अगर कड़े अभ्यास के दौरान खिलाड़ी कोच की सलाह नहीं लेते, तो व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है: टास्क फोर्स

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नयी दिल्ली, 14 जनवरी (भाषा) पुलेला गोपीचंद के नेतृत्व वाले कार्यबल (टास्क फोर्स) का मानना है कि भारत का कोचिंग तंत्र खंडित और असंगत है तथा संस्थागत मजबूती के बजाय व्यक्तिगत प्रयासों पर बहुत अधिक निर्भर है।

इस टास्क फोर्स को खेल मंत्रालय ने नियुक्त किया है जिसने 43 पेज की अपनी रिपोर्ट में ‘अभ्यास मुश्किल होने पर’ खिलाड़ियों के ‘असहज होने’ पर कोच के अधिकार को प्राथमिकता देने की वकालत की है।

इस रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय उत्कृष्टता हासिल करने वाली प्रणाली को सुधारने के लिए कई उपाय सुझाए गए हैं। टास्क फोर्स का मानना है कि दशकों पहले बनाई गई इस प्रणाली के कारण ‘यह वर्तमान समय में आवश्यक पैमाना, गुणवत्ता और गति प्रदान नहीं कर सकती।’

टास्क फोर्स ने अपनी रिपोर्ट में त्रिस्तरीय प्रणाली और खिलाड़ियों की तरह कोच के लिए भी सरकार द्वारा वित्त पोषित लक्ष्य ओलंपिक पोडियम कार्यक्रम जैसी योजना शुरू करने का प्रस्ताव दिया है।

राष्ट्रीय बैडमिंटन कोच गोपीचंद की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय समिति ने ‘उधार में लिए गए समाधानों’ को प्राथमिकता नहीं देने की सिफारिश की है जो स्पष्ट रूप से विभिन्न खेलों में विदेशी कोच को नियुक्त करने की प्रवृत्ति का संदर्भ है।

टास्क फोर्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा, ‘‘यदि हम वैश्विक खेल शक्ति बनने की आकांक्षा रखते हैं तो हमें इस कार्य की जटिलता से बचना बंद करना होगा। अपने ज्ञान, अपनी विशेषज्ञता और अपनी प्रणालियों का निर्माण ही निरंतरता, आत्मनिर्भरता और दीर्घकालिक विकास सुनिश्चित करने का एकमात्र तरीका है।’’

इसमें कहा गया है, ‘‘हमारी अपेक्षाएं और हमारी वर्तमान संस्थागत क्षमताएं पूरी तरह से अलग-अलग मापदंडों पर काम करती हैं। यह अंतर किसी तरह की आलोचना नहीं है बल्कि यह इस बात की स्वीकृति है कि भारत खेल के एक नए युग में प्रवेश कर चुका है और हमें एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाना होगा जो भविष्य के अनुरूप हो।’’

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि भारत का कोचिंग तंत्र खंडित और असंगत है तथा संस्थागत के बजाय व्यक्तिगत प्रयासों पर अत्यधिक निर्भर है।

रिपोर्ट में कोच और खिलाड़ियों के बीच संबंधों का जिक्र भी किया गया है। अपने सख्त रवैये के लिए मशहूर गोपीचंद ने अक्सर कोच और खिलाड़ी के बीच आपसी संबंधों को महत्व दिया है और उनकी यह विचारधारा सिफारिशों में भी झलकती है।

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘हर सुधार असहज होने की सीमा पर टिका होता है और कभी-कभी कोच अनजाने में ही थोड़ा कठोर हो जाता है।’’

पैनल ने यह स्वीकार किया है कि ऐसा कोई परिपूर्ण फार्मूला नहीं है जिसे हर खिलाड़ी सार्वभौमिक रूप से स्वीकार करता हो, इसलिए कोच के दृष्टिकोण को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

इसमें कहा गया है, ‘‘यदि कार्यक्रम लगातार प्रगति करता है तो व्यवस्था को कोच के फैसले पर भरोसा करना चाहिए। किसी भी खिलाड़ी को फायदा उठाने के लिए कोच के अधिकारों पर विश्वास करना चाहिए और अपने सबसे असहज क्षणों के दौरान भी प्रक्रिया के प्रति समर्पित रहना चाहिए।’’

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘अगर खिलाड़ियों को लगता है कि अभ्यास में कठिनाई आने पर वे शीर्ष अधिकारियों से अपील करके कोच को दरकिनार कर सकते हैं, तो पूरी प्रक्रिया ध्वस्त हो जाती है। बचाव का रास्ता खोलने वाली व्यवस्था अनजाने में अनुशासन, प्रदर्शन संस्कृति तथा व्यक्ति और ग्रुप दोनों के दीर्घकालिक विकास को कमजोर करती है।’’

रिपोर्ट में एक ऐसी प्रणाली की मांग की गई है जहां कोच के अधिकार का ‘‘सम्मान किया जाए, उसे संरक्षित किया जाए और स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए।’’

इसमें कहा गया है, ‘‘कोच को अपनी कार्यप्रणाली को लागू करने, खिलाड़ियों को उचित रूप से प्रेरित करने और प्रदर्शन के उच्च मानकों को बनाए रखने के लिए बिना किसी डर के पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए।’’

रिपोर्ट में आवधिक मूल्यांकन की प्रणाली की भी सिफारिश की गई है ताकि कोच खिलाड़ियों के कल्याण और परिणामों के लिए जवाबदेह हों।

रिपोर्ट में महिला कोच को एक संतुलित और आधुनिक कोचिंग प्रणाली का अनिवार्य हिस्सा बनाने की भी सिफारिश की गई है। इसके साथ ही पूर्व खिलाड़ियों को कोच के रूप में प्राथमिकता देने की बात भी की गई है।

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