विज्ञान-अनुसंधान में आधी आबादी का बढ़ता निर्विवाद प्रभाव

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आधी आबादी को समर्पित आज का दिन कई मायनों में खास है। विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों की महत्वपूर्ण भूमिका और उनके योगदान को मान्यता देने के लिए सालाना 11 फरवरी को ‘विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस“ मनाया जाता है। 22 दिसंबर 2015 को संयुक्त राष्ट्र की महासभा में घोषित इस दिवस का मुख्य उद्देश्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणितज्ञ क्षेत्र में महिलाओं की समान भागीदारी को बढ़ाना और लैंगिक असमानता को दूर करना था। आज 11 फरवरी 2026 में इस दिवस का 11वां संस्करण मनाया जा रहा है। पिछले वर्ष-2025 की थीम ‘भविष्य को आकार देने के लिए प्रगति की रूपरेखा तैयार करना’ थी। वहीं, इस साल की थीम ‘अभी सर्वश्रेष्ठ आना बाकी है पर केंद्रित है।
 
विज्ञान क्षेत्र में महिलाओं के बढ़ते कदमों की बात करें, तो मंगल मिशन की सफलता से लेकर नासा और नोबेल पुरस्कार तक भारतीय महिलाएं वैज्ञान क्षेत्र में अपना लोहा मनवाया रही हैं। विज्ञान के वैश्विक स्तर पर भी भारतीय महिलाओं की धूम है। ये सिलसिला अब इसलिए भी रूकने वाला नहीं? क्योंकि सामाजिक बेड़ियों को तोड़कर महिलाएं दिनोंदिन विज्ञान की दुनिया में अकल्पनीय कीर्तिमान स्थापित करती जा रही हैं। एकाध दशकों के भीतर विज्ञान क्षेत्र और उसके विषय में महिलाओं की भूमिकाएं अत्यंत महत्वपूर्ण और परिवर्तनकारी के तैर पर उभरी है। आधा आबादी ने भौतिकी, रसायन विज्ञान, चिकित्सा, और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में अपना क्रांतिकारी योगदान देकर अपने दम पर पुरूषों के साथ कदम ताल मिलाया है। मैरी क्यूरी से लेकर भारतीय अंतरिक्ष मिशनों तक, महिलाओं ने रूढ़िवादी पंरपराओं को तोड़कर अपनी प्रतिभां सिद्ध की हैं।
 
केंद्र सरकार ने 2024-25 में विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय को 16,628 करोड़ रुपये आवंटित इसलिए किए थे, ताकि इस क्षेत्र में धन की कमी न आए। विज्ञान क्षेत्र में पुरूषों के तौर पर स्टीफन हॉकिंग, आईजैक न्यूटन, एपीजे अब्दुल कलाम, सीवी रमन जैसे महान पुरुष वैज्ञानिकों की ही छवि लोगों के जेहन में उभरती थी। पर, अब भारत में, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। वर्ष-2018-19 की विभिन्न शोध परियोजनाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी तकरीबन 28 से 30 फीसदी तक बढ़ीं। 2024-24 के आंकड़ों में और इजाफा हुआ है। गति अगर यूं ही बरकरार रही, तो साल 2047 में जब भारत पूर्ण रूप से विकसित होगा, तब विज्ञान क्षेत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी आधी हो जाएगी।

महिलाओं के लिए भारत अब बदल चुका है। क्योंकि वैश्विक औसत के हिसाब से विज्ञान क्षेत्र में भारतीय महिलाएं की रूचि ज्यादा बढ़ी है। हिंदुस्तान में लड़कियों को अब कम उम्र से ही स्टृम शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया जाने लगा है। यही कारण है कि स्टेम शिक्षा में महिलाओं की हिस्सेदारी अब लगभग 43 प्रतिशत तक जा पहुंची है। केंद्रीय व राज्य सरकारों द्वारा भी महिला सशक्तिकरण के प्रयासों में इंटरशिप, छात्रवृत्तियां और अन्य 11 पीठों का गठन महिला शोधकर्ताओं को बढ़ाने मकसद से शुरू किया जा चुका है। केंद्र सरकार में इसका अलग से मंत्रालय भी बनाया गया है। मंत्रालय का नाम है ‘वज्ञान एवं प्रौद्योगिकी एवं पृथ्वी विज्ञान’। एक जमाना था, जब विज्ञान जैसे क्षेत्रों में गिनी चुनी महिलाओं की ही आमदगी होती थी। पर, अब इसरो के चंद्रयान और मंगलयान मिशनों की सफलता में भारतीय महिला वैज्ञानिकों का महत्वपूर्ण योगदान भी दिखने लगा है।
 
आनंदीबाई जोशी पहली महिला डॉक्टर, असिमा चटर्जी पहली कैंसर और मिर्गी शोध, सुषमा घोष पहली चिकित्सा विज्ञान और जानकी अम्माल ने गन्ने की हाइब्रिड प्रजातियों के विकास में जो योगदान दिया, उसे कोई नहीं भूल सकता। वहीं, अन्ना मणि का सौर विकिरण और ओजोन परत के क्षेत्र में दिया उल्लेखनीय कार्य सदैव सराहनीय रहेगा। इन महिलाओं ने ये सफलताएं उस समय हासिल की थी जब महिलाओं को घरों की चारदीवारी में कैद करके रखा जाता था। बाहर निकले आजादी तक नहीं होती थी। भारतीय महिला वैज्ञानिकों ने केवल विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान किया, बल्कि गणित, अंतरिक्ष और खगोल शास्त्र के क्षेत्र में भी शानदार उपलब्धियाँ हासिल की हैं। अंतरिक्ष की दुनिया में दमदार प्रदर्शन करने वाली इन महिलाओं के संबंध में युवा पीढ़ी को जानना चाहिए।

वैश्विक पटल पर भी भारतीय महिलाओं ने अपने हुनर का लोहा अपनाया। कल्पना चावला भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला के बारे में छोटे बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक हर कोई जानता है। कल्पना अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला थीं जिसने 376 घंटे 34 मिनट तक अंतरिक्ष में रहकर रिकॉर्ड बनाया। उन्होंने धरती के 252 चक्कर लगाए थे। 1 फरवरी 2003 को हुई अंतरिक्ष इतिहास की एक मनहूस दुर्घटना में कल्पना चावला सहित सातों अंतरिक्ष यात्रियों की मौत हो गई। वही, सुनीता विलियम्स अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के जरिये अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की दूसरी महिला हैं। सुनीता विलियम्स ने एक अंतरिक्ष यात्री के रूप में 195 दिनों तक अंतरिक्ष में रहने का विश्व कीर्तिमान स्थापित किया। उनसे प्रेरणा लेकर भारतीय महिलाएं विज्ञान क्षेत्र में आ रही हैं।

डॉ. रमेश ठाकुर

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