रोशनी साहू हमारी प्राचीन चिकित्सा पद्धति मूलत: उन प्राकृतिक पदार्थों और जड़ी-बूटियों पर आधारित थी, जो पूर्णत: निरापद थे परन्तु आज शीघ्रतिशीघ्र लाभ पाने के लोभ में हम अनेक प्राकृतिक औषधियों को भुला बैठे हैं। ‘इसबगोलÓ जैसी चमत्कारी प्राकृतिक औषधि भी उन्हीं में से एक है। यह झाड़ीनुमा लगभग तीन फुट ऊंचे पौधे का बीज होती है। बीजों के ऊपर सफेद भूसी होती है। इसके बीज घोड़े के कान की शक्ल के होते है, इसीलिए इसे संस्कृत में ‘अश्वकर्णÓ तथा फारसी में अश्व (घोड़ा) गोल (कान) अर्थात् ‘अश्वगोलÓ कहते हैं। एकौषधि के रूप में प्रयोग की जाने वाली इसबगोल की भूसी अतिसार, रक्तातिसार, पेचिश, पाचन तंत्र के विकार, खूनी बवासीर, स्वप्नदोष, दमा तथा कब्ज रोग दूर करने वाली श्रेष्ठ, निरापद और गुणकारी दवा का काम करती है। यह दुष्प्रभावों से सर्वथा मुक्त है। अत: इसे घरेलू औषधि के रूप में लाभ न होने तक लगातार नि:संकोच प्रयोग कर सकते हैं। यूं भी यदा-कदा इसबगोल का सेवन कर लिया जाए तो किसी प्रकार की हानि नहीं होगी , बल्कि लाभ ही होगा। इसबगोल के औषधीय प्रयोग:- * इसबगोल के बीजों को शीतल जल में भिगोकर उसके अवलेह को छानकर पीने से खूनी बवासीर में लाभ होता है। * पेट में आंव और मरोड़ होने पर एक चम्मच इसबगोल की भूसी दो घंटे पानी में भिगोकर रोजाना दिन में चार बार लें। ऊपर से दही या छांछ पीएं। * पुरानी कब्ज की शिकायत हो तो रात को सोते समय एक या दो चम्मच भूसी गर्म दूध के साथ सेवन करें। * पेशाब में रुकावट व जलन की शिकायत हो तो तीन चम्मच इसबगोल की भूसी एक गिलास ठंडे पानी में भिगोकर उसमें आवश्यकतानुसार शक्कर मिलाकर पीने से शिकायत दूर होती है। * श्वांस या दमा की शिकायत में सुबह-शाम दो-दो चम्मच इसबगोल की भूसी गर्म पानी के साथ लेने से यह शिकायत दूर हो जाती है। * अत्यधिक कफ होने की स्थिति में इसबगोल के बीजों का काढ़ा बनाकर सेवन करें, अवश्य लाभ होगा।