वेनेज़ुएला, तेल और ट्रंप: किस ओर मुड़ रही है विश्व व्यवस्था

0
sdewd

वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी की अमेरिकी विशेष बलों द्वारा गिरफ्तारी और उन्हें न्यूयॉर्क ले जाकर अदालत में पेश किया जाना केवल कानूनी कार्रवाई नहीं है। यह घटना अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मंच पर एक नए और असहज दौर की आहट है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान कि “अमेरिका वेनेज़ुएला को तब तक चलाएगा, जब तक सुरक्षित और समझदार सत्ता परिवर्तन न हो जाए”, संप्रभुता बनाम शक्ति के उस पुराने सवाल को फिर सामने रख देता है, जिसके उत्तर पर आज की विश्व व्यवस्था टिकी है। सवाल केवल इतना नहीं कि मादुरो दोषी हैं या निर्दोष; बड़ा सवाल यह है कि क्या 21वीं सदी में भी अंतरराष्ट्रीय कानून ताकत के आगे उतना ही कमजोर साबित हो रहा है, जितना शीतयुद्ध के दौर में होता आया था।

ट्रंप प्रशासन मादुरो पर नार्को–टेररिज्म, ड्रग–तस्करी और हथियारों के अवैध लेन–देन के आरोप लगा रहा है। इन आरोपों की सच्चाई अदालत में तय होगी पर जिस अंदाज में एक संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष को उठाकर अमेरिकी न्यायपालिका के समक्ष लाया गया, उसने वैश्विक राजनीति के मूल सिद्धांत पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। क्या अब “सीमाओं के भीतर की संप्रभुता” से अधिक महत्व “सीमाओं के पार की शक्ति” को मिल रहा है? यह भी उतना ही सच है कि नार्को–टेररिज्म जैसे शब्द केवल कानूनी परिभाषाएं नहीं होते, वे राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने के औजार बन जाते हैं। पहले किसी शासन को वैश्विक खतरा घोषित किया जाता है, फिर लोकतंत्र और मानवाधिकारों की चिंता जताई जाती है और अंततः हस्तक्षेप को नैतिक जामा पहना दिया जाता है।

इस प्रकरण को समझने के लिए वेनेज़ुएला के तेल–भंडार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार का मालिकाना हक किसी भी महाशक्ति के लिए रणनीतिक मसला बन जाना स्वाभाविक है। लगभग 300 अरब बैरल कच्चे तेल के भंडार के साथ वेनेज़ुएला ऊर्जा–राजनीति का केन्द्रीय पात्र है। इराक और लीबिया से लेकर ईरान तक के उदाहरण बताते हैं कि जहां संसाधन अधिक होते हैं, वहां लोकतंत्र और मानवाधिकार की चिंता अक्सर अधिक मुखर हो जाती है। ट्रंप का यह कथन कि “तेल हम अपने पास रखेंगे”, केवल राजनैतिक भाषा–भंगिमा नहीं, बल्कि उस सोच की बानगी है जिसमें ऊर्जा–सुरक्षा और वैश्विक वर्चस्व गहरी तरह गुंथे हुए हैं।

वेनेज़ुएला के भीतर की वास्तविकताएं भी सरल नहीं हैं। आर्थिक संकट, महंगाई, पलायन, भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन ने देश की सामाजिक संरचना को झकझोर दिया है। लाखों नागरिक देश छोड़ चुके हैं। मादुरो लंबे समय से आरोप लगाते रहे हैं कि अमेरिका “ड्रग्स के खिलाफ युद्ध” को बहाने की तरह इस्तेमाल कर रहा है और लक्ष्य अंतत: वेनेज़ुएला के तेल–संसाधनों पर नियंत्रण है। यह तर्क कितना सच है, यह इतिहास तय करेगा, लेकिन यह प्रश्न बना रहेगा कि क्या किसी देश की आंतरिक राजनीतिक या आर्थिक विफलताओं का समाधान बाहरी सैन्य हस्तक्षेप या “कानूनी गिरफ्तारी” के जरिए खोजा जाना चाहिए।

भारत और दुनिया की प्रतिक्रिया

इस पूरे घटनाक्रम में भारत की प्रतिक्रिया भी स्वाभाविक रूप से चर्चा में है। भारत ने कड़े शब्दों का प्रयोग नहीं किया, न ही किसी पक्ष का खुला समर्थन किया। उसने शांति, संवाद और स्थिरता की अपील की। आलोचकों के अनुसार यह प्रतिक्रिया अत्यधिक सतर्क है, जबकि समर्थकों की दृष्टि में यह परिपक्व कूटनीति का उदाहरण है। वस्तुत: भारत आज बहुध्रुवीय विश्व में खड़ा है, जहां एक ओर अमेरिका रणनीतिक साझेदार है तो दूसरी ओर रूस, ईरान और लैटिन अमेरिका के देश ऊर्जा और व्यापार के महत्वपूर्ण सहयोगी हैं। यूक्रेन, गाजा और अब वेनेज़ुएला—इन तीनों प्रसंगों में भारत का संयत रवैया एक व्यापक रणनीतिक निरंतरता का हिस्सा प्रतीत होता है।

भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन कैसे बनाए। ग्लोबल साउथ का स्वर बनने की आकांक्षा उसी समय सार्थक होगी जब भारत कानून–आधारित विश्व व्यवस्था के पक्ष में स्पष्ट और सुसंगत खड़ा दिखाई दे। साथ ही यह भी यथार्थ है कि आज की विदेश नीति केवल आदर्शवादी घोषणाओं के सहारे नहीं चलती; उसे ऊर्जा–सुरक्षा, सामरिक सहयोग और आर्थिक हितों के ठोस धरातल पर आगे बढ़ना होता है।

भारत के लिए यह आत्ममंथन का क्षण भी है। उसे तय करना होगा कि वह वैश्विक नैतिकता, राष्ट्रीय हित और कूटनीतिक संतुलन के त्रिकोण में किस बिंदु पर खड़ा रहना चाहता है। कभी–कभी रणनीतिक चुप्पी भी अपने आप में संदेश होती है और साफ–साफ बोलना भी अपनी कीमत मांगता है। परीक्षाएं केवल छोटे देशों की नहीं हो रहीं, बड़ी शक्तियों और उभरते नेतृत्वों की भी हो रही हैं।

चीन और रूस की तीखी प्रतिक्रिया ने वेनेज़ुएला प्रकरण को केवल अमेरिका बनाम मादुरो के सवाल से आगे निकालकर बड़े भू–राजनीतिक टकराव का रूप दे दिया है। लैटिन अमेरिका लंबे समय से अमेरिका की पारंपरिक प्रभाव–क्षेत्र माना जाता रहा है। अब चीन की आर्थिक पैठ और रूस की सक्रियता ने इस समीकरण को बदल दिया है। परिणामस्वरूप वेनेज़ुएला जैसे मामले नए शीतयुद्ध की आहट देते नजर आते हैं, जहां टकराव केवल विचारधाराओं का नहीं, बल्कि संसाधनों, बाजारों और प्रभाव–क्षेत्रों का है।

आगे क्या होगा

आगे का रास्ता अनिश्चितताओं से भरा है। मादुरो के विरुद्ध कानूनी प्रक्रिया चलेगी, घरेलू राजनीति और अधिक ध्रुवीकृत होगी और अंतरराष्ट्रीय समुदाय अपने–अपने हितों के अनुसार अपनी स्थिति तय करेगा। सबसे अधिक कीमत आम नागरिक चुकाएंगे—अस्थिरता, बेरोजगारी, पलायन और असुरक्षा के रूप में। यही हर सत्ता–खेल की सबसे बड़ी मानवीय विडंबना है।

इस घटना ने एक बुनियादी प्रश्न को फिर से सामने ला खड़ा किया है—क्या कोई भी शक्तिशाली राष्ट्र दूसरे देश के निर्वाचित नेतृत्व को इस तरह पकड़कर अपनी अदालत के कटघरे में खड़ा कर सकता है? यदि इसका मौन समर्थन जारी रहा, तो अंतरराष्ट्रीय कानून की मूल अवधारणा ही खोखली हो जाएगी। यह केवल वेनेज़ुएला का मामला नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि दुनिया नियमों से चलेगी या केवल ताकत तय करेगी कि नियम क्या हों।

 

अंतत: वेनेज़ुएला का प्रकरण यह स्पष्ट करता है कि विश्व व्यवस्था संक्रमण के दौर में है। नियम बने हुए हैं, पर उनकी व्याख्या ताकतवर के हाथ में है। लोकतंत्र और मानवाधिकार की भाषा अब भी बोली जा रही है, पर उसके पीछे हितों का गणित पहले से कहीं अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। आने वाले समय में फैसला अदालत में होगा, पर इतिहास यह दर्ज जरूर करेगा कि इस मोड़ पर दुनिया किस दिशा में मुड़ी।

 

राजेश जैन

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *