आधुनिक हिंदू कानून की व्याख्या में प्राचीन ग्रंथों की भूमिका आज भी प्रासंगिक है

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सुप्रीम कोर्ट ने 13 जनवरी 2026 को एक ऐतिहासिक फैसले में विधवा बहू को उसके दिवंगत ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण (मेंटेनेंस) पाने के अधिकार को मान्यता दी है। फैसले में कोर्ट ने पारिवारिक दायित्वों के बारे में बताने के लिए मनुस्मृति का हवाला दिया। स्पष्ट है कि आधुनिक हिंदू कानून की व्याख्या में प्राचीन ग्रंथों की भूमिका आज भी बनी हुई है। यह फैसला इस बात का भी उदाहरण है कि किस तरह हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (एचएएमए) जैसे कानूनों की व्याख्या करते समय कोर्ट प्राचीन धर्मशास्त्रों को नैतिक और ऐतिहासिक संदर्भ के रूप में देखते हैं।

 

जानकारी के अनुसार डॉ. महेंद्र प्रसाद का निधन 27 दिसंबर 2021 को हुआ था और उन्होंने 18 जुलाई 2011 की पंजीकृत वसीयत छोड़ी थी। उनके तीन बेटे थे। 2 मार्च 2023 को बेटे रणजीत शर्मा की मौत हो गई जिसके बाद उनकी पत्नी गीता शर्मा ने खुद को आश्रित बताते हुए हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम (एचएएमए)  के तहत ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण माँगा। फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि ससुर की मृत्यु के समय गीता विधवा नहीं थीं और इसलिए वह कानून के तहत आश्रित नहीं मानी जा सकतीं।

 

20 अगस्त 2025 को हाई कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए कहा कि गीता शर्मा अब ससुर के बेटे की विधवा हैं और इस आधार पर उन्हें एचएएमए के तहत आश्रित माना जा सकता है। कोर्ट ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए भेज दिया। इस फैसले को कंचना राय और उमा देवी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। दोनों ने दावा किया कि वे लगभग 40 सालों से डॉ प्रसाद के साथ रह रही थीं। सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी प्रश्न यह रखा गया कि क्या ससुर की मृत्यु के बाद विधवा हुई बहू, हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम की धारा 21(अपप) के तहत आश्रित की श्रेणी में आती है या नहीं?

 

जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस वी एन भट्टी ने अपने फैसले में एचएएमए की सीधी  व्याख्या अपनाई। कोर्ट ने कहा कि धारा 21(अपप) में ‘बेटे की कोई भी विधवा’ लिखा है, इसमें यह शर्त नहीं है कि पति ससुर से पहले मरा हो। इसलिए समय अप्रासंगिक है और गीता शर्मा कानूनन आश्रित मानी जाएँगी। धारा 22 के अनुसार, ऐसे आश्रितों का भरण-पोषण संपत्ति पाने वाले वारिसों को करना होगा, खासकर तब जब आश्रित को विरासत में हिस्सा न मिला हो।

पीठ ने चेताया कि संकीर्ण व्याख्या करना अनुच्छेद 14 के तहत समानता का उल्लंघन होगा क्योंकि इससे विधवाओं को पति की मृत्यु के समय के आधार पर मनमाने ढंग से अलग किया जाएगा। साथ ही, कानून का उद्देश्य कल्याणकारी है और इसलिए अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानजनक जीवन के अधिकार को ध्यान में रखते हुए कमजोर महिलाओं को संरक्षण देना जरूरी है।

 

कोर्ट ने कहा कि जहाँ कानून में कमियाँ हो, वहाँ एचएएमए का सेक्शन 4 बिना कोड वाले सिद्धांतों (पारंपरिक सिद्धांत) को बनाए रखता है। कोर्ट ने मनुस्मृति अध्याय 8, श्लोक 389 का जिक्र किया जिसमें कहा गया है कि ‘किसी भी पत्नी, बेटे, पिता या माँ को नहीं छोड़ा जाना चाहिए। जो कोई भी इन बेगुनाह परिवार वालों को छोड़ता है, राजा उस पर छह सौ यूनिट का जुर्माना लगाए’। इसका आशय यह है कि परिवार के मुखिया और उसके उत्तराधिकारियों पर आश्रित महिला सदस्यों, विशेष रूप से स्वयं का भरण-पोषण न कर पाने वाली बहू की देखभाल का नैतिक और सामाजिक दायित्व होता है।

स्पष्ट है कि ससुर की यह जिम्मेदारी उसकी मृत्यु के बाद भी संपत्ति के उत्तराधिकारियों के माध्यम से जारी रहती है। एचएएमए  की धारा 22, धारा 19 का विस्तार करते हुए ससुर की मृत्यु के बाद भी भरण-पोषण के दावे को मान्यता देती है। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और सभी अपीलों को खारिज कर दिया।

 

जानकारों के अनुसार मौजूदा कानून में मनुस्मृति का इस्तेमाल एक संदर्भ के रूप में किया जाता है। अदालतें इसे परंपरा, नैतिक मूल्यों और सामाजिक संदर्भ को समझाने के लिए उद्धृत करती हैं, खासकर परिवार, महिलाओं की गरिमा और सामाजिक सुधार से जुड़े मामलों में। डॉ. भीमराव अंबेडकर भी इसी बात के पक्षधर थे। 1927 के महाड़ आंदोलन में उन्होंने जातिगत अन्याय के विरोध में मनुस्मृति जलाई लेकिन बाद में हिंदू कोड बिल की बहस के दौरान उन्होंने मनुस्मृति के उन विचारों का उल्लेख भी किया जो समानता और महिलाओं के संपत्ति अधिकारों जैसे प्रगतिशील सिद्धांतों की बात करते थे।

विश्लेषकों के अनुसार धर्मशास्त्र से आधुनिक हिंदू कानून तक की यात्रा में मनुस्मृति की भूमिका ऐतिहासिक रही है। दायभाग और मिताक्षरा जैसे हिंदू कानून के विद्यालय मनुस्मृति पर आधारित थे और विजयनश्वर जैसे टीकाकारों के माध्यम से इसका प्रभाव औपनिवेशिक हिंदू पर्सनल लॉ तक पहुँचा।

 

1950 के बाद बने हिंदू विवाह अधिनियम, उत्तराधिकार अधिनियम और एचएएमए  ने पुरानी कुरीतियों को दूर किया लेकिन विरासत, संयुक्त परिवार और भरण-पोषण जैसी व्यवस्थाओं को संवैधानिक सिद्धांतों के अधीन ही संरक्षित भी रखा। कोर्ट ने 2019 से पहले 7 बार मनु का उल्लेख किया है। कई हाईकोर्ट भी मनुस्मृति का संदर्भ लेते रहे हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने नारंग वर्सेज नारंग मामले में मनुस्मृति अध्याय 9, श्लोक 108 का हवाला देते हुए परिवार के कर्ता की आश्रितों खासकर पत्नी के प्रति जिम्मेदारी की बात कही। झारखंड हाई कोर्ट ने 2024 में एक मामले में यह पंक्ति उद्धृत की कि ‘जहाँ महिलाओं का सम्मान नहीं होता, वहाँ परिवार नष्ट हो जाता है’।

 

यह फैसला दिखाता है कि मनुस्मृति को कानून नहीं बल्कि संदर्भ के रूप में इस्तेमाल किया गया, वह भी संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 की कसौटी पर। धर्मशास्त्र से एचएएमए तक की यह सोच सुनिश्चित करती है कि परंपरा आधुनिक न्याय को दिशा दे, उस पर हावी न हो और गीता जैसी विधवाओं के अधिकार सुरक्षित रहें।

ऐसे उद्धरण यह दर्शाते हैं कि मनुस्मृति आज भी मार्गदर्शक है और यह न्याय के लिए काम करता है। गीता शर्मा की जीत यह संदेश देती है कि भारतीय न्यायपालिका सदियों पुराने सिद्धांतों को भी लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप ढालकर कमजोर वर्गों की रक्षा करने से नहीं हिचकती है।

 

रामस्वरूप रावतसरे

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