आनंदमय विद्यालय निर्माण के लिए सामूहिक चेतना आवश्यक

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प्राथमिक शिक्षा में काम करते हुए मुझे 30 वर्ष होने को हैं। इन तीस वर्षों में शैक्षिक एवं सामाजिक परिवेश में हुए परिवर्तन का साक्षी रहा हूँ। ब्लैकबोर्ड से स्मार्टबोर्ड तक, टाट-पट्टी से चेयर-बेंच तक, चॉक-खड़िया से मार्कर और स्केच पेन तक तथा पंजिकाओं से टैबलेट एवं कम्प्यूटर तक हुए बदलाव से विद्यालयी परिवेश में बेहतरी हुई है, किंतु विद्यालय और समुदाय के बीच दूरी भी बढ़ती गयी है और समाज के एक महत्वपूर्ण नेतृत्वकर्ता शैक्षिक, सामाजिक एवं साँस्कृतिक केंद्र के रूप में विद्यालय की पहचान में कमी आई है परंतु सर्जना के रास्ते बंद नहीं हुए हैं, कभी बंद होते भी नहीं। अभी भी बहुत सकारात्मक बदलाव होने आवश्यक है, वह है सामूहिक मनोवृत्ति में बदलाव, शिक्षकों की शैक्षिक एवं गैर-शैक्षिक कार्यों के दबाव से मुक्ति और विद्यालयों के प्रति सामाजिक दृष्टि में रचनात्मक बदलाव। यह कैसे होगा,  चिंतन-मनन और क्रियान्वयन आवश्यक है। 

 

       प्राथमिक विद्यालय से लेकर संकुल और बीआरसी स्तर तक काम किया है। इन वर्षों में विद्यालय को लेकर शिक्षक, विद्यार्थी, समाज और अधिकारी वर्ग की दृष्टि, सोच एवं कल्पना को समझने का अवसर मिला। इनमें से प्रत्येक वर्ग विद्यालय को बेहतर बनाना चाहता है। किंतु, विद्यालय बेहतर बनाने की दृष्टि, कल्पना एवं कार्य योजना अलग-अलग हैं। विभागीय अधिकारियों की दृष्टि में सरकार द्वारा प्रेषित धनराशि का उचित उपभोग कर आवश्यक संसाधन जुटा विद्यालयों को आकर्षक बना 6 से 14 आयु वर्ग के बच्चों को विद्यालय से जोड़ने, उनकी नियमित उपस्थिति एवं ठहराव सुनिश्चित करने और न्यूनतम अधिगम क्षमता की सम्प्राप्ति होने, बच्चों तक सुविधाओं की पहुँच होने का विचार वरीयता में है। वहीं अभिभावक चाहते हैं कि विद्यालयों में बेहतर पढ़ाई-लिखाई का वातावरण तैयार हो ताकि उनके पाल्यों को समुचित शिक्षा-संस्कार मिल सके और वे एक अदद नौकरी लायक तैयार हो पाएँ।

 

विद्यार्थी वर्ग की इच्छा है कि पढ़ाई के साथ खेलने-कूदने के भरपूर मौके सुलभ हों, उन पर रोक-टोक न हो। वहीं शिक्षक चाहते हैं कि विद्यालय समय अवधि में बच्चों के साथ सार्थक समय गुजारें, उनको पढ़ने-पढ़ाने हेतु समय एवं संतुष्टि मिले। परंतु तमाम गैर-शैक्षणिक कार्यों में ड्यूटी के कारण अध्यापन कर्म की नियमितता बाधित होती है। किंतु, यह भी सच है कि शिक्षकों में विद्यालय में बहुत बड़ा बदलाव करने का भाव नहीं दिखता, क्योंकि उनकी अपनी सीमाएँ हैं लेकिन इन्हीं में से कुछ ऐसे शिक्षक, अधिकारी एवं अभिभावक हैं जो विद्यालय के प्रति एक बिलकुल अलग नजरिया रखते हैं। वे कुछ अलग सोचते हुए सीखने-सिखाने के नये रास्ते खोजते हैं।

 

      वे विद्यालय को ऐसी जगह के रूप में देखते हैं जहाँ विद्यार्थियों को अपने ज्ञान निर्माण के लिए बाधारहित प्रेरक बाल मैत्रीपूर्ण स्थान मिले, जहाँ परस्पर संवाद से पढ़ने-लिखने एवं ज्ञान अर्जन के नये रास्ते खुलें, जहाँ सामूहिकता का भाव पनपे, जहाँ लोकतांत्रिक मूल्य विकसित हों। समग्रता में कहें तो विद्यालय में आनंदमय परिवेश की निर्मिति हो। यह तभी सम्भव है जब शिक्षक को काम करने की स्वतंत्रता हो, कल्पना के क्रियान्वयन के सहज अवसर  और उसकी सराहना-स्वीकृति हो। समुदाय में विद्यालय के प्रति श्रद्धा एवं आत्मीयता का भाव हो। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा होता दिखता नहीं, क्योंकि पूरी व्यवस्था एक निश्चित प्रक्रिया के अधीन तय साँचे में संचालित है। कार्यों के बोझ तले दबे व्यक्ति से रचनात्मकता की आशा निरर्थक है। रचनात्मकता की अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्रता, आत्मीयता एवं मधुरता का भाव आवश्यक है।  तमाम चुनौतियों एवं बाधाओं से जूझते हजारों शिक्षक-शिक्षिकाएँ अपने विद्यालयों में खुशियों भरा वातावरण बनाकर बच्चों के साथ काम कर रहे हैं। शिक्षक एवं विद्यार्थियों के बीच मधुर एवं आत्मीयतापूर्ण सम्बंध बने हैं, जहाँ बच्चों के लिए अभिव्यक्ति के अनुकूल अवसर हैं। उनमें डर-भय नहीं है, प्रेमभरा स्वानुशासन है। कहीं-कहीं समुदाय भी साथ खड़ा दिखाई देता है। पर ये उदाहरण अँगुलियों पर गिनने लायक ही हैं, क्योंकि शिक्षक एवं समुदाय के मन में विद्यालय को लेकर बनी आम समझ सतही एवं नीरस है। स्मरणीय है, शिक्षकों एवं समाज को मिलकर बेहतर समझ के साथ ही बड़े परिवर्तन ‘आनंदमय विद्यालय’ रचना की ओर बढ़ा जा सकता है।

 

        ईंट, सीमेंट, लकड़ी एवं लोहा से निर्मित और आकर्षक पुता-लिपा भवन एवं अन्य संसाधन एकत्रित कर लेना भर विद्यालय होना नहीं है। मुझे लगता है कि विद्यालय एक जीवंत इकाई है। विद्यालय का भवन यदि शरीर है तो बच्चे प्राण हैं और बिना प्राण के देह मृत है, निष्प्राण है। बच्चे ही विद्यालय हैं। किसी विद्यालय परिसर में गूँजता बच्चों का कलरव विद्यालय का स्पंदन बनता है। बच्चों की दौड़-भाग और अन्यान्य गतिविधियाँ विद्यालय को सचेतन करती हैं। बच्चों की उपलब्धियाँ ही रोपे गये फूलों की सुगंध बन बिखरने लगती है। बच्चों का कार्य-व्यवहार उन्हें घर-परिवार एवं समाज में एक आदर्श पहचान देता है, तब विद्यालय गर्व करता है। विद्यालय हर्ष से खिल उठता है, क्योंकि विद्यालय के प्रति तब समाज में आदर एवं आत्मीयता का निर्झर बहने लगता है। किंतु बिना समुदाय के सहयोग एवं अपनेपन के भाव से कोई विद्यालय कभी भी जीवन प्राप्त नहीं कर सकता। जब शिक्षक, शिक्षार्थी और समुदाय साथ-साथ हँसते-गाते चलने लगते हैं तो विद्यालय आनंदघर बनने लगता है।

 

       आनंदघर विद्यालय एक ऐसी परिकल्पना है जहाँ बच्चे अपनी सर्जना का उत्सव मना सकें, जहाँ वे अपनी स्थानीयता के साथ कदमताल करते हुए हर पल कुछ नया सीखें-समझें, कुछ नया रचें-बुनें। जहाँ वे खुशी-खुशी चहकते हुए आना चाहें। जहाँ संवाद से शिक्षा का रास्ता खुले, जहाँ कक्षाओं के ‘ब्लैकबोर्डों’ में पाठ्य-पुस्तकों के निश्चित प्रश्नोत्तर नहीं बल्कि बच्चों के अनुभव शब्द बन अंकित हो जायें। जहाँ विद्यालय सम्बंधित निर्णयों में बच्चों की भागीदारी हो, उनसे जाना जाये कि वे क्या चाहते हैं, क्योंकि व्यवस्था तो उन्हीं के लिए की जाने वाली है। कह सकते हैं, विद्यालय एक ऐसा स्थान बनें जहाँ बच्चों में उत्साह, उल्लास एवं उमंग की भाव त्रिवेणी प्रवहमान हो। जहाँ न दण्ड हो न पुरस्कार। त्रुटियों-गलतियों में डाँट नहीं, सुधार के सहज समन्वित प्रयास हों। विद्यालय के दुःख-सुख में सब सहभागी हों।‌

 

         मेरा विचार है, आनंदमय विद्यालय निर्माण के लिए सामूहिक चेतना अत्यावश्यक है। यह एक पक्षीय एवं व्यक्तिगत प्रयास से नहीं बल्कि समवेत ऊर्जा के समन्वित प्रयत्न से ही सम्भव होगा।‌ तभी आनंदघर विद्यालय निर्माण का स्वप्न पूर्ण हो धरातल पर साकार हो सकेगा।

         

प्रमोद दीक्षित मलय

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