राजस्थान हाईकोर्ट ने बुजुर्गों की हालत को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अदालत का कहना है कि 2046 तक देश में बच्चों से ज्यादा बुजुर्ग होंगे लेकिन उनके लिए हमारा सिस्टम अभी तैयार नहीं है। इसी चिंता के बीच हाई कोर्ट की जयपुर बेंच ने राज्य के वृद्धाश्रमों की स्थिति की पड़ताल का आदेश दिया है ताकि यह पता चल सके कि वहाँ रहने वाले बुजुर्गों को वास्तव में कैसी सुविधाएँ मिल रही हैं और सिस्टम जमीनी स्तर पर कितना प्रभावी है। अदालत की यह टिप्पणी अहम है, जो भारत अभी सबसे युवा देश है, रफ्तार से दौड़ रहा है उसे अपने बुजुर्गों की भी चिंता करने की आवश्यकता है।
राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण राज्य में चल रहे सभी 31 वृद्धाश्रमों (ओल्ड एज होम) की जाँच कर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगा जिसमें वृद्धाश्रमों में चिकित्सा की सुविधा, फूड क्वालिटी, भवनों की स्थिति, सफाई और सुरक्षा के इंतजामों के विषय में विस्तार से बताया जाएगा। हाईकोर्ट ने बुजुर्गों की सामाजिक स्थिति पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों को हमेशा सम्मान और आदर का स्थान दिया गया है लेकिन समय के साथ यह परंपरा कमजोर होती जा रही है। संयुक्त परिवारों के टूटने, तेजी से बढ़ते शहरीकरण और बदलती जीवनशैली ने बुजुर्गों को समाज में धीरे-धीरे असहाय और उपेक्षित स्थिति में पहुँचा दिया है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि समाज और व्यवस्था दोनों को बुजुर्गों की बदलती जरूरतों को समझते हुए अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार होना होगा।
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) और इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज (आईआईपीएस) ने सितंबर 2023 में एक रिपोर्ट जारी की थी। यह रिपोर्ट देश और दुनिया के प्रमुख जनसंख्या और वृद्धावस्था संबंधी आँकड़ों के आधार पर तैयार की गई है। इसमें आईआईपीएस द्वारा किए गए ‘लॉन्गिट्यूडिनल एजिंग सर्वे इन इंडिया (2017-18)’, भारत की जनगणना, भारत सरकार के जनसंख्या अनुमान (2011-2036) और संयुक्त राष्ट्र के विश्व जनसंख्या संभावनाएँ 2022 से प्राप्त आँकड़ों को आधार बनाया गया है
रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया में साल 2022 में करीब 110 करोड़ लोग ऐसे थे जिनकी उम्र 60 साल या उससे ज्यादा थी। यह दुनिया की कुल आबादी का लगभग 13.9 प्रतिशत था। अगले 30 सालों में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ने वाली है। अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या बढ़कर करीब 210 करोड़ हो जाएगी और तब दुनिया की कुल आबादी में बुजुर्गों का हिस्सा करीब 22 प्रतिशत तक पहुँच जाएगा। यह बदलाव दुनिया के हर हिस्से में दिखाई देगा।
भारत में भी ऐसा ही होगा। साल 2022 में भारत में करीब 14.9 करोड़ बुजुर्ग थे, जिनकी उम्र 60 साल या उससे ज्यादा थी। यह देश की कुल आबादी का लगभग 10.5 प्रतिशत था। लेकिन 2050 तक बुजुर्गों की संख्या बढ़कर करीब 34.7 करोड़ हो जाएगी और तब देश की आबादी में उनका हिस्सा करीब 21 प्रतिशत तक पहुँच जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2000 से 2022 के बीच भारत की कुल आबादी में करीब 34 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई लेकिन इसी दौरान 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या 103 प्रतिशत तक बढ़ गई,यानी बुजुर्गों की संख्या देश की कुल आबादी से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ी। इससे भी ज्यादा तेज बढ़ोतरी 80 साल से ऊपर उम्र के लोगों में हुई। इस उम्र वर्ग की आबादी में इस दौरान करीब 128 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
आगे के अनुमान और भी चौंकाने वाले बताए जा रहे हैं। साल 2022 से 2050 के बीच भारत की कुल आबादी में सिर्फ 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है जबकि बुजुर्गों की संख्या करीब 134 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। इसी अवधि में 80 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या लगभग 279 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है। खास बात यह है कि बहुत ज्यादा उम्र के बुजुर्गों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा होगी। इनमें बड़ी संख्या विधवा और दूसरों पर निर्भर रहने वाली महिलाओं की होगी। जैसे-जैसे उम्र 60 से 80 साल के बीच बढ़ेगी, बुजुर्ग महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में लगातार बढ़ती जाएगी।
अनुमान के अनुसार साल 2046 तक भारत में बुजुर्गों की संख्या बच्चों (0 से 14 वर्ष) से ज्यादा हो जाएगी। वहीं, 2050 तक देश की कामकाजी उम्र की आबादी (15 से 59 वर्ष) में गिरावट आने लगेगी। आँकड़ों से स्पष्ट है कि भारत तेजी से ‘एजिंग सोसाइटी’ की और बढ़ रहा है। जीवन प्रत्याशा में वृद्धि, स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार और जन्मदर में गिरावट ने मिलकर भारत के ‘एज स्ट्रक्चर’ को बदल दिया है। यह आँकड़ों का यह बदलाव लोगों और देश दोनों के लिए ही चुनौती लाने वाले है वो भी ऐसे वक्त में जब भारत को अपनी बूढ़ी होती आबादी की चिंता के लिए बहुत काम करना बाकी है। सामाजिक-आर्थिक तौर पर उम्र का यह बदलाव कई तरह के असर दिखाएगा जिससे निपटने भारत के लिए चुनौती होने वाला है।
भारत में 60 साल की उम्र के बाद औसतन लोग करीब 18.3 साल और जीवित रहते हैं। इसमें महिलाओं की उम्र पुरुषों से ज्यादा होती है। 60 साल की उम्र के बाद महिलाएँ औसतन लगभग 19 साल और पुरुष लगभग 17.5 साल तक जीवित रहते हैं। महिलाएँ पुरुषों की तुलना में अधिक समय तक जीवित रहती हैं जिसके कारण वृद्ध महिलाओं की संख्या अधिक होती है। इनमें से बड़ी संख्या विधवाओं की होती है, जो अकेले रहती हैं और परिवार पर निर्भर होती हैं। सामाजिक सुरक्षा की सीमित व्यवस्था और सामाज के पितृसत्तात्मक ढाँचे के कारण वृद्ध महिलाएँ अधिक असुरक्षित स्थिति में होती हैं।
जानकारों के अनुसार इसका एक अन्य पहलू ग्रामीणीकरण बताया जा रहा है। भारत की 71 प्रतिशत वृद्ध आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, सीमित परिवहन सुविधाएँ, कम आय और सामाजिक अलगाव वृद्ध लोगों की समस्याओं को और बढ़ सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में युवा आबादी का शहरों की ओर पलायन भी वृद्ध लोगों को अकेला छोड़ देता है जिससे वे खुद भी भावनात्मक और सामाजिक रूप से अधिक कमजोर हो जाते हैं।
भारत में वृद्धों की आर्थिक स्थिति एक गंभीर चिंता का विषय है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, केवल 11 प्रतिशत वृद्ध पुरुषों को वर्क पेंशन मिलती है और 16.3 प्रतिशत को सामाजिक पेंशन प्राप्त होती है। वहीं, वृद्ध महिलाओं में 27.4 प्रतिशत केवल सामाजिक पेंशन पर निर्भर हैं और मात्र 1.7 प्रतिशत को कार्य पेंशन मिलती है। लगभग पाँचवां हिस्सा ऐसा है जिसके पास कोई स्थायी आय स्रोत नहीं है। यह स्थिति वृद्धावस्था को आर्थिक असुरक्षा और गरीबी से जोड़ देती है।
भारत में बड़ी संख्या में बुजुर्ग गरीब हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्गों की स्थिति और खराब है। अगर सरकार ने पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा नहीं दी तो बुजुर्ग गरीबी और निर्भरता में फँस सकते हैं। इसके साथ ही बुजुर्गों की बढ़ती संख्या का सबसे बड़ा असर स्वास्थ्य क्षेत्र पर पड़ेगा। बुजुर्गों को लंबे समय तक इलाज की जरूरत होती है। उन्हें हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर, गठिया और मानसिक रोग जैसी समस्याएँ होती हैं। भारत में अभी बुजुर्गों के लिए विशेष स्वास्थ्य सेवाएँ बहुत कम हैं। अगर बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ी, तो अस्पतालों और डॉक्टरों पर भारी दबाव पड़ेगा। साथ ही, शहरों में पहले से ही भीड़, प्रदूषण और आवास की समस्या है। बुजुर्गों के लिए शहरों को अनुकूल बनाना एक बड़ी चुनौती होगी।
आज के समय में बुजुर्गों की एक बड़ी समस्या अकेलापन और उपेक्षा भी है। संयुक्त परिवारों के टूटने, शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण कई बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं। कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में बड़ी संख्या में बुजुर्ग खुद को सामाजिक रूप से अलग-थलग महसूस करते हैं। इसलिए जरूरी है कि समाज और सरकार मिलकर बुजुर्गों के लिए सामुदायिक केंद्र, सामाजिक गतिविधियाँ और सुरक्षित वृद्धाश्रम विकसित करें ताकि वे खुद को अकेला न महसूस करें और सम्मान के साथ जीवन जी सकें।
रामस्वरूप रावतसरे
