बस्तर में अब राष्ट्रवाद के साथ जनजातीय संस्कृति के उत्सव की बयार
Focus News 11 February 2026 0
छत्तीसगढ़ का बस्तर कभी वामपंथी आतंकवाद के लिए कुख्यात रहा है। अब यहाँ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की आवाज गूँज रही है और सुनने वालों में पूर्व नक्सली भी थे। ‘बस्तर पंडुम’ के जरिए माँ दंतेश्वरी की इस पुण्यभूमि की समृद्ध जनजातीय संस्कृति-विरासत का संरक्षण एवं संवर्धन किया जा रहा है।
राष्ट्रपति ने 7 फरवरी 2026 को छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में जनजातीय संस्कृति और परंपराओं के सबसे बड़े उत्सव ‘बस्तर पंडुम’ का आज जगदलपुर में उद्घाटन किया। समारोह को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि बस्तर के लोग जीवन को उत्सव की तरह जीते हैं और यह महोत्सव दुनिया को बस्तर की समृद्ध आदिवासी संस्कृति की झलक देता है। कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और अन्य मंत्री मौजूद रहे।
‘बस्तर पंडुम’ महोत्सव को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि उन्हें छत्तीसगढ़ आना, अपने घर आने जैसा लगता है। उन्होंने कहा, “बस्तर की सुंदरता को देखकर लगता है कि माँ दंतेश्वरी ने स्वयं इसे अपने हाथों से सजाया है।” राष्ट्रपति ने छत्तीसगढ़ सरकार की तारीफ करते हुए कहा, “इस वर्ष के पंडुम में पचास हजार से अधिक लोगों द्वारा जनजातीय संस्कृति तथा जीवन-शैली से जुड़े अनेक प्रदर्शन किए जाएँगे। बस्तर की जनजातीय संस्कृति से देशवासियों को अवगत कराने के इस महत्वपूर्ण प्रयास के लिए मैं छत्तीसगढ़ सरकार की सराहना करती हूं।”
राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने संबोधन के दौरान माओवाद से मुख्य धारा में लौट रहे बस्तर की सुंदरता की तारीफ की और कहा कि यहाँ विकास का नया सूर्यादय हो रहा है। उन्होंने कहा, “माओवाद के कारण यहाँ के निवासियों ने अनेक कष्ट झेले। सबसे ज्यादा नुकसान यहाँ के युवाओं, आदिवासियों और दलित भाई-बहनों को हुआ। भारत सरकार की माओवादी आतंक पर निर्णायक कार्रवाई के परिणामस्वरूप वर्षों से व्याप्त असुरक्षा, भय और अविश्वास का वातावरण अब समाप्त हो रहा है। माओवाद से जुड़े लोग हिंसा का रास्ता छोड़ रहे हैं जिससे नागरिकों के जीवन में शांति लौट रही है।”
उन्होंने कहा, “बड़ी संख्या में नक्सलियों ने हथियार छोड़े हैं। सरकार यह सुनिश्चित कर रही है कि जो लोग हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटे हैं, वो सामान्य जीवन जी सकें। उनके लिए अनेक विकास और कल्याणकारी योजनाएँ चलाई जा रही हैं। राज्य सरकार की ‘नियद नेल्लानार योजना’ ग्रामीणों के सशक्तीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। सरकार के प्रयास और इस क्षेत्र के लोगों के सहयोग के बल पर आज बस्तर में विकास का नया सूर्यादय हो रहा है। गाँव-गाँव में बिजली, सड़क, पानी की सुविधा उपलब्ध हो रही है। वर्षों से बंद विद्यालय फिर से खुल रहे हैं और बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।”
राष्ट्रपति ने नक्सलवाद छोड़ मुख्यधारा में लौटे लोगों से देश के संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखने की अपील करते हुए कहा, “यह लोकतंत्र की ताकत ही है कि ओडिशा के एक छोटे से गाँव की यह बेटी, भारत की राष्ट्रपति के रूप में आपको संबोधित कर रही है।” उन्होंने कहा कि गरीब, वंचित और पिछड़े वर्गों का कल्याण करना सरकार की विशेष प्राथमिकता है। पीएम जनमन योजना और धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से सबसे पिछड़ी जनजातियों के गाँवों को विकास से जोड़ा जा रहा है।
जानकारों के अनुसार यहाँ बस्तर पंडुम कार्यक्रम में राष्ट्रपति के संबोधन को सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुँचे, जिनमें सरेंडर कर चुके पूर्व नक्सली भी शामिल थे। कार्यक्रम स्थल पर मौजूद कुछ पूर्व नक्सलियों ने बताया कि वे राष्ट्रपति के विचारों को सुनने और भविष्य को लेकर उनके संदेश को समझने के उद्देश्य से यहाँ आए थे।
राष्ट्रपति मुर्मु ने इस दौरान बस्तर की माटी की सुगंध और आदिम जनजातीय परंपराओं पर आधारित भव्य प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इस दौरान वे कई स्टॉलों पर पहुँची और वहाँ मौजूद स्थानीय निवासियों और कारीगरों से कलाओं-उत्पादों के बारे में जानकारी ली। राष्ट्रपति ने ढोकरा हस्तशिल्प कला, टेराकोटा, वुड कार्विंग, सीसल कला, बाँस कला, लौह शिल्प, जनजातीय वेश-भूषा व आभूषण, तुम्बा कला, बस्तर की जनजातीय चित्रकला, स्थानीय व्यंजन और लोक चित्रों पर आधारित स्टॉल्स को देखा।
बस्तर पंडुम जनजातीय हस्तशिल्प प्रदर्शनी में आदिवासी कला और संस्कृति की खूबसूरत झलक देखने को मिली। सबसे खास आकर्षण ढोकरा कला से बनी धातु की वस्तुएँ रहीं। इस कला में एक खास तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें पहले मोम से आकृति बनाई जाती है और फिर धातु से उसे आकार दिया जाता है। ढोकरा कला भारत की बहुत पुरानी जनजातीय परंपरा है, जिसमें प्रकृति, देवी-देवताओं और गाँव के जीवन से जुड़े दृश्य साफ दिखाई देते हैं। ढोकरा की हर वस्तु पूरी तरह हाथ से बनाई जाती है। इसे बनाने में मिट्टी, मोम, तार, पीतल और भट्टी जैसी चीजों का इस्तेमाल होता है।
प्रदर्शनी में मिट्टी से बनी टेराकोटा मूर्तियाँ भी दिखाई गईं। ये मूर्तियाँ लोक आस्था, गाँव के जीवन और पुराने विश्वासों को जीवंत रूप में दिखाती हैं। इन्हें देखकर लगता है जैसे गाँव की संस्कृति सामने आ गई हो। लकड़ी की नक्काशी की कला भी लोगों का ध्यान खींच रही थी। सागौन, साल और दूसरी लकड़ियों से बनी मूर्तियों और आकृतियों में कारीगरों की मेहनत और कल्पना साफ नजर आई। पारंपरिक औजारों से बनाई गई ये कलाकृतियाँ सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को सुंदर तरीके से दर्शाती हैं।
‘पंडुम’ शब्द का अर्थ उत्सव होता है लेकिन बस्तर पंडुम केवल उत्सव भर नहीं है। यह बस्तर की सांस्कृतिक आत्मा, जनजातीय चेतना और सामूहिक जीवन परंपरा का जीवंत प्रतीक बन चुका है। यह आयोजन आज सिर्फ सांस्कृतिक मंच नहीं रहा बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जनजातीय विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने का एक मजबूत माध्यम बनकर उभरा है।
इस वर्ष ‘बस्तर पंडुम’ का आयोजन तीन चरणों में किया जा रहा है- पहला ग्राम पंचायत स्तर पर, दूसरा विकासखंड एवं जिला स्तर पर और तीसरा संभाग तथा राज्य स्तर पर होने वाले भव्य समापन समारोह के रूप में। इन तीनों चरणों के माध्यम से बस्तर संभाग के दूर-दराज और सुदूर अंचलों में रहने वाले आदिवासी कलाकारों, शिल्पकारों, लोक गायकों और नृत्य दलों को अपनी कला और प्रतिभा प्रदर्शित करने का व्यापक मंच मिलेगा। वहीं, मांदर, ढोल, तिरिया और बांसुरी जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज पूरे वातावरण को उत्सव और उल्लास के रंगों से भर देगी, जिससे बस्तर की सांस्कृतिक आत्मा सजीव होकर सामने आएगी।
रामस्वरूप रावतसरे
