महाशिवरात्रि : आध्यात्मिक उत्कर्ष का पावन पर्व

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धर्म धुरी पुण्यभूमि भारत व्रत, पर्व, उपवास एवं आध्यात्मिक साधना का क्षेत्र है। यहां हर दिन कोई न कोई त्योहार एवं उत्सव का आयोजन है। उत्सवधर्मी समाज जीवंतता का प्रतीक होता है और सुख, समृद्धि एवं सम्पन्नता का भी। प्राचीन काल से ही भारत का लोकजीवन भौतिकता एवं आध्यामिकता के सबल पंखों के सहारे न केवल दैनंदिन जीवन में विकास एवं विस्तार को गति दी अपितु उन्नति के शिखरों को स्पर्श भी किया; वहीं तप, त्याग, परोपकार एवं आध्यात्मिक जीवन के पथ पर बढ़ते हुए आम जन को लोक कल्याण के सूत्र सौंपे। भारतीय सनातन परम्परा में व्रत, उपवास एवं त्योहार आत्मिक चेतना के सम्बोध, गहन साधना, जीवन की निर्मलता, शारीरिक शुद्धता एवं पवित्रता का माध्यम रहे हैं। सनातन हिंदू मान्यता में मानव जीवन का लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है।

 

उपासना, जप-तप एवं व्रत तथा साधना एवं जागरण के द्वारा साधक मुक्ति पथ पर अग्रसर होता है। महाशिवरात्रि व्रत एवं साधना व्यक्तिगत आध्यात्मिक उत्कर्ष एवं मोक्ष प्राप्ति का पावन अवसर तो है ही, साथ  ही जागतिक कल्याण की भावना का सबलीकरण भी है क्योंकि शिव कल्याण करने वाले हैं। शिवत्व वैश्विक कल्याण की जाग्रत भावना है, महाशिवरात्रि में साधक शिवत्व प्राप्त कर जीवन में स्थिरता एवं गम्भीरता की कामना करते हैं। ‘शिवो भूत्वा, शिवम् यजेत्’ अनुसार साधक भगवान शिव की आराधना हेतु शिव की कल्याणकारी भावना से ओत-प्रोत हो भक्ति में लीन होते हैं।

 

       महाशिवरात्रि उत्सव फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी-चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। दिन में शिवलिंग का पूजन एवं अभिषेक आदि तथा रात्रि में कीर्तन एवं ध्यान-साधना तथा जागरण के द्वारा शिव आराधना कर आध्यात्मिक दृष्टि से स्वयं को उज्ज्वल, निर्मल मन कर शिवमय हो जाते हैं। शास्त्रों में महाशिवरात्रि का व्रत को 10000 बार गंगा स्नान एवं 100 यज्ञों के समान फलदायी बताया गया है। विभिन्न प्रकार की शिवरात्रि का वर्णन शास्त्रों में मिलता है। नित्य शिवरात्रि, मास शिवरात्रि, प्रथमादि शिवरात्रि तथा महाशिवरात्रि। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान शिव चतुर्दशी तिथि के स्वामी कहे गये हैं और त्रयोदशी के स्वामी कामदेव है। स्कंद पुराण के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन पूजन, ओम नमः शिवाय मंत्र-जाप तथा उपवास करने से मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो परमधाम शिवधाम को प्राप्त होता है। महाशिवरात्रि अज्ञान पर ज्ञान की प्रतिष्ठा का प्रतीक है।

 

        महाशिवरात्रि व्रत करने एवं उत्सव मनाने के संदर्भ में शास्त्रीय परम्परा में कुछ दृष्टांत मिलते हैं।  कहा जाता है कि इसी दिन माता पार्वती से भगवान शिव का विवाह हुआ था। उस आनन्द के अनुभव को जीने के लिए व्रत करते हुए माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा की जाती है। यह दाम्पत्य जीवन में सुख, शांति, सामंजस्य एवं समृद्धि देने वाला है। देवों एवं दैत्यों की संधि अनुसार सिंधु से रत्नादि प्राप्त करने हेतु समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मंथन के प्रारंभ में कालकूट विष निकला। उसकी ज्वाला की ताप से जीव-जंतु त्राहि-त्राहि करने लगे। देव-देत्यों में कोई भी उस विष को ग्रहण करने को तैयार नहीं था क्योंकि वह ग्रहण करने वाले को जलाकर नष्ट करने वाला था। सामर्थ्यहीन देव-दैत्यों की प्रार्थना पर भगवान शिव ने कालकूट हलाहल को अपने कंठ में धारण कर लिया और समस्त चराचर जगत का कल्याण किया। उस दिन को शिवरात्रि नाम से जाना जाने लगा।

 

 विष के ताप से शांति एवं विष शमन हेतु शिव उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड अंतर्गत बांदा जनपद के कालिंजर पर्वत में विराजमान हुए। अभी भी वहां स्थापित शिवलिंग सदृश मूर्ति के गले से जल स्राव हो रहा है, गले पर हथेली या कोई कपड़ा और कागज रखकर अनुभव किया जा सकता है। एक कथा प्रसंग में आता है कि एक बार विष्णु और ब्रह्मा में विवाद हो गया कि कौन बड़ा है। कोई निर्णय नहीं हो पा रहा था, तब धरा-गगन मध्य अनंत अंतरिक्ष में एक विशाल अग्नि स्तंभ प्रकट हुआ और उद्घोष किया कि जो मेरा आदि-अंत खोजकर पहले आएगा, वही बड़ा होगा।‌ विष्णु और ब्रह्मा में कोई उस अग्नि स्तम्भ का आदि-अंत न पा सका, तब अग्निस्तंभ शिवलिंग रूप में प्रतिष्ठित हो भगवान शिव महादेव कहलाए।

       भगवान शिव लोक कल्याण के लिए द्वादश ज्योतिर्लिंग के रूप में विद्यमान हैं, जो इस प्रकार हैं – सोमनाथ (गुजरात), मल्लिकार्जुन (श्रीशैलम, आंध्रप्रदेश),  महाकालेश्वर (उज्जैन, मध्यप्रदेश), ओंकारेश्वर (ओंकारेश्वर, मध्यप्रदेश), केदारनाथ (रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड), भीमाशंकर (पुणे के पास, महाराष्ट्र), काशी विश्वनाथ (वाराणसी, उत्तर प्रदेश), त्र्यंबकेश्वर (नासिक, महाराष्ट्र), वैद्यनाथ (देवघर, झारखंड), नागेश्वर (द्वारका, गुजरात), रामेश्वरम (तमिलनाडु), घृष्णेश्वर महादेव (औरंगाबाद, महाराष्ट्र)। महाशिवरात्रि के अवसर पर हम सभी भगवान शिव का पूजन, अभिषेक, जप एवं व्रत-उपवास कर आध्यात्मिकता के पथ पर सतत गतिमान रहें।

         

 

प्रमोद दीक्षित मलय

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