औपनिवेशिक कानूनों का आज भी लागू रहना चिंताजनक: इतिहासकार कैरोलिन एल्किंस
Focus News 19 January 2026 0
जयपुर, 19 जनवरी (भाषा) जानी-मानी हार्वर्ड इतिहासकार और पुलित्जर पुरस्कार विजेता कैरोलिन एल्किंस ने दुनिया के विभिन्न देशों में आज भी औपनिवेशिक कानून लागू रहने पर चिंता जाहिर की और इनकी गंभीरता से जांच की जरूरत बताई।
उन्होंने साथ ही कहा कि यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि लोगों को चुप कराने के लिए बनाए गए ये कानून आज सच में आज़ाद नागरिकों के लिए किसी काम के हैं भी या नहीं ?
एल्किंस ने ब्रिटिश शाही इतिहास पर आधारित अपनी किताब ”लिगेसी आफ वायलेंस’’ पर सोमवार को यहां चर्चा करते हुए बताया कि कैसे संस्थागत हिंसा औपनिवेशिक शासन का एक ज़रूरी हिस्सा थी और कैसे इसके प्रभाव आज भी वर्तमान को आकार दे रहे हैं।
इस संबंध में उन्होंने इराक, फलस्तीन और दुनिया के विभिन्न हिस्सों के हालात और भारत में सेंसरशिप संबंधी कानून एवं आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा इस्तेमाल किए गए कुछ दमनकारी कानूनों का हवाला दिया।
जयपुर साहित्योत्सव में एल्किंस ने ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा भारत समेत दुनिया के
विभिन्न हिस्सों में अपने औनिवेशिक राज के दौरान मूल निवासियों के खिलाफ की गई हिंसा पर एक सत्र में भाग लिया।
कैरोलिन एल्किंस ने इस बात को रेखांकित किया कि ब्रिटिश साम्राज्य ने ताकत के साथ-साथ कानून के ज़रिए भी शासन किया। उनका तर्क था कि भारत सहित कई आज़ाद देशों ने इन कानूनों को अपनाया और बनाए रखा, जिससे ये दमनकारी कानून शासन व्यवस्था में जारी रहे जो असल में उपनिवेशों के लोगों पर हावी होने के लिए बनाए गए थे।
उन्होंने जाने-माने इतिहासकार और जेएलएफ के सह निदेशक विलियम डेलरिम्पल के साथ ‘‘लिगेसी आफ वायलेंस’’ सत्र में हुई बातचीत में ये विचार व्यक्त किए।
इस सत्र की शुरूआत करते हुए डेलरिम्पल ने एल्किंस की किताब को एक बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा कि उनकी सालों की मेहनत ने दुनिया के सामने इस सच को लाने में मदद की कि ब्रिटिश औनिवेशिक राज में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मूल निवासियों पर क्या क्या अत्याचार किए गए।
उन्होंने कहा कि एक्लिंस ने संबंधित दस्तावेजों को प्राप्त करने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी जिसके बाद ब्रिटिश विदेश विभाग को यह स्वीकार करना पड़ा कि ऐसे दस्तावेजों का एक अभिलेखागार है।
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में इतिहास की, पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता प्रोफेसर एल्किंस औपनिवेशिक इतिहास पर अपने गहन शोध के लिए जानी जाती हैं। उनकी किताब ‘‘इंपीरियल रेकनिंग: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ ब्रिटेन्स गुलाग इन केन्या’’ ने 2006 में सामान्य गैर गल्प श्रेणी में पुलित्ज़र पुरस्कार जीता था।
एल्किंस ने सत्र में बताया कि ‘‘लिगेसी ऑफ़ वायलेंस’’ के लिए उनका शोध कितना मुश्किल भरा रहा। उन्होंने बताया कि इसकी एक वजह यह थी कि हिरासत केंद्रों और ब्रिटिश-नियंत्रित औपनिवेशिक केन्या से जुड़े कई दस्तावेज़ गायब थे और टनों दस्तावेजों को नष्ट कर दिया गया था।
उन्होंने बताया कि 2009 में, ‘‘इंपीरियल रेकनिंग’’ के प्रकाशित होने के चार साल बाद, केन्या में ब्रिटिश हिरासत केंद्र के पांच बचे हुए लोगों ने ब्रिटिश सरकार पर मुकदमा किया था और एल्किंस उन बचे हुए लोगों की तरफ से एक गवाह के तौर पर पेश हुई थीं।
एल्किंस ने बताया कि जांच के दौरान जांचकर्ताओं को ब्रिटिश हिरासत केंद्रों से जुड़े 300 बक्से दस्तावेज़ मिले थे। एल्किंस ने इसके तुरंत बाद ‘‘लिगेसी ऑफ़ वायलेंस’’ के लिए शोध शुरू कर दिया जिसमें उन्होंने नए जारी किए गए दस्तावेज़ों के साथ-साथ 36 अन्य कॉलोनियों की 8,800 फाइलों की भी जांच की।
उनका यह शोध लोकतांत्रिक समाजों से आग्रह करता है कि वे औपनिवेशिक कानूनी ढांचों की गंभीरता से फिर से जांच करें और यह सवाल पूछें कि क्या लोगों को चुप कराने के लिए बनाए गए कानून आज सच में आज़ाद नागरिकों के लिए किसी काम के हैं?
उनकी किताब ‘‘लेगेसी ऑफ़ वायलेंस: ए हिस्ट्री ऑफ़ द ब्रिटिश एम्पायर’’ पिछले साल प्रकाशित हुई थी।
सत्र के अंत में उपस्थित दर्शकों ने इस गंभीर और रोचक चर्चा के लिए
अपने स्थान से खड़े होकर जोरदार तालियों से एल्किंस का अभिनंदन किया।
पांच दिवसीय जयपुर साहित्योत्सव सोमवार को संपन्न हो रहा है।
