प्रारब्ध के कर्म

0
sdfrewqsa

प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में प्रारब्ध कर्मों का शुभ या अशुभ फल अवश्य भोगता है, इसमें कदाचित कोई संदेह नहीं। यह बात तब सत्य प्रतीत होती है, जब यकायक ऐसी घटनाएं घटित हो जाती हैं कि मनुष्य उनके आगे बेबस सा नजर आता है या ऐसा कुछ पा जाता है और सोचता है कि ऐसा कैसे हो गया। वे तो बहुत परोपकारी और अच्छे इंसान थे। कई घटनाएं इस तरह घटती हैं जैसे किसी का आकस्मिक निधन , अप्रत्याशित अपमान, आत्मीय जनों का बिछोह,हानि, विश्वासघात और अन्य प्रकार की क्षति कोई दुर्घटना या कोई बहुत बड़ा लाभ आदि।
जब अच्छा हो जाता है तो वह कुछ नहीं कहता। यदि बुरा हो जाता है तो वह ईश्वर को ही कठघरे में खड़ा करने लगता है, उसकी न्याय व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगता है जबकि वह होता है प्रारब्ध कर्मों के अनुसार ही।
हमारे शास्त्रों ने कर्मों को तीन श्रेणियों में बाँटा है- क्रियमाण, संचित, प्रारब्ध। क्रियमाण कर्म वे होते हैं जो तत्काल फल देते हैं- इनका औचित्य भी समझ में आता है, जैसे विष खाया या कोई भी नशा किया उसका तत्काल असर हो गया। शरीर के प्रतिकूल भोजन कर लापरवाही बरती तो बीमारियों ने घेर लिया। जो कर्म शरीर के किसी अंग द्वारा किए जाते हैं , उन्हें हम क्रियमाण कर्म कह सकते हैं।
दूसरे कर्म होते हैं हमारे संचित कर्म, जिनका फल तत्काल नहीं मिलता है लेकिन शास्त्र  कहते हैं कि यदि इन्हें अनुकूल वातावरण मिले तो शीघ्र फल भी मिल सकता है और यदि विपरीत कर्मों का सामना करना पड़े तो संचित कर्म का फल प्रभावहीन हो जाता है। जैसे कि हम एक तरफ शुभ कार्य कर रहे हैं, दूसरी तरफ कुछ अशुभ तो संचित कर्मों का अच्छा फल नहीं मिलता। एक तरफ दिखावे के लिए हम ईश्वर की खूब पूजा करें, स्वाध्याय , परोपकार, सत्संग या तीर्थयात्राएं आदि करें और दूसरी तरफ घृणित कार्य भी करें, जैसे झूठ बोलें, हिंसा,अहंकार, द्वेष, कपट, विश्वासघात करें तो हमारे अच्छे कर्म भी हमें अच्छा फल नहीं दे सकते।
प्रत्येक मनुष्य के भाग्य का निर्माण उसके कर्म ही करते हैं। वह अपना भाग्यविधाता है। इसीलिए उसे जीवनभर शुभ कर्म करने में तत्पर रहना चाहिए।
तीसरे हैं उसके प्रारब्ध के कर्म, जिनसे कोई महापुरुष भी नहीं बच सका। यकायक कुछ शुभ या अशुभ ऐसा हो जाता है कि विश्वास ही नहीं होता कि ऐसा हो भी सकता था। राजा रंक हो जाता है और रंक राजा।
प्रारब्ध के कर्मों का दुष्प्रभाव तप एवं पुरुषार्थ से कम तो किया जा सकता है, लेकिन उन्हें समाप्त नहीं कर सकते। बड़े- बड़े महापुरुषों ने भी अपने प्रारब्ध को हँस- हँस के भोगा है। पूर्व में भगवान राम, कृष्ण और वर्तमान में रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, शंकराचार्य और लियो – टालस्टाय आदि ने।
सार यही है कि प्रत्येक मनुष्य को फल की इच्छा के बिना सतत शुभ कर्म करते रहना चाहिए। जो भी यकायक घट जाए, उसे सहजता से अपने ही कर्म का फल मानकर ईश्वर का धन्यवाद ज्ञापित करना चाहिए। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *