नकारात्मक सोच लेकर ससुराल न जाएं

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यह सच है कि बंधे बंधाये फार्मूलों से हम अब रिश्तों को नहीं निभा सकते। आज की बहू और पहले की बहुओं में बहुत बदलाव आ गया है। यह स्वाभाविक भी है। उनकी बोलचाल, व्यवहार, पहनावा, सभी कुछ तो बदल गया है ठीक उसी प्रकार जैसे ससुरालवाले। व्यवहार में जहां दोनों तरफ खुलापन आया है, कुछ अच्छा हुआ है लेकिन ज्यादा बुरा ही हुआ है।
ससुराल की धुरी सास है। सास में आने वाला बदलाव जहां सकारात्मक है लड़कियों का रवैया ज्यादातर नकारात्मक है। अब वे पति और ससुराल को लेकर सपने नहीं संजोती क्योंकि वे ज्यादा प्रैक्टिकल होने लगी हैं। सास तजुर्बेकार होने के बावजूद बहू को लेकर सपने देखती है। अगर उसके बेटी नहीं है तो वह उसमें बेटी की छवि देखती है। बेटी है भी तो उसके ससुराल चले जाने पर वह उसके अभाव की पूर्ति बहू से करना चाहती है लेकिन कितनी बहुएं आज ऐसी मिलेंगी, जो सास में मां की छवि देखने की चाह रखती हैं?
आज सास उनके लिए पति की मां न होकर ‘दूसरी औरत‘ है। उनकी प्राथमिकता पति को उसके चंगुल से छुड़ाना है। इस बात का उन्हें जरा भी अहसास नहीं होता कि जिस पति को वे अपना सर्वस्व मानती हैं उसे दुनिया में लाने वाली यही औरत है जिसके लिए मन में श्रद्धा होनी चाहिए। उसके लिए यहां नफरत पलती  है जिसे हर मौके पर दिखाने से वो नहीं चूकती।
असल कारण हैं उनके संस्कार। मां-बाप का अकेली दुकेली होने के कारण अत्यधिक लाड प्यार, शिक्षा का घमंड और रिश्तेदार, सहेलियों से सुने ससुराल विरोधी कमेंट्स इन्हें और गहरा रंग देते हैं। टी वी सीरियल्स, फ़िल्में, आज के कुछ भड़काऊ लेख, कहानियां, इत्यादि रही सही कसर पूरी कर देते हैं।
कुछ अच्छी स्तरीय शिक्षापूर्ण लेख कहानियां देने वाली मैग्जींस हैं जिन्हें गलत सोच रखने वाली लड़कियां हिंदी में होने के कारण उठाकर देखना भी पसंद नहीं करती, उनसे दिमाग रोशन करना तो दूर की बात ।
लड़कियां ससुराल के रिश्तों की अहमियत समझें। अपने जीवन की बगिया में इनकी सुगंध फैलने दें। नकारात्मक सोच वो कैक्टस हैं जो सिर्फ जख्मी करते हैं।

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