जीवन में हर व्यक्ति सुख चाहता है। हां, सुख के पैमाने सबके अलग हो सकते हैं। किसी को अमीरी सुख का पर्याय नजर आती है तो किसी को सच्चा प्यार करने वाला जीवन साथी। किसी को सत्ता में खुशियों दिखती हैं तो किसी को बुलंदियों की प्रसिद्धि में। बुलंदी को छूने की चाह रखने वाले भूल जाते हैं जैसा कि किसी शायर ने कहा है-
*शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है*
*जिस डाल पर बैठे हो वो टूट भी सकती है।*
बाजारवाद ने छोटे बड़े अमीर गरीब सभी को बरगला रखा है। उपभोक्ता संस्कृति ने जीवन मूल्यों पर कुठाराघात किया है। पैसा फैंकों तमाशा देखो, वह चाहे फाइव स्टार का अनेक कोर्स वाला डिनर हो या मल्टीप्लेक्स की लक्जरी में बैठकर देखी गई कोई फिल्म या ब्रान्डेड कपडों की खरीददारी। इन चीजों ने मिडिल,लोअर मिडिल क्लास को ऐसा लुभाया है कि लोग अपनी जेब देखे बगैर खरीदते हैं और जब कड़की सताने लगती है तो आर्थिक और मानसिक दुष्चिंताओं के कुचक्र में धंसते चले जाते हैं।
अगर व्यक्ति थोड़े में प्रसन्न होने की कला सीख ले तो उसके लिये सुख के मौकों की कमी नहीं है। छोटी-छोटी चीजें जैसे कुछ रंगीन पत्थर, पटरी पर से खरीदी दो चार रूपये की माला, सस्ती सी कोई नयी कलम, अच्छी सी किताब या सस्ते से खिलौने। इधर-उधर से इकट्ठी की गई रंगीन तस्वीरें भी किसी महिला को अपार सुख दे सकती हैं। बच्चों में तो ये कला कुदरती होती है तब तक जब तक बडे़ उन्हें बिगाड नहीं देते।
प्रकृति से जुड़ाव रखने वालों को इसके सानिध्य में अपार सुख मिलता है। लेकिन यह भी सच है कि कोई कितनी देर तक प्रकृति को निहार सकता है। इसी तरह म्युजिक भी एक सीमा तक ही सुनाया या गाया जा सकता है। किसी को बिस्तर पर लेटे रहना बहुत सुकून देता है। मगर ऐसा कोई कितनी देर तक कर सकता है। रात के सात आठ घंटे आराम के लिये कम नहीं होते। ऊब इंसानी जिन्दगी का आवश्यक हिस्सा है।
सुखी रहने के लिए व्यस्त रहना जरूरी है। जार्ज बनार्ड शॉ का मानना था कि दुखी और चिन्तित होने के लिए मनुष्य के पास फालतू वक्त होना चाहिए। जिसके पास करने के लिए ढेरों काम पड़ा है, उन्हें इतनी फुर्सत कहां होगी कि बेकार की बातें सोचे और चिंता और दुख में डूबे।
सुखी रहने के लिए दिमागी संतुलन अति आवश्यक है और यह आसानी से नहीं बनता। इसके लिये निरंतर प्रयत्न करना पडता है। आजकल जीने की कला सिखाने वाले गुरूओं की बाढ़ सी आई हुई है। लोगों की तनावग्रस्त जिन्दगी, उससे उपजता मानसिक असंतुलन और उससे निपटने के लिए इधर उधर गुरूओं को खोजना । यह सब इन धर्म गुरूओं के लिए वरदान बन गया है। उनकी इस कमजोरी
आध्यात्म भी आज बिकाऊ सामग्री बन गया है।
लोग यह नहीं जानते कि सुख तो हमारे भीतर है, कस्तूरी के मृग की तरह हम उसे इधर उधर ढूंढते फिरते हैं। वह सुख की चाह ही है जो लोगों को फिर से धर्म और आध्यात्म की ओर उन्मुख कर रही है। लेकिन धर्म का आधुनिक संस्करण सिर्फ उनकी जेबें खाली करता है। आज बच्चों की मासूमियत खत्म होती जा रही है। वे समय से पहले प्रौढ़ हो रहे हैं। मासूमियत अपने आप में एक सुख है।
इंग्लिश में कहावत है इग्नोरेंस इज ब्लिस। हमारी त्रासदी यह है कि हम ओवर स्मार्ट बनते जा रहे हैं। मोबाइल आज का भगवान है। हर समय उसी की आरती उतारते भक्त गण दुनिया से बेगाने हो रहे हैं। क्या जब कम्प्यूटर,लैपटॉप या मोबाइल नहीं था तब लोग पिछड़े और मूर्ख थे? मोबाइल आज की जनरेशन की लाइफ लाईन है। यह किस प्रकार का जीवन है ?
आधुनिक युग के इन सब साधनों ने व्यक्ति को स्व-केन्द्रित बना दिया है। बड़े बुजुर्गों के लिए आज घर के अन्य सदस्यों के पास जरा भी वक्त नहीं। सेवा की बात दूर, विदेशों में बसी संतान, उनके अंतिम समय में भी उनके पास नहीं होती। क्या यही है सुख ? सिर्फ डॉलर कमाना, या अपने ही देश में धन कमाना ?
बड़े बूढों का आशीर्वाद न हो जहां वह सुख कैसा है? उनकी हंसी छीनकर उन्हें लाफ्टर क्लबों की राह दिखाई जा रही है। यह है हमारी प्रगति। बच्चों को क्रैच में छोडते हुए क्या उनका भीतरी क्रन्दन हम सुन पाते हैं?
खुशी रिलेटिव टर्म है। आप जंगल में अकेले खुश रह सकते हैं ? खुश आप दूसरों के साथ रहते हैं, उनके सुख दुख में काम आकर। अपनों की खुशी को अपनी खुशी समझकर । परोपकार में भी आत्मिक सुख मिल सकता है।
वह सुख सच्चा सुख नहीं हो सकता जिसमें और भी शामिल न हों। आपके सामने कोई दर्द से छटपटा रहा हो, भूख से बिलबिला रहा हो, मृत्यु के कगार पर हो तो आप कितनी ही प्रसन्नता से भरे हों, सम्वेदना से तड़प उठेंगे। सुख का मूलमंत्र है सबके साथ मिलकर सुखी होना और वह तभी संभव है जब हम एक आदर्श समाज का निर्माण कर सकें।
अंजनी सक्सेना
