसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देश को बार-बार संतुलन साधना पड़ता है। भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए सस्ती और स्थिर आपूर्ति चाहता है जबकि अमेरिका चाहता है कि उसके सहयोगी देश उसकी विदेश नीति के अनुरूप ही निर्णय लें।

 

भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है और उसकी अर्थव्यवस्था काफी हद तक बाहरी ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भर है। ऐसे में यदि किसी स्रोत से सस्ता तेल मिलता है तो उसे पूरी तरह छोड़ देना भारत के लिए आसान नहीं होता। यही वजह है कि अमेरिका के दबाव के बावजूद भारत अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए फैसले लेने की कोशिश करता रहा है।


भारत को दी गई 30 दिन की मौहलत दरअसल एक तरह का कूटनीतिक संदेश है। यह समय भारत को अपनी रणनीति तय करने के लिए दिया गया है, लेकिन इसके साथ ही यह संकेत भी है कि आगे अमेरिका इस मुद्दे पर और सख्ती दिखा सकता है। यह स्थिति भारत के लिए एक चुनौतीपूर्ण संतुलन का सवाल बन जाती है—एक तरफ रणनीतिक साझेदारी और दूसरी ओर ऊर्जा सुरक्षा।


यह भी ध्यान देने वाली बात है कि वैश्विक राजनीति में प्रतिबंधों की यह संस्कृति धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। बड़ी शक्तियाँ आर्थिक ताकत का इस्तेमाल करके दूसरे देशों के निर्णयों को प्रभावित करना चाहती हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार की स्वतंत्रता और वैश्विक व्यवस्था दोनों पर सवाल खड़े होते हैं।


भारत को इस परिस्थिति में अपनी ऊर्जा नीति को और अधिक विविधतापूर्ण बनाना होगा। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना, नए तेल आपूर्तिकर्ताओं की तलाश करना और रणनीतिक भंडारण को मजबूत करना समय की मांग है। साथ ही, कूटनीतिक स्तर पर भी भारत को स्पष्ट करना होगा कि उसकी ऊर्जा जरूरतों पर किसी बाहरी दबाव का असर सीमित ही हो सकता है।
अंतत:, यह प्रकरण केवल तेल खरीद का नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का भी संकेत है। भारत जैसे उभरते हुए देश के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी आर्थिक और रणनीतिक स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए अंतरराष्ट्रीय दबावों का समझदारी से सामना करे। तभी वह अपनी विकास यात्रा को बिना बाधा के आगे बढ़ा पाएगा।


युद्ध नहीं रुका तो कच्चे तेल की आग पूरी दुनिया को झुलसा सकती है
वहीं अगर ईरान-इजरायल युद्ध नहीं रुका तो कच्चे तेल की आग पूरी दुनिया को झुलसा सकती है। पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ता सैन्य संघर्ष केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ रहा है। युद्ध के चलते कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से उछलने लगी हैं। अगर यह युद्ध जल्द नहीं थमा, तो कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है।

 

दरअसल, इस संघर्ष का सबसे बड़ा खतरा हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर मंडरा रहा है। यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग है, जहां से लगभग 20 प्रतिशत वैश्विक तेल आपूर्ति गुजरती है। यदि इस मार्ग में व्यवधान आता है या जहाजों की आवाजाही रुकती है, तो वैश्विक तेल बाजार में बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।हाल के दिनों में इसी आशंका के कारण तेल बाजार में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। रिपोर्टों के मुताबिक युद्ध के कुछ ही दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया और यह लगभग 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया, जो हाल के वर्षों में सबसे तेज साप्ताहिक बढ़ोतरी में से एक है।


यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद हुआ या तेल टैंकरों की आवाजाही बाधित हुई, तो तेल की कीमतें 100 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। इससे वैश्विक महंगाई बढ़ेगी, उत्पादन लागत बढ़ेगी और कई देशों की आर्थिक वृद्धि प्रभावित होगी।
भारत जैसे देशों के लिए यह संकट और भी गंभीर हो सकता है क्योंकि भारत अपनी लगभग 90 प्रतिशत तेल जरूरतें आयात से पूरी करता है और उसका बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। ऐसे में तेल महंगा होने का मतलब है—पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि, महंगाई का दबाव और सरकारी वित्त पर अतिरिक्त बोझ।स्पष्ट है कि ईरान-इजरायल युद्ध केवल दो देशों का सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की परीक्षा बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को कूटनीतिक प्रयासों के जरिए जल्द से जल्द तनाव कम करने की दिशा में काम करना होगा। यदि युद्ध की आग फैलती है, तो उसका धुआं पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को घेर सकता है—और कच्चे तेल की कीमतें इसका सबसे बड़ा संकेत होंगी।


अत: युद्ध जितना लंबा चलेगा, तेल बाजार उतना अस्थिर होगा। इसलिए शांति की पहल केवल राजनीतिक जरूरत नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता की भी अनिवार्य शर्त है।

सौरभ वार्ष्णेय

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