नयी दिल्ली, 16 जनवरी (भाषा) विधि आयोग की एक शीर्ष अधिकारी ने कहा है कि उच्चतम न्यायालय ने आवारा कुत्तों के मुद्दे पर अपने निर्देशों में ‘‘संतुलित दृष्टिकोण’’ अपनाया है, जो न तो पशु अधिकारों की अनदेखी करता है और न ही नागरिकों की जायज चिंताओं को कम करता है।
अधिकारी ने रेखांकित किया कि नगर निकायों, स्वास्थ्य विभागों और राज्य प्राधिकरणों के बीच प्रभावी समन्वय ही यह तय करेगा कि ये न्यायिक निर्देश वास्तव में सुरक्षित शहरों और मानवीय, दीर्घकालिक समाधानों में बदल पाते हैं या नहीं।
तेइसवें विधि आयोग की सदस्य सचिव अंजू राठी राणा ने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में यह बात कही।
पूर्व केंद्रीय विधि सचिव राणा ने बताया कि मीडिया में सामने आई कुत्तों के काटने की बढ़ती घटनाओं और उनसे जुड़े जोखिमों का स्वतः संज्ञान लेते हुए, शीर्ष अदालत ने पहले के निर्देशों में संशोधन किया और आवारा कुत्तों को पकड़ने, बंध्याकरण करने, कृमिनाशक दवा देने और टीकाकरण के लिए पशु जन्म नियंत्रण नियम (एबीसी), 2023 का अनुपालन करने का निर्देश दिया।
भारतीय विधि सेवा की वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘‘ ये उपाय जनसंख्या नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अनिवार्य ढांचे का मूल आधार बने हुए हैं। एबीसी नियम, 2023 के तहत, आवारा कुत्तों का बंध्याकरण और टीकाकरण किया जाना है और उन्हें उन्हीं इलाकों में वापस छोड़ा जाना है, जहां से उन्हें उठाया गया था, जिससे तदर्थ निष्कासन के बजाय एक नियम-आधारित प्रणाली स्थापित हो सके।’’
उन्होंने कहा, ‘‘इस आदेश में नोडल अधिकारियों की नियुक्ति, त्रैमासिक निरीक्षण और अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए नगर निकायों की जवाबदेही परिभाषित की गई है।’’