क्या हकीकत में दिग्विजय सिंह का राज्यसभा से मोहभंग हो गया है या कराया गया है?

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दिग्विजय सिंह अब राज्यसभा नहीं जाएंगे। मध्य प्रदेश की सियासत के ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री ने अचानक यह ऐलान करके सियासी हलकों में हलचल मचा दी है। दिग्विजय सिंह का मौजूदा कार्यकाल अप्रैल 2026 में समाप्त हो रहा है लेकिन इससे पहले ही उनके पीछे हटने की घोषणा ने दिल्ली से भोपाल तक कांग्रेस के भीतर चर्चाओं का दौर शुरू कर दिया है। सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि दिग्विजय सिंह का अचानक राज्यसभा से मोहभंग क्यों हुआ? वहीं यह सवाल भी उठने लगा कि दिग्विजय सिंह की जगह अब एमपी से कांग्रेस किसे राज्यसभा भेजेगी।

    दरअसल पार्टी सूत्रों के मुताबिक, दिग्विजय सिंह का यह फैसला कोई व्यक्तिगत नहीं बल्कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की रणनीतिक सोच का हिस्सा बताया जा रहा है। यह कदम कांग्रेस के उस नए राजनीतिक रोडमैप से जुड़ा माना जा रहा है जिसे राहुल गांधी पिछले कुछ वर्षों से लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी नेतृत्व का फोकस अब केवल संसद के भीतर आक्रामक विपक्षी भूमिका निभाने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि संगठन को जमीनी स्तर पर फिर से खड़ा करना प्राथमिकता बन चुका है। इसी सोच के तहत कांग्रेस के वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं को संगठनात्मक जिम्मेदारियों में लगाने और युवा नेताओं को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम हो रहा है। माना जा रहा है कि दिग्विजय सिंह को भी इसी रणनीति के तहत राज्यसभा की भूमिका से मुक्त कर दोबारा मैदान में उतारने की तैयारी है।

जानकारों के अनुसार पार्टी दिग्विजय सिंह को एक बार फिर मध्य प्रदेश में बड़े संगठनात्मक मिशन की जिम्मेदारी सौंप सकती है। 2017-18 में की गई उनकी 3300 किलोमीटर लंबी नर्मदा परिक्रमा आज भी कांग्रेस के लिए एक मजबूत राजनीतिक प्रतीक मानी जाती है। उस परिक्रमा ने न सिर्फ कार्यकर्ताओं में जान फूंकी थी, बल्कि 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी को वैचारिक और भावनात्मक बढ़त भी दिलाई थी। अब चर्चा है कि 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले एक और नर्मदा परिक्रमा या इसी तरह का कोई बड़ा जनसंपर्क अभियान दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में कराया जा सकता है, ताकि बिखरे संगठन को जोड़ा जा सके और युवा कार्यकर्ताओं को दिशा दी जा सके।

    इस बीच दिग्विजय सिंह के फैसले के बाद कांग्रेस के भीतर सामाजिक संतुलन की बहस भी तेज हो गई है। अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने खुलकर मांग रखी है कि राज्यसभा में इस बार दलित समाज को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उनका तर्क है कि मध्य प्रदेश की करीब 17 फीसदी अनुसूचित जाति आबादी की यह लंबे समय से अपेक्षा रही है। हालांकि इस मांग पर दिग्विजय सिंह ने साफ कर दिया कि टिकट का फैसला उनके हाथ में नहीं है लेकिन यह जरूर तय है कि वे अपनी सीट खाली कर रहे हैं।

दिग्विजय सिंह के हटने के साथ ही कांग्रेस की एकमात्र सुरक्षित मानी जा रही राज्यसभा सीट अब सियासी मुकाबले का केंद्र बन गई है। पार्टी के भीतर कई बड़े नामों की चर्चा शुरू हो चुकी है और माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में दिल्ली में लॉबिंग और समीकरण तेज होंगे। सबसे चर्चित नाम पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का है। समय-समय पर यह संकेत मिलते रहे हैं कि वे एक बार फिर केंद्र की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने के इच्छुक हैं। अगर कमलनाथ राज्यसभा की रेस में उतरते हैं, तो उनके राजनीतिक कद और अनुभव के चलते बाकी दावेदारों की राह आसान नहीं रहेगी।

इसके अलावा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी का नाम भी मजबूती से उभर रहा है। विधानसभा में मुखर भूमिका, सड़क से सदन तक सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख और संगठन पर पकड़ उन्हें युवा नेतृत्व के चेहरे के तौर पर पेश करती है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व पीसीसी चीफ अरुण यादव भी इस दौड़ में शामिल माने जा रहे हैं, जबकि पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के नाम पर भी चर्चा है, जो लंबे समय से किसी बड़ी जिम्मेदारी की प्रतीक्षा में बताए जाते हैं।

    मध्यप्रदेश से राज्यसभा की कुल 11 सीटें हैं जिनमें से आठ पर भाजपा और तीन पर कांग्रेस का कब्जा है। 2026 में तीन सीटें खाली हो रही हैं, लेकिन मौजूदा संख्या बल को देखते हुए कांग्रेस के लिए फिलहाल सिर्फ एक सीट ही सुरक्षित मानी जा रही है। ऐसे में दावेदारी की लड़ाई और भी दिलचस्प हो गई है, क्योंकि हर बड़ा नेता जानता है कि मौका एक ही है और दावेदार कई।

     राज्यसभा में अपने कार्यकाल के दौरान दिग्विजय सिंह भाजपा और आरएसएस के खिलाफ वैचारिक हमलों के लिए जाने जाते रहे हैं। उनकी मुखरता ने उन्हें सेक्युलर और प्रगतिशील तबकों में लोकप्रिय बनाया लेकिन साथ ही वे कई विवादों के केंद्र में भी रहे। हाल के दिनों में जब उन्होंने भाजपा-आरएसएस के संगठनात्मक ढांचे की तारीफ की और कांग्रेस में विकेंद्रीकरण की जरूरत बताई, तो सियासी हलकों में इसे भी उनके नए रोल की भूमिका के तौर पर देखा गया। यह भी कयास लगाये गये कि क्या शशि थरूर  थरूर की तरह दिग्विजय सिंह का भी कांग्रेस से मन भर गया है।

     कुल मिलाकर दिग्विजय सिंह का राज्यसभा से हटना कांग्रेस की बदलती रणनीति, पीढ़ीगत बदलाव और मध्य प्रदेश में संगठन को दोबारा मजबूत करने की कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है। इसमें वास्तविकता कितनी है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन  अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि कांग्रेस नेतृत्व इस खाली होने वाली सीट पर किसे मौका देता है और क्या यह फैसला पार्टी के भविष्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा या फिर पार्टी लाईन से अलग अपना बौद्धिक प्रदर्शन करने वाले नेताओं के साथ कांग्रेस में जो अब तक होता आया है, वह दिग्विजय सिंह के साथ भी होगा।

 

 

रामस्वरूप रावतसरे

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