टीबी भारत सहित विश्व भर के चिकित्सकों के लिये चुनौती बन गया है। माइक्रो बेक्ट्रीयम ट्यूबरक्लोसिस नामक कीटाणु से होने वाला यह रोग टीबी, तपेदिक, क्षय, राजयक्ष्मा, राजरोग, यक्ष्मा, यक्ष्मी, आदि नामों से जाना जाता है।
टीबी संक्रमित रोगी के कफ, बलगम, श्वांस नाक मुंह के माध्यम से निकलकर इसके कीटाणु हवा में तैरते रहते हैं जो श्वांस, खान-पान एवं मुंह के माध्यम से किसी भी स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। जिन स्वस्थ व्यक्तियों में रोग से लड़ने की क्षमता क्षीण होती है, उन पर इसके कीटाणु गले एवं श्वास नली में होते हुए शरीर के भीतरी भागों में अपना अधिकार जमा लेते हैं और फैल कर शरीर को क्षरण करते रहते हैं। उचित उपचार अभाव में धीरे-धीरे पूरे शरीर को इसके कीटाणु खोखला (निष्क्रिय) कर देते हैं और संक्रमित व्यक्ति काल कवलित हो जाता है।
क्षय रोग किसी को भी हो सकता है। पहले टीबी उपचारहीन रोग माना जाता था किंतु अब उपचार से इसका रोगी पूरी तरह ठीक हो जाता है। यह रोग मुख्य रूप से फेफड़ों का होता है किंतु कालान्तर में शरीर के अन्य भीतरी भागों में फैल जाता है।
विडंबना यह है कि इसके रोगी दवा से लाभ होता देख दवा की निश्चित मात्रा निश्चित अवधि तक न लेकर बीच में बंद कर देते हैं जिसके चलते इसके कीटाणु शक्तिशाली हो जाते हैं और कालांतर में टीबी के जीवाणु के प्रति उपलब्ध दवाओं की कार्यक्षमता कम हो जाती है। परिणामतः जीवाणुओं की नई प्रजाति विकसित हो गयी है जिसके कारण चिकित्सक अत्यंत चिंतित हैं किंतु इस सबके पश्चात भी यदि जन साधारण इस रोग के प्रति जागरूक रहे तो इससे बच भी सकते हैं और रोगी यदि चिकित्सा के परामर्शानुसार नियमित रूप से दवाओं का पूरा कोर्स लें तो टीबी की बढ़ती दर को निश्चय ही कम कर सकते हैं
रोगी को महीनों खांसी रहना, दिन रात तीव्र ज्वर बने रहना और शाम को बढ़ना, भूख की कमी, छाती में पीड़ा, सांस लेने में कष्ट, दुर्बलता, शरीर क्षीण होना, अधिक मात्रा में पीला कफ कभी-कभी कफ में रक्त आना, खांसी से स्वर नली में घाव होकर आवाज बैठ जाना, रात में पसीना आना, वजन कम होना टीबी के लक्षण हैं।
यह बीमारी बड़ों की अपेक्षा बच्चों में अधिक पाई जाती है। इनके फेफड़े एवं श्वांस नलियां कोमल होती हैं जो टीबी जीवाणु का आश्रय स्थल बन जाते हैं। अधिक लक्षणों के मिलने पर छाती के एक्सरे एवं कफ की जांच से इसकी पुष्टि की जाती है। इस रोग से भारत में फेफड़े अधिक संक्रमित होते हैं।
बाल्यकाल में बीसीजी का टीका लगाने से आजीवन इस रोग से बचाव हो जाता है। यह टीका पांच वर्ष की आयु तक कभी भी एक बार लगाया जा सकता है। सभी उपचार पद्धतियों में इसकी चिकित्सा है किंतु एलोपैथी की डाट्स विशेष प्रभावी एवं लाभकर और कारगर है। इसकी जांच दवा पूर्णतः निःशुल्क है। निश्चित मात्रा की इसकी दवा लेने से एक डेढ़ माह के भीतर ही इसके लक्षण समाप्त हो जाते हैं जिससे प्रभावित रोगी दवा आगे लेना बंद कर देता है। यह प्राणघाती है, अतएव दवा लेना आगे भी जारी रखना चाहिए।
आयुर्वेद के अनुसार बकरी का दूध पीने से लाभ मिलता है एवं संक्रमित व्यक्ति यदि बकरी को पालतू बनाकर रखे तो उसके शरीर एवं मल मूत्रा से निकलने वाली गंध से टीबी के कीटाणु मर जाते हैं इसलिये महात्मा गांधी इससे बचने के लिए बकरी पाल कर रखते थे। जिन मुस्लिम परिवारों में बकरी पाली जाती है उनके यहां टीबी के रोगी नहीं मिलते। बकरीद के समय बलि के लिये लाए गए बकरे को कुछ दिन पालने की भी परंपरा है।
रोगी प्रातः एवं सायं धूप का सेवन करे और स्वच्छ वायु में रहे। स्वस्थ व्यक्ति रोगी के संपर्क से बचें । नाक एवं मुंह में कपड़ा (मास्क) बांध कर रोगी से मिलें। रोगी के कफ व मल मूत्रा से दूर रहें। इनमें डेटाल या राख डालें। रोगी अंधेरे, गीले व दूषित स्थान से बचें । धूम्रपान गरिष्ठ तले मिर्च मसालेदार भोजन, मांस, मछली, अंडा, चाय, काफी, शराब, अचार, खटाई, तेल, घी, तम्बाकू, गुटखा एवं कठोर श्रम से बचें।
रोगी हल्का पौष्टिक सुपाच्य भोजन करें। मक्खन, मिश्री, सेव, आम, अंगूर, मुनक्का, नारियल, खजूर, लौंग, गाजर, केला, प्याज, लहसुन, फूलगोभी, लौकी, मक्का, शहद, अखरोट, अरारोट, दूध, पुराना चावल, मूंग की दाल, सूजी की रोटी का सेवन करें तो लाभ शीघ्र मिलेगा।
