भारत को तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का संकेत दे रहा है केंद्रीय बजट

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उमेश जोशी
1 फरवरी 2026 को संसद में पेश किए गए केंद्रीय बजट 2026-27 में भले ही अल्पकालिक लाभ दिखाई ना दें और विपक्ष फौरी फायदों को आधार बना कर आलोचना करता दिखे लेकिन यह बजट भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का संकेत दे रहा है। 
    इस बजट की सबसे बड़ी घोषणा पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) में ऐतिहासिक वृद्धि है। वित्त वर्ष 2026–27 के लिए पूंजीगत व्यय 12.2 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, जो पिछले वर्ष के 11.2 लाख करोड़ रुपए की तुलना में करीब 9 प्रतिशत अधिक है। यह राशि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की लगभग 4.4 प्रतिशत है, जिसे वित्त मंत्री ने “अब तक का सबसे ऊँचा स्तर” बताया। यह तथ्य अपने आप में बताता है कि सरकार का विकास मॉडल अब भी बुनियादी ढाँचे के ज़रिए रोज़गार और आर्थिक विस्तार को गति देने पर आधारित है।
सन् 2014-15 में पूंजीगत व्यय सिर्फ 2.0 लाख करोड़ रुपए था। इसमें 12 साल में छह गुणा से अधिक बढ़ौती हुई है। 
     पूंजीगत व्यय में यह बढ़ोतरी मुख्यतः हाईवे, बंदरगाह, रेलवे और ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आबंटित की गई है। इन क्षेत्रों में निवेश का अर्थ केवल सड़कों और पुलों का निर्माण नहीं है, बल्कि यह अर्थव्यवस्था की रीढ़ को मजबूत करने की प्रक्रिया है। बेहतर कनेक्टिविटी, तेज़ परिवहन और ऊर्जा उपलब्धता से उद्योगों को बाज़ार की प्रतिस्पर्धा में लाभ मिलेगा और देश के भीतर व्यापारिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी।
     बजट में शहरी विकास को भी विशेष महत्त्व दिया गया है। टियर-2 और टियर-3 शहरों, यानी पाँच लाख से अधिक आबादी वाले नगरों में बुनियादी ढांचे के विस्तार पर जोर दिया गया है। यह कदम संतुलित क्षेत्रीय विकास की दिशा में महत्त्वपूर्ण है। बड़े महानगरों पर दबाव कम होगा और छोटे शहर आर्थिक गतिविधियों के नए केंद्र बन सकेंगे।
     रेलवे क्षेत्र के लिए भी बजट में बड़े संकेत हैं। हाई स्पीड रेल कॉरिडोर और  400 से अधिक नई वंदे भारत ट्रेनों की घोषणा यह दर्शाती है कि सरकार परिवहन के आधुनिकीकरण को प्राथमिकता दे रही है। इससे न केवल यात्रा सुविधाजनक होगी, बल्कि रेलवे निर्माण, कोच निर्माण और संबद्ध उद्योगों में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।
    सरकार ने एक ओर पूंजीगत व्यय बढ़ाया है, वहीं दूसरी ओर वित्तीय अनुशासन बनाए रखने की कोशिश भी की है। वित्त वर्ष 2026–27 में राजकोषीय घाटा घटाकर 4.3 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। यह संकेत देता है कि विकास और स्थिरता के बीच संतुलन साधने का प्रयास जारी है।
   बजट का एक महत्त्वपूर्ण पहलू निजी निवेश को आकर्षित करना है। इसके लिए ‘इंफ्रास्ट्रक्चर रिस्क गारंटी फंड’ की घोषणा की गई है, जो बड़े प्रोजेक्ट्स में निजी क्षेत्र को क्रेडिट गारंटी प्रदान करेगा। इससे सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बल मिलेगा और विकास परियोजनाओं को नई गति मिल सकती है।
रोजगार सृजन के संदर्भ में यह बजट विशेष रूप से उल्लेखनीय है। बुनियादी ढाँचा क्षेत्र में निवेश का सीधा असर निर्माण, इंजीनियरिंग, परिवहन और सेवाओं पर पड़ता है। इसके साथ ही टेक्सटाइल सेक्टर को बढ़ावा देना भी रोजगार के लिहाज से अहम् है। कृषि के बाद सबसे अधिक रोजगार देने वाला यह क्षेत्र यदि मजबूत होता है तो ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत में व्यापक अवसर पैदा होंगे।
    इसके अलावा, टेक्सटाइल और अन्य विनिर्माण क्षेत्रों को प्रोत्साहन मिलने से निर्यात बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी भूमिका मजबूत कर सकेगा और विदेशी मुद्रा अर्जन में वृद्धि होगी।
कुल मिलाकर बजट 2026–27 यह संदेश देता है कि सरकार ने अल्पकालिक राहत से आगे बढ़कर दीर्घकालिक विकास रणनीति अपनाई है। वर्ष 2047 तक आत्मनिर्भर और विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिए बुनियादी ढाँचा, रोजगार, निर्यात और निजी निवेश को एक साथ साधने की कोशिश इस बजट में स्पष्ट दिखाई देती है। यह बजट भारत की आर्थिक यात्रा को नई पटरियों पर आगे ले जाने वाला दस्तावेज बन सकता है।
   वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का यह बजट सिर्फ एक वार्षिक आय-व्यय का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह देश की दीर्घकालिक विकास यात्रा का रोडमैप भी है। यह बजट स्पष्ट संकेत देता है कि सरकार ने वर्ष 2047 तक ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य को केंद्र में रखते हुए नीतिगत दिशा तय की है। साथ ही, यह भी झलकता है कि भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने की महत्त्वाकांक्षा अब योजनाओं से आगे बढ़कर ठोस निवेश और बुनियादी ढाँचे के विस्तार के रूप में सामने आ रही है।

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