भगवान बुद्ध के अवशेषों को दर्शन के लिए श्रीलंका भेजा गया

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वडोदरा, पांच फरवरी (भाषा) गुजरात के वडोदरा में संरक्षित भगवान बुद्ध के अवशेषों के दर्शन का अवसर श्रीलंका के श्रद्धालुओं को उनके देश में मुहैया कराने के लिए एक विशेष कार्यक्रम के तहत इन्हें द्वीपीय देश भेजा गया है।

श्रीलंका में श्रद्धालु चार फरवरी से एक सप्ताह तक भगवान बृद्ध के अवशेषों के दर्शन कर सकेंगे।

इन अवशेषों में भगवान बुद्ध का अस्थि कलश (मंजूषा), चीवर (वस्त्र) और ढक्कन सहित एक पत्थर का पात्र शामिल है।

भगवान बुद्ध की अस्थियों से युक्त मंजूषा को चांदी और सोने के तारों से सजाया गया है और इस पर ब्राह्मी और संस्कृत में ‘दशबल शरीर निलय’ लिखा हुआ है, जिसका अर्थ है ‘भगवान बुद्ध के अवशेषों का स्थान’।

गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने मंगलवार को महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा के सयाजीगंज परिसर में स्थित पुरातत्व और प्राचीन अध्ययन विभाग में इन अवशेषों को पुष्पांजलि अर्पित की।

इस अवसर पर बौद्ध महाबोधि सोसाइटी के सदस्य और राजमाता शुभांगिनी राजे गायकवाड़ सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

सरकार द्वारा जारी एक विज्ञप्ति के अनुसार, इन अवशेषों को दिल्ली के रास्ते वायुसेना के विशेष विमान से पूरे राजकीय सम्मान के साथ श्रीलंका ले जाया गया।

विज्ञप्ति के मुताबिक भगवान बुद्ध की अस्थियों को वडोदरा के सबसे प्राचीन स्थलों में से एक, विमलेश्वर महादेव मंदिर के पास महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा द्वारा संरक्षित किया गया है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की 2025 में हुई श्रीलंका यात्रा के दौरान, भारत और श्रीलंका ने दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान को और मजबूत करने पर सहमति व्यक्त की थी। इस सहमति और श्रीलंका की बौद्ध बहुसंख्यक आबादी को ध्यान में रखते हुए, नव वर्ष समारोह के दौरान इन अवशेषों का प्रदर्शन किया जा रहा है।

विज्ञप्ति के मुताबिक देवनिमोरि अवशेष गुजरात के अरावल्ली जिले में शामलाजी के निकट स्थित देवनिमोरि पुरातात्विक स्थल से प्राप्त हुए हैं, जो अत्यधिक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व का स्थान है। पहली बार 1957 में प्रख्यात पुरातत्वविद् प्रो. एस. एन. चौधरी द्वारा इस स्थल की खोज की गई थी।

सन् 1960 के बाद टीले और आसपास के क्षेत्रों में व्यवस्थित खुदाई शुरू हुई, जिससे एक बौद्ध मठ की पुष्टि हुई। इस स्तूप का 8वीं शताब्दी में पतन हो गया था और माना जाता है कि यह मठ हीनयान परंपरा से संबंधित था।

भगवान बुद्ध के ये अवशेष 11 फरवरी तक कोलंबो में प्रदर्शित किए जाएंगे।

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