चर्चित मामलों में जनाक्रोश स्वाभाविक, लेकिन जांच उस पर निर्भर नहीं हो : उच्चतम न्यायालय

0
dfe2wdwq

नयी दिल्ली, 17 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि न्याय बहुमत की भावना या जनदबाव के आधार पर नहीं किया जा सकता।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि चर्चित मामलों में जनाक्रोश स्वाभाविक है, लेकिन जांच की दिशा तय करने का आधार वह नहीं बनना चाहिए।

न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने कहा कि जनभावना को जांच के परिणाम को प्रभावित करने की अनुमति देने से न्याय में गड़बड़ी का खतरा होता है।

पीठ ने कहा, ‘‘अदालत इस बात पर जोर देती है कि न्याय बहुमत की भावना या जन दबाव का अनुसरण करके नहीं मिलता। न्याय सत्य से मिलता है, जो साक्ष्य और निष्पक्ष जांच के माध्यम से स्थापित होता है।’’

अदालत ने कहा, ‘‘हालांकि बहुचर्चित मामलों में जनता का आक्रोश समझ में आता है, लेकिन इससे कभी भी जांच की दिशा तय नहीं होनी चाहिए। जांच के लिए साक्ष्यों का सावधानीपूर्वक संग्रह, निष्पक्ष विश्लेषण और तथ्यों पर आधारित निष्कर्ष आवश्यक हैं।’’

पीठ ने कहा, ‘‘निष्पक्षता के प्रति प्रतिबद्ध समाज को यह समझना होगा कि जांचकर्ता और अदालतें सच्चाई को केंद्र में रखते हैं, न कि लोकप्रियता को। उनकी स्वतंत्रता कोई विलासिता नहीं बल्कि न्याय की नींव है।’’

शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणियां 2002 में तेलुगु अभिनेत्री प्रत्युषा को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की दो साल की जेल की सजा को बरकरार रखते हुए कीं।

अदालत ने अभिनेत्री का पोस्टमार्टम करने वाले डॉ. मुनि स्वामी की भी कड़ी आलोचना की। इसने कहा कि 25 फरवरी, 2002 को ड्यूटी पर एक डॉक्टर के होने के बावजूद, स्वामी खुद ही मुर्दाघर आए और शव का पोस्टमार्टम किया।

पीठ ने कहा कि यह आश्चर्यजनक है, क्योंकि स्वामी न तो मुर्दाघर में ड्यूटी पर थे और न ही प्रोफेसर के रूप में ‘कॉल ड्यूटी’ पर थे।

डॉ. मुनि स्वामी की समय से पहले और गलत राय ने सार्वजनिक विवाद की लहर पैदा कर दी। मीडिया रिपोर्ट ने उनके निष्कर्षों को और हवा दी, जिससे जांचकर्ताओं पर व्यापक संदेह पैदा हुआ और कथित आरोपियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की मांग उठी।

पीठ ने टिप्पणी की, “यह दर्शाता है कि कैसे एक गलत रिपोर्ट समय से पहले सार्वजनिक की जाती है, तो जनता की धारणा को विकृत कर सकती है और न्याय की प्रक्रिया को बाधित कर सकती है।”

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘इस तरह का दुर्व्यवहार केवल एक मामले को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि यह चिकित्सा, कानून और शासन में जनता के विश्वास को भी खत्म करता है, जिससे समाज में शांति और सद्भाव अस्थिर हो जाता है। यह न्यायालय में विचाराधीन मामलों पर सार्वजनिक टिप्पणी को सीमित करने वाले नियम का भी उल्लंघन है, जिसका उद्देश्य निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा बनाए रखना है।’’

प्रत्युषा की 24 फरवरी, 2002 को हैदराबाद में मौत हुई थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *