मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने संशोधित पारंपरिक कानूनों का बचाव किया

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आइजोल, 28 फरवरी (भाषा) मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने कहा है कि मिजो विवाह और संपत्ति उत्तराधिकार कानून में हाल ही में किए गए संशोधन सरकार की एकतरफा पहल नहीं थे, बल्कि प्रमुख हितधारकों के बीच आम सहमति पर आधारित थे।

उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर तीखी बहस जारी है।

कानून विभाग का भी प्रभार संभाल रहे लालदुहोमा द्वारा पेश किया गया मिजो विवाह और संपत्ति उत्तराधिकार (संशोधन) विधेयक इस महीने की शुरुआत में विधानसभा द्वारा पारित किया गया था।

यह संशोधन प्रथागत कानून को और अधिक संहिताबद्ध करता है और 2014 के मूल अधिनियम को मजबूत करता है, जिसमें बहुविवाह, अंतर-सामुदायिक विवाह और महिलाओं के संपत्ति अधिकारों से संबंधित परिवर्तन शामिल हैं।

ये कानून बहुविवाह पर एक ऐतिहासिक प्रतिबंध लगाता है और महिलाओं को वैवाहिक संपत्ति में 50 प्रतिशत का अधिकार प्रदान करता है, लेकिन इसने मुख्यमंत्री द्वारा एक खंड की व्याख्या को लेकर तीव्र बहस छेड़ दी है, जिसके अनुसार यदि मिज़ो महिलाएं गैर-मिज़ो पुरुषों से शादी करती हैं तो वे संभावित रूप से अपनी मिज़ो पहचान और अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा खो सकती हैं।

मिजोरम के सबसे बड़े महिला संगठन, मिजो ह्मेइछे इंसुइखौम पावल (एमएचआईपी) ने शुक्रवार को राज्य सरकार से विधेयक वापस लेने का आग्रह किया, इसे मिजो महिलाओं के लिए संभावित रूप से “असुरक्षित” बताया।

आलोचना का जवाब देते हुए लालदुहोमा ने कहा कि यह विधेयक मिज़ो प्रथागत कानून समीक्षा समिति की सिफारिशों पर आधारित है, जिसमें एमएचआईपी, सेंट्रल यंग मिज़ो एसोसिएशन (सीवाईएमए) सहित 10 संगठनों के प्रतिनिधि और मिज़ोरम विश्वविद्यालय और राज्य विधि महाविद्यालय के विशेषज्ञ शामिल हैं।

शुक्रवार को विधानसभा में एक निजी सदस्य के प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि पूर्व के मिज़ो विवाह, तलाक और संपत्ति उत्तराधिकार अधिनियम, 2014 में यह प्रावधान था कि यदि कोई मिज़ो महिला किसी अन्य समुदाय के व्यक्ति से विवाह करती है, तो उसे प्रभावी रूप से मिज़ो प्रथागत अधिकारों से वंचित माना जाता था।

लालदुहोमा के अनुसार, नतीजतन हाल ही में संशोधित कानून में, वे आम तौर पर यह मानते हैं कि यदि कोई मिज़ो महिला किसी गैर-आदिवासी पुरुष से शादी करती है, तो वह तुरंत अपना आदिवासी दर्जा खो देती है और उसके बच्चे भी अब आदिवासी प्रमाण पत्र प्राप्त करने में सक्षम नहीं होंगे।

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