सनातन संस्कृति : विश्व कल्याण का शाश्वत मार्ग

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सनातन संस्कृति जी की आज हर कोई चर्चा कर रहा है.   व्यक्ति,  परिवार ,समाज जीवन ,राष्ट्र जीवन और  विश्व मानवता के लिए इससे  शुभ कल्याणकारी और कुछ हो नहीं सकता जब हम सनातनी हो जाए ।

वास्तविकता  तो  यह है  कि   विनाश के  मुहाने पर खड़ी वैश्विक  समस्याओं  का समाधान  और  विश्व  मानवता  का  कल्याण  भी  केवल  सनातन  संस्कृति के आधार पर ही  किया जा सकता है  जो   “जियो और जीने दो “, सर्वे  

भवंतु सुखिनः  सर्वे  सन्तु निरामय सर्वे  भद्राणी  पाश्यंति,  मा कश्चित्  दुःख  भाग  भवेत “ की  अवधारणा  को  जीने   ऑर  आत्मसात् करने  के  मूल्य में  निहित है । सनातन धर्म या  संस्कृति केवल  शब्द  उद्घोष या स्लोगन मात्र नहीं है. यह सनातन संस्कृति के जीवन मूल्यों को धारण करने से ही सम्भव है । हमारे यहाँ मूल्य केवल शब्दों में  ही वर्णित  नहीं किए गए हैं बल्कि उन शब्दों का व्यावहारिक जीवन में परीक्षण की कसौटी पर परीक्षाएं भी हैं । सतयुग काल में राजा हरिश्चंद्र को सत्य बोलने की कितनी बड़ी  कठिन  ,  दुसह  , मृत्यु  से  भी  आधिक  पीड़ा  देने  वाली परीक्षा देनी पड़ी जग विदित है ।

  शासको की संताने भी उन्ही ऋषि आश्रमों में शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाते थे जंहा सभी बालक शिक्षा ग्रहण करने के लिए जाते सभी को एक सा नियम और अनुशासन का पालन करना होता था ।

 आज की तरह नहीं जब शिक्षा के अलग स्तर, पाठ्यक्रम,  सुबिधाये और व्यवहार जनित शिक्षा है । संस्कार, अनुशासन और संयम  शिक्षा से दूर हो गए हैं ।।

3 जनवरी  पौष माह की  पूर्णिमा से सनातन संस्कृति की अवधारणा ऋषि भारद्वाज जी  तपस्थली तीर्थ राज़ प्रयाग में त्रिवेणी के तट पर दूर तक इस कड़कड़ाती ठंड के बीच हज़ारो की संख्या में श्रद्धालु मौन व्रत धारण कर नित्य त्रिवेणी में प्रातः स्नान जप तप दान और ईश चिंतन कर सिया राम मैं सब जग जानी की अवधारणा को आत्मसात करने का अभ्यास करते हैं ।

   भगवान श्री कृष्ण का उद्घोष  ईश्वरह सर्व भूतनाम  हृदयेत तिष्ठति अर्जुन  व आचार्य  शंकर  के  अद्वैत दर्शन  की अवधारणा  जिसका सजीव वर्णन किया है । और  गुरु नानकदेव , संत कबीर साहब  जैसे  सनातन    संस्कृति के अनेक महान  संतो  महात्माओं  ने अपनी तपस्या  साधना  के माध्यम से परमसत्य को  अपने  अपने  तरह से  जाना. किसी  ने    वैष्णव,  किसी ने  शाक्त  , किसी  ने  तंत्र  किसी  ने  शक्ति  उपासाना ,योग  मार्ग ,हठ  योग ,  किसी  ने  भक्ति  भाव  , किसी  ने प्रेम  और  सेवा,   सदगुरु  भक्ति ,किसी  प्रकृति की उपासना  नदी  , समुद्र  ,  जलाशय ,  जंगल जीव जड़  प्रकृति  सबमें  उसी एक  परम तत्व  कों  बिभिन्न साधना  मार्गो  से जानकर  मानवता  के बिकास का  मार्ग दिखाया और उनके कष्टों से निवारण  के उपाय  दिए. साथ  ही समाज  व्यवस्था, राज्य व्यवस्था, न्याय  व्यवस्था तथा  अर्थ व्यवस्था का  मार्गदर्शन किया  है ।

सनातन   संस्कृति  असीम  निस्सीम है.  किसी सीमा में  बधी नहीं है.  यह  दुनिया की  सबसे  उद्दात्त , उदार संस्कृति है और  अन्तरिक्ष की तरह  ब्यापक है. इसे जाति   पाति,  संप्रदाय,  पूजा पद्धति में  आबद्ध  नहीं  किया जा सकता है ।

हम  यदि अपने को सनातनी  मानते हैं तो हम  सनातन धर्म के  मूल्यों को  पहले  अपने में  आत्मसात  करे , जाति    पाति  की    संकीर्ण सोच  और  अहमन्यता से ऊपर उठकर  सोचे , 

राजनीतिक निर्णय व नीतिया , राजनीतिक पद  प्रतिष्ठा, प्रशासनिक व्यवस्था ,पद प्रतिष्ठा  भरोसा  का आधार  कार्य कुशलता , कार्यदक्षता , अनुशासन , ईमानदारी  निष्ठा, लोककल्याण के  भावना  के बजाय  यदि निर्णय  का आधार   जाति  है तो  हम  जनता जनार्दन या  राष्ट्र  किसी का भी  भला नहीं कर सकते हैं  न ही  हम   सनातन संस्कृति को मानते हैं ।

 आज हम सभी  की दोहरी  जीवन शैली,  कार्य प्रणाली, दोहरे  जीवन  मूल्य  जग जाहिर है.  इससे न हम  अपना हित कर सकते हैं, न समाज का.  हमसे  तात्पर्य  हमारा  पूरा विश्व परिवार  बहुत  सूक्ष्मता से  बिना जाति    पाति के  पूर्वाग्रह के  समाज  की नीति नियंताओ , बुद्धिजीवी समाज  , बिचार  जगत के   लोग , न्याय  और  प्रशासनिक व्यवस्था के  लोग की हमारी सोच  और ब्यवस्था और  कार्यशैली  हमे  कन्हा  ले जा रही है  क्या  यही  सनातन  संस्कृति   के मूल्य है ?

  आज  जिस  प्रकार के  घटनाक्रम  सामने आ रहे हैं  यदि   सनातन संस्कृति के  मूल्यों  के अनुरूप  सोचें  तो सहज ही हम  निर्णय कर सकते हैं ।

 धन के  लोभ  की   अराजक मानसिकता 

 समाचार  मध्यमों से समाज  में  नित्य  घटने वाली  क्रूरतम  हिंसक घटनाएँ  हत्याएँ । मां  पिता  भाई  बहन  की  हत्याओं  की  घटनाये , नित्य  निरंतर  बढ़ते महिलाओं  और बच्चों के साथ घटित होती  घटनाएं ।

 राजनीतिक जीवन के मूल्य   आज  कहाँ  खड़े हैं.   किस तरह के लोग  लोग और  किन उद्देश्यों को लेकर  आ रहें हैं.  बिभिन्न राजनैतिक दलो का नेतृत्व किन लोगो को संरक्षण दे रहा है,  किन्हें  आगे  बढ़ा रहा है, यह सब  सनातन मूल्यों  के कितना अनुरूप है,  बिचारनीय  विषय है ।

   हरि  की  पैड़ी हरिद्वार  में काशी में  भगवती गंगा  जी की   अयोध्या  में  सरयू   मैया  सहित  बिभिन्न तीर्थों  में  स्नान आरती  पूजन मन  को   अत्यंत  आल्ह्वादित करने वाला है ।

लोककल्याणकारी  सेवाये  स्वास्थ  चिकित्सा  ,   शिक्षा ,स्कूल   कॉलेज  अस्पताल जो उद्योग  बन  गए   केजी  से लेकर  हज़ारो का शुल्क है. आउटसोर्सिंग   की  नौकरी कर  12,15,,18 , 20-22 हज़ार  प्रतिमाह पर  जीवन  यापन  करने  वाले  लोग  क्या  आपने  बच्चों  को  शिक्षा  दिला सकते है?  किसी  ने  बिचार  किया ? गुणवत्ता के   नाम पर  जो  संस्कार युवा पीढ़ी में  सामने  आ  रहे है, मूल्यांकन के लिए  पर्याप्त  है. वह मां  पिता बहुत  भाग्यशाली  जिनके बच्चे  मां  पिता और  परिवार के  प्रति  अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे है  अन्यथा  ओल्ड  ऐज  होम  है  यहाँ तक कि मां  पिता के  अंतिम संस्कार में भी  अब बच्चे  ऑनलाइन भाग  लेने लगे है । चिकित्सा ब्यवस्था में  तो व्यक्ति वस्तु बन  कर रह गया है. मनुष्यता  गौड़ है.  केवल  मनुष्य  शोषण  की  बस्तु है.  ब्यापार   का  धर्म  केवल  लाभ  और  हानि  है.  कोई  मानवता  और  संवेदना  नहीं होती है . यही अंतर   भारतीय और  पाश्चात्य संस्कृति में है.   हमने  पश्चिमी  देशों अमेरिका इंग्लैंड फ्रांस  आदि देशों से  प्रभावित होकर  जो मॉडल अपनाया,  उसके  ब्यापक   परिणाम  सामने आ रहे हैं ।

हम  सभी  इस पर  अवश्य विचार करें कि  हमारे  सनातन संस्कृति के  मूल्य  क्या  यही हैं ?

 

हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव

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