ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान (महाराष्ट्र), आठ मार्च (भाषा) शाम का समय था… मन में उत्सुकता लिए जीप में सवार होकर हम आगे बढ़ रहे थे, तभी कुत्ते के भौंकने जैसी एक आवाज हुई और हमें लगा कि हमारी ख्वाहिश अब भी पूरी नहीं होगी। जंगल में होने वाली हलचलों से अनजान हम लोगों को यह एक आम सी आवाज लगी।
लेकिन हमारी खुली जीप में आगे वाली सीट पर बैठे हमारे गाइड संतोष के लिए यह एक संकेत था, जिसका वह दोपहर से ही इंतजार कर रहे थे। इस बीच संतोष ने कहा, “श्श्श…वो आ गया! बाघ 100 प्रतिशत हमारे आसपास है।”
हम पिछले दो घंटे से जीप में सवार होकर जंगल में इधर-उधर घूम रहे थे, हर एक ठहराव पर निराशा ही हाथ लग रही थी। कोई बाघ नहीं दिख रहा था। सूरज ढलते समय हमने पानी के एक तालाब के पास आखिरी बार रुकने का निर्णय लिया, जहां कुछ और जीप में लोग इसी उम्मीद में सवार थे। हम धीरे से इस उम्मीद में तालाब के सामने एक खुली जगह में रुके कि बाघ सामने से मिट्टी के ऊंचे टीले से बाहर आएगा।
और तभी संतोष ने चित्तेदार हिरण की आवाज सुनी। ये जानवर उस समय यह आवाज निकालते हैं, जब उन्हें अपने आसपास बाघ के होने का आभास होता है। इस तरह से वे दूसरे झुंड को सतर्क करते हैं। वह आवाज फिर से गूंज उठी, लेकिन इस बार एक अलग दिशा से।
संतोष ने तुरंत हमारे ड्राइवर अतुल की ओर इशारा करते हुए कहा, “जल्दी, जल्दी घुमाओ!”
संतोष ने अतुल से कहा कि वह जीप वापस उस मोड़ पर पहुंचाए जो हम पहले पार कर चुके थे। इसके बाद तो वहां मौजूद सभी जीप में उस जगह पहुंचने की होड़ लग गई। अतुल और दूसरे ड्राइवर जीप चलाने में माहिर थे। सभी पांच जीप पीछे मुड़ीं और वहां जाकर खड़ी हो गईं। वह जगह चारों ओर से ऊंची घास, पेड़ और झाड़ियों से घिरी हुई थी। और हम इंतजार करने लगे, कैमरे तैयार थे। कुछ ही पल में हमें वह नजारा दिखा, जिसका हम बेसब्री से इंतजार कर रहे थे।
झाड़ियों से एक बेहद खूबसूरत मादा शावक बाहर निकली, उसकी चाल आत्मविश्वास से भरी हुई थी और उन लोगों से उन्हें कतई फर्क नहीं पड़ रहा था, जो उसे कैमरे में कैद करने के लिए इंतजार कर रहे थे। पीछे उसकी बहन चल रही थी। खेल-खेल में, उनके बड़े, फर से ढंके धारीदार सिर कभी-कभी एक-दूसरे टकरा रहे थे।
उस दिन सफारी पर गए सभी लोगों ने पूरी दोपहर इस पल का बेसब्री से इंतजार किया था। बाघ जैसे शाही जानवर को देखने का अनुभव शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। हम इतनी पास से इसे देख रहे थे कि इसकी एक-एक धारी हमें साफ नजर आ रही थी। यह रोंगटे खड़े कर देने वाला अनुभव था।
कुछ सेकंड बीते और लगभग दो या तीन साल की उम्र की ये शावक पास खड़ी जीपों की ओर बढ़ने लगीं। जंगल की गर्म हवा में गहरी खामोशी छा गई। बस एक ही आवाज सुनाई दी, वह थी डीएसएलआर कैमरों के शटर की, जिनसे धड़ाधड़ फोटो खींचे जा रहे थे।
संतोष ने हमें बताया कि ताडोबा के बाघ सफारी देखने के लिए इतने अभ्यस्त हैं कि वे इंसानों और उनकी गाड़ियों को जंगल का हिस्सा मानने लगे हैं।
उन्होंने हमें एक सलाह देते हुए कहा, “अगर बाघ आप को देखें तो उसकी नजर से नजर मिलाएं, अपनी नजर स्थिर रखें और झुकाएं नहीं। इस तरह वह समझ जाएगा कि आप शिकार नहीं हैं।”
उन्होंने बताया कि ये दो शावक ‘छोटी मधु’ की थीं, जो ताडोबा के कई नामी बाघिनों में से एक है। शावकों को तब तक नाम नहीं दिया जाता जब तक वे बड़े न हो जाएं। छोटी मधु का एक तीसरा शावक भी है, वह एक नर है। हम उसे नहीं देख पाए, लेकिन हमें थोड़ी दूरी पर छोटी मधु की एक झलक मिली। वह छुपी हुई थी, जबकि उसकी बेटियां जीप के सामने एक-दूसरे के साथ खेल रही थीं, फिर वे पानी पीने के लिए जलाशय की ओर बढ़ गईं।
बाद में क्षेत्र के वन अधिकारी संतोष ठीपे ने हमें बताया कि इस क्षेत्र में घूमने वाले अन्य बाघों में शंभू, वैमान, छोटा डडियाल, डब्ल्यू और कॉलर वाली शामिल हैं। छोटा डडियाल (गाल के खूबसूरत बालों की वजह से यह नाम दिया गया), जबकि डब्ल्यू नामक बाघ के माथे पर अंग्रेजी का अक्षर ‘डब्ल्यू’
बना हुआ है। इसी तरह ‘कॉलर वाली’ का यह नाम, इसलिए रखा गया क्योंकि वन अधिकारियों ने उसके गले में एक ट्रैकिंग कॉलर डाल रखा है।
ठीपे ने कहा, “जंगल के सभी जानवरों में, बाघ सबसे शाही है। उसका व्यवहार एक राजा जैसा होता है। वह सबसे अलग, गरिमामयी और सबसे ऊपर होता है।”
उन्होंने यह भी बताया कि बाघ तब तक किसी पर हमला नहीं करता, जब तक वह भूखा न हो।
पास के चंद्रपुर जिले के निवासी ठीपे ने कहा, “मनुष्यों के विपरीत, जंगली जानवर लालची नहीं होते। वे केवल तभी शिकार करते हैं, जब उन्हें खाने की जरूरत होती है।”
ताडोबा देश के 58 बाघ अभयारण्यों में से एक है, और यह शायद सबसे प्रसिद्ध है क्योंकि यहां बाघों को देखना अपेक्षाकृत आसान है। यह नागपुर से साढ़े तीन घंटे की दूरी पर है और इस राष्ट्रीय उद्यान के बफर जोन में ठहरने के लिए कई आवास उपलब्ध हैं।
सफारी का समय सुबह के चार घंटे और शाम के चार घंटे तक सीमित होता है, और पर्यटकों को सर्दियों में शाम 6 बजे तक मुख्य क्षेत्र से वापस जाने के लिए कहा जाता है। ताडोबा में 23 सफारी गेट से पर्यटक प्रवेश कर सकते हैं।
उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद ताडोबा और अन्य कई राष्ट्रीय उद्यानों में मोबाइल फोन इस्तेमाल करने पर पाबंदी है।
ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान में लगभग 90 बाघ रहते हैं, जबकि आसपास के क्षेत्रों को मिलाकर ताडोबा-अंधारी बाघ अभयारण्य में और 100 बाघ हैं। एक दशक पहले तक इस क्षेत्र में केवल 30 बाघ थे।
यहां धारीदार मृग, सांभर हिरण, स्लॉथ भालू, भारतीय गौर, जंगली कुत्ते, तेंदुए, मगरमच्छ, सारस, बगुले, उल्लू, मकड़ी और कई अन्य जीव शामिल हैं।
सफारी वन्यजीवों के बारे में जानने और राष्ट्रीय पशु के बारे में दिलचस्प जानकारी प्राप्त करने का एक बेहतरीन अवसर है। उदाहरण के लिए, बाघ, तेंदुए और इसी प्रजाति के अन्य जानवर अपना इलाका तय करने के लिए पेड़ के तनों, झाड़ियों और चट्टानों का उपयोग करते हैं, और अपने मूत्र से खुशबू छोड़ते हैं।
