पत्र लेखन केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि विचारों, मूल्यों और जीवनदर्शन को अगली पीढ़ियों तक पहुँचाने का सबसे जीवंत तरीका है। विश्व साहित्य में कुछ पत्र ऐसे हैं जो न केवल व्यक्तिगत संबंधों के लिए लिखे गए, बल्कि वे मानवता के लिए कालजयी मार्गदर्शन बन गए।
ऐसे ही दो ऐतिहासिक और प्रेरणादायक पत्र हैं —
अब्राहम लिंकन का अपने पुत्र के शिक्षक के नाम पत्र और घनश्यामदास बिड़ला का अपने पुत्र बसंत कुमार बिड़ला के नाम पत्र ।
दोनों पत्र अलग समय, संस्कृति और परिस्थितियों में लिखे गए, लेकिन दोनों का उद्देश्य एक ही था — चरित्र निर्माण और जीवन के सच्चे मूल्यों की स्थापना।
अब्राहम लिंकन का शिक्षक को लिखा पत्र (1860 के दशक में)अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने अपने छोटे पुत्र के स्कूल में दाखिले के समय यह पत्र उसके शिक्षक को लिखा था। यह पत्र शिक्षा में केवल ज्ञान नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और जीवन कौशल के महत्व को दर्शाता है।
पूरा पत्र-
आदरणीय शिक्षक,
मेरा बेटा आज स्कूल जा रहा है।
मैं चाहता हूँ कि आप उसे यह सिखाएँ —
कि सभी लोग न्यायप्रिय नहीं होते, सभी लोग ईमानदार नहीं होते।
लेकिन हर बदमाश के पीछे एक नायक भी होता है, हर स्वार्थी राजनीतिज्ञ के पीछे एक समर्पित नेता भी होता है।
उसे यह सिखाएँ कि हर दुश्मन के साथ भी एक दोस्त छिपा होता है।
यह भी सिखाएँ कि जीत के साथ हार को भी गरिमा से स्वीकारना चाहिए।
उसे किताबों का मूल्य बताइए, लेकिन उसे आकाश में उड़ते पक्षियों, सूर्य की किरणों और हरी घास में छिपे फूलों का महत्व भी महसूस कराइए।
उसे यह सिखाएँ कि बेईमानी से कमाया एक रुपया, ईमानदारी से कमाए एक रुपये से भी अधिक महंगा पड़ सकता है।
उसे कठिन परिश्रम करना सिखाएँ।
उसे यह सिखाएँ कि भीड़ का अनुसरण करने के बजाय, सही मार्ग पर अकेले चलना भी साहस है।
उसे लोगों की बातें ध्यान से सुनना सिखाएँ, लेकिन जो भी सुने, उसे सत्य की कसौटी पर परखना भी सिखाएँ।
हर व्यक्ति में अच्छाई खोजने का प्रयास करे, लेकिन सावधान भी रहे कि किसी की बुराई से धोखा न खाए।
आपका,
अब्राहम लिंकन
. घनश्यामदास बिड़ला का अपने पुत्र को लिखा पत्र (1934)
भारत के महान उद्योगपति और राष्ट्रसेवक घनश्यामदास बिड़ला का यह पत्र उनके पुत्र बसंत कुमार बिड़ला को लिखा गया था। यह न केवल एक पिता का मार्गदर्शन है, बल्कि व्यापार, नैतिकता और जीवन प्रबंधन का सटीक दर्शन है।
पूरा पत्र —
चि. बसंत,
“यह जो लिखता हूँ उसे बड़े होकर और बूढ़े होकर भी पढ़ना, अपने अनुभव की बात कहता हूँ।
संसार में मनुष्य जन्म दुर्लभ है और मनुष्य जन्म पाकर जिसने शरीर का दुरुपयोग किया, वह पशु है। तुम्हारे पास धन है, तन्दुरुस्ती है, अच्छे साधन हैं, उनको सेवा के लिए उपयोग किया, तब तो साधन सफल है, अन्यथा वे शैतान के औजार हैं।
धन का मौज-शौक में कभी उपयोग न करना। ऐसा नहीं कि धन सदा रहेगा ही, इसलिए जितने दिन पास में है, उसका उपयोग सेवा के लिए करो। अपने ऊपर कम से कम खर्च करो, बाकी जनकल्याण और दुखियों का दुख दूर करने में व्यय करो। धन शक्ति है, इस शक्ति के नशे में किसी के साथ अन्याय हो जाना संभव है, इसका ध्यान रखो कि अपने धन के उपयोग से किसी पर अन्याय न हो।
अपनी संतान के लिए भी यही उपदेश छोड़कर जाओ। यदि बच्चे मौज-शौक, ऐश-आराम वाले होंगे तो पाप करेंगे और हमारे व्यापार को चौपट करेंगे। ऐसे नालायकों को धन कभी न देना। उनके हाथ में जाए, उससे पहले ही जनकल्याण के किसी काम में लगा देना या गरीबों में बाँट देना।
भगवान को कभी न भूलना। वह अच्छी बुद्धि देता है। इन्द्रियों पर काबू रखना, वरना यह तुम्हें डुबो देगी। नित्य नियम से व्यायाम-योग करना। स्वास्थ्य ही सबसे बड़ी सम्पदा है।
स्वास्थ्य से कार्य में कुशलता आती है, कुशलता से कार्यसिद्धि और कार्यसिद्धि से समृद्धि आती है। सुख-समृद्धि के लिए स्वास्थ्य ही पहली शर्त है। मैंने देखा है कि स्वास्थ्य से रहित होने पर करोड़ों-अरबों के स्वामी भी दीन-हीन बनकर रह जाते हैं।
भोजन को दवा समझकर खाना। स्वाद के वश होकर खाते मत रहना। जीने के लिए खाना है, न कि खाने के लिए जीना।”
– घनश्यामदास बिड़ला
चरित्र की नींव ईमानदारी और आत्मनियंत्रण पर है।
धन का उद्देश्य सेवा और जनकल्याण होना चाहिए।
शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन कौशल और नैतिकता सिखाए।
शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन, दोनों सफलता के मूल आधार हैं।
स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के लिए योगदान करना ही सच्ची उपलब्धि है।
आज जब शिक्षा और व्यवसाय, दोनों ही प्रतिस्पर्धा और लाभ-केंद्रित होते जा रहे हैं, तब इन पत्रों का महत्व और भी बढ़ जाता है। ये केवल अतीत की प्रेरक बातें नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शन हैं।
शम्भू शरण सत्यार्थी
