नरेन्द्र देवांगन एक गांव में पारस अपनी बेटी लता के साथ रहता था। लता जब छोटी थी, तभी उसकी मां चल बसी थी। पारस मुखौटे और कठपुतलियां बनाने का काम करता था। हर कोई उसकी कारीगरी देख कर दंग रह जाता था। उसके बनाए मुखौटों की बाजार में बहुत मांग थी। 24 दिसम्बर को लता का जन्मदिन था। इस बार पारस उसे बढ़िया-सा उपहार देना चाहता था पर क्या दे, समझ नहीं पा रहा था। अचानक उसके मन में एक योजना आई। लता के जन्मदिन के दूसरे दिन 25 दिसम्बर को क्रिसमस डे का त्योहार था। अतः उसने अपनी बेटी को सांता क्लाज का खिलौना और क्रिसमस ट्री सजा कर देने का निश्चय किया। पारस चुपचाप जंगल में गया। उसने दो हरे-भरे पेड़ काट लाए। उसने दिन-रात मेहनत करके एक पेड़ को सुंदर सांता क्लाज के रूप वाला खिलौना बना दिया और दूसरे पेड़ को क्रिसमस ट्री जैसा सजा दिया। जन्मदिन से पहले रात के समय दोनों को घर के बाहर रख दिया। अगले दिन उसने बेटी को बधाई दी। फिर उसे घर के बाहर ले आया। इतने सुंदर-सुंदर उपहारों को देख कर लता फूली न समाई। पारस ने खिलौने से सुंदर संगीत सुनाने के लिए, उस पर नाक की तरह बने बटन को दबाया पर खिलौने से संगीत की जगह रोने की आवाज आने लगी। कोई सिसक-सिसक कर कह रहा था, ‘पारस, हम दोनों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था जो तुमने हमको काट कर हमें अपने साथियों से जुदा कर दिया। अपनी बेटी को उपहार देने के लिए तुमने हम दो हरे-भरे पेड़ों को ही काट दिया। चाहते तो तुम यह सांता क्लाज वाला खिलौना किसी सूखे पेड़ से और क्रिसमस टी पेड़ की एक डाली तोड़ कर भी बना सकते थे।‘ यह सुन कर पारस और लता बहुत दुखी हुए। लता बोली, ‘पिताजी, मुझे ऐसा उपहार नहीं चाहिए जो किसी पेड़ की हत्या करके बनाया गया हो। इनमें भी हमारी तरह जान होती हैं।‘ पारस ने मन ही मन प्रण किया कि अब वह कभी किसी पेड़ को नहीं काटेगा। पारस के गलती मान लेने पर लता खुशी से उसके गले लग गई।