आपके बच्चे कहीं चिंता का कारण तो नहीं

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आज एकल परिवारों में कई जगह बच्चे अपने माता-पिता की अकेली संतान होता है या दो संतान होती हैं। इतने छोटे परिवार में बच्चे कुछ भी अच्छी बातें नहीं सीख पाते । उनमें टीम फीलिंग नहीं आ पाती। वे बेहद खुदगर्ज हो जाते हैं।  इसके अलावा उचित मार्गदर्शन के अभाव में वे गलत सोहबत में भी पड़ सकते हैं। बड़ी उम्र के लड़के उन्हें इस्तेमाल कर सकते हैं। एक बार उनके चंगुल में आ जाने पर वे पतन की ओर राह पर बढ़ते चले जाते हैं।

बात-बात पर झूठ बोलना, चोरी करना, पिता के नाम पर इधर-उधर से झूठ बोलकर पैसे उधार लेना या मां के जेवर व घर का सामान तक चुरा लेना जैसे गलत कार्य करने में उन्हें जरा भी झिझक नहीं होती।

बच्चा तो कच्ची मिट्टी की तरह होता है। इसे मां खासकर जो स्वरूप देती है, वह उसी शक्ल में ढल जाता है। मां की लापरवाही ही उसे गलत राह पर ले जाती है। एक समझदार मां-जो बच्चे को भरपूर वक्त, स्नेह दुलार देती है, उसमें अच्छे संस्कारों के बीज़ रोपती है, के बच्चों के बिगड़ने के चांस कम ही होते हैं।
अनुशासन की महत्ता समझाते हुए उसे बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार अपनाना चाहिए जिससे उसमें और बच्चों में दूरी न रहे। बच्चे के दिल में मां-बाप को लेकर खौफ नहीं होना चाहिए। उसे इतना विश्वास होना चाहिए कि उसकी भूल माफ कर दी जाएगी। खौफ सिर्फ नफरत उपजाता है जबकि आपस की अंडरस्टेडिंग प्यार और विश्वास पैदा करती है।

आज के मां-बाप अपनी महत्वाकांक्षाएं बच्चों पर इतने बड़े पैमाने पर थोप रहे हैं कि बच्चे बचपन से ही तनावग्रस्त रहने लगे हैं। बच्चे का मन समझने की आज किसे फुर्सत है। बाहरी बातों पर आज ज्यादा ध्यान दिया जाता है। मां-बाप जब स्वयं ही पूर्णतः भौतिकवादी, जीवन को केवल गुणा, भाग, जोड़तोड़ समझने वाले हों तो वे बच्चों को क्या शिक्षा देंगे?

अब मोहल्लेबाजी, आसपड़ोस में मेलमिलाप भी खत्म हो गया है। रिश्ते केवल नाम के रह गए हैं। रिश्ते, जो कभी सुरक्षा कवच हुआ करते थे, ताऊ ताई, चाचा चाची, बुआ आदि का लाड़ प्यार जो मां के प्यार से अलग खुशबू लिए होता था, बच्चे के जीवन में नदारद हैं।

मां की पजेसिवनेस कभी-कभी बच्चे के व्यक्तित्व के स्वस्थ विकास में बाधक भी हो सकती है, यह कम माएं ही समझ पाती हैं। बाद में बच्चा विद्रोही बन जाता है, तब मां के पास सिवा आंसू बहाने के कुछ नहीं बचता।

दादा दादी न होने पर उन्हें गोद लेने का विचार बुरा नहीं है। जरूरी नहीं उन्हें घर पर रखा जाए जिसे शायद वे स्वयं भी पसंद न करें लेकिन वे जहां भी हों, पत्र , फोन या संभव हो तो स्वयं जाकर बच्चों को मिलवाएं। बच्चों को आउटिंग पर ले जाए। सामर्थ्य अनुसार तोहफे दें। उनसे संवाद बनाये रखें, उनकी प्रॉब्लम धैर्यपूर्वक सुनें और उनका निदान करने की कोशिश करें। 

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