पानी सियासी सीमाओं को नहीं जानता: सिद्धरमैया ने अंतरराष्ट्रीय बांध सुरक्षा सम्मेलन में कहा
Focus News 13 February 2026 0
बेंगलुरु, 13 फरवरी (भाषा) कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने करीब 70 प्रतिशत बांधों के 25 साल पुराने होने का संदर्भ देते हुए शुक्रवार को बांधों के तत्काल, व्यवस्थित सुरक्षा आकलन, आधुनिकीकरण और जोखिम-आधारित संचालन की आवश्यकता को रेखांकित किया।
मुख्यमंत्री ने जल प्रशासन में सहकारी संघवाद की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए कहा, ‘‘पानी राजनीतिक सीमाओं को नहीं पहचानता।’’
बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान में आयोजित बांध सुरक्षा-2026 पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करने के अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि बांध सुरक्षा किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह एक साझा राष्ट्रीय दायित्व है जिसके लिए समन्वित संस्थागत कार्रवाई की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा, ‘‘हम जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चरम स्थितियों का सामना कर रहे हैं। भूकंपीय खतरे, जलाशयों में गाद जमा होना और पुरानी अवसंरचनाओं का दबाव जटिल, परस्पर जुड़े जोखिम पैदा करते हैं। बांध सुरक्षा अब कोई तकनीकी मुद्दा नहीं रह गया है बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा की एक अनिवार्य आवश्यकता है।’’
सिद्धरमैया के मुताबिक भारत में 6,628 निर्दिष्ट बांध हैं, जो इसे दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बांधों का देश बनाते हैं। उन्होंने कहा कि कर्नाटक में 231 बांध है और इस लिहाज से देश के राज्यों में छठा स्थान है।
उन्होंने कहा, ‘‘इन बांधों में से लगभग 70 प्रतिशत 25 साल से अधिक पुराने हैं, जो व्यवस्थित सुरक्षा मूल्यांकन, आधुनिकीकरण और जोखिम-आधारित संचालन की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।’’
सिद्धरमैया ने बांधों को सामूहिक आकांक्षाओं का प्रतीक बताते हुए याद किया कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इन्हें ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा था, और कृषि समृद्धि और औद्योगिक प्रगति में इनकी भूमिका को रेखांकित किया था।
उन्होंने कहा कि बांधों का संचालन डिजिटल रूप से हो रहा है और इसके मद्देनजर साइबर सुरक्षा और तकनीकी छेड़छाड़ से बचाव को राष्ट्रीय अवसंरचना सुरक्षा के मूल तत्वों के रूप में माना जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि महत्वपूर्ण जल अवसंरचना आतंकवाद और रणनीतिक व्यवधान के प्रति संवेदनशील बनी हुई है, जिसके लिए निरंतर सतर्कता और समन्वित खुफिया तंत्र की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि दुनिया जल संकट ओर बढ़ रही है और इसके मद्देनजर अंतरराज्यीय और सीमा पार नदी प्रशासन के लिए सहयोग, डेटा साझाकरण और राजनयिक परिपक्वता की आवश्यकता है।
सिद्धरमैया ने कहा, ‘‘इन बहुआयामी चुनौतियों को पहचानते हुए, हमारी प्रतिक्रिया भी उतनी ही व्यापक होनी चाहिए, जो विज्ञान पर आधारित हो, संस्थानों द्वारा मजबूत हो और सुरक्षा, स्थिरता और साझा जिम्मेदारी की दीर्घकालिक दृष्टि द्वारा निर्देशित हो।’’
मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि केंद्र और राज्य सरकारों को केवल अनुपालन से आगे बढ़कर एक व्यापक सुरक्षा संस्कृति का निर्माण करना चाहिए जिसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि आवधिक निरीक्षण, सुरक्षा परीक्षण और आपातकालीन कार्य योजनाएं औपचारिकता नहीं हों बल्कि जोखिम प्रबंधन के गतिशील साधन हों।
उन्होंने कहा, ‘‘नीति, विज्ञान, इंजीनियरिंग, वित्त और सामुदायिक भागीदारी के समन्वय से ही हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हमारे बांध असुरक्षा के स्रोत न रहकर राष्ट्रीय समृद्धि और जनविश्वास के स्थायी स्तंभ बने रहें।’’
उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि यह सम्मेलन एक महत्वपूर्ण मोड़ पर आयोजित किया जा रहा है।
शिवकुमार ने कहा कि बांध सुरक्षा राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गई है। उन्होंने भारत सरकार द्वारा विश्व बैंक की सहायता से 2012 में शुरू किए गए बांध पुनर्वास और सुधार कार्यक्रम (डीआरआईपी) को केंद्र-राज्य साझेदारी का एक सशक्त उदाहरण बताया।
उप मुख्यमंत्री ने प्रमुख परियोजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि मेकेदातु जलाशय और पेयजल परियोजना ने उच्चतम न्यायालय के अनुकूल फैसले के साथ एक मील का पत्थर हासिल कर लिया है, और राज्य वैधानिक मंजूरी प्राप्त करने की दिशा में काम कर रहा है।
उन्होंने कहा कि इस परियोजना का उद्देश्य बेंगलुरु की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करना, कावेरी नदी के पानी की निर्धारित आपूर्ति सुनिश्चित करना और लगभग 400 मेगावाट बिजली उत्पन्न करना है।
उपमुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण (एनडीएसए) के दिशानिर्देशों के तहत लागू 500 मीटर की व्यापक पाबंदी पर पुनर्विचार करने की भी मांग की और लचीलेपन की वकालत की।
केंद्रीय जल शक्ति राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी और विश्व बैंक के दक्षिण एशिया क्षेत्र के उपाध्यक्ष जोहान्स जुट्ट भी सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मौजूद रहे।
