
27 वर्षों के बाद दिल्ली की सत्ता में काबिज़ हुई भाजपा सरकार द्वारा जारी पहला बजट स्वास्थ्य के लिहाज से संतोषप्रद कहा जाता सकता है। इस बजट में स्वास्थ्य पर विशेष जोर दिया गया है। कुल बजट का तकरीबन 13 फीसद राशि स्वास्थ्य के मद में आवंटित किया गया है। इससे यह स्पष्ट है कि दिल्ली की स्वास्थ्य रेखा को और विस्तृत किया गया है।
दिल्ली विधानसभा के चुनावों में स्वास्थ्य एक बड़ा विषय उभर कर सामने आया था. खासतौर पर आतिशी सरकार द्वारा केन्द्र द्वारा चलाए जा रहे आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री योजना को नहीं लागू करने के कारण आम आदमी सरकार की खूब किरकिरी हुई थी। इस बजट में आयुष्मान संबंधित योजनाओं के लिए 2144 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है जिसमें 400 आयुष्मान आरोग्य मंदिर के लिए 320 करोड़ रुपये, क्रिटिकल केयर ब्लाक और डायग्नोस्टिक्स बनाने के लिए 1666.66 करोड़ रुपये, आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के लिए 147.64 करोड़ रुपये और आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के लिए 9.92 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया गया है। कुल स्वास्थ्य बजट की बात की जाए तो पिछले वर्ष के 8,685 करोड़ के प्रावधान के मुकाबले इस बार के बजट में 12,893 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
कोविड काल में दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई थी, लोगों को उपचार के लिए दर-दर की ठोकरे खानी पड़ रही थी। कोविड तो खैर एक महामारी थी लेकिन सामान्य दिनों में भी दिल्ली के अस्पतालों में उपचार कराने के लिए बेड मिलना आसान नहीं है। विगत वर्षों में 1000 आबादी पर अस्पतालों में स्वीकृत बेडो की उपलब्धता देखी जाए तो 2017-18 में जहां सबसे ज्यादा 2.99 फीसद बेड उपलब्ध थे, वहीं 2022-23 में घटकर 2.70 हो गए। ये आंकड़े यह दिखाते हैं कि पूर्ववर्ती सरकारों ने बढती आबादी के अनुसार बेडो की संख्या को बढ़ाने पर जोर नहीं दिया।
नई सरकार द्वारा प्रस्तुत पहले बजटीय भाषण में सूबे की मुख्यमंत्री ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानको के अनुरूप यानी 1000 की आबादी पर 5 बेड की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में उनकी सरकार कोशिश करेगी। साथ ही रुकी हुई परियोजनाओं को त्वरित गति से पूर्ण करके 16,186 बेड बढाए जाएंगे। दिल्ली में दो नए मेडिकल कॉलेज बनाए जाने का भी प्रस्ताव है। इन ढाचागत सुधारों से यह तो तय है कि दिल्ली की स्वास्थ्य रेखा मजबूत होगी।
इतना ही नहीं, इस बजट में दिल्ली वालों के प्यास को बुझाने के लिए शुद्ध जल, यमुना की सफाई, नजफगढ़ नाले की सफाई सहित अन्य कई स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले बिन्दुओं पर भी ठीक ठाक बजट का प्रावधान किया है। कहा जाता है कि जल ही जीवन है। दिल्ली वालों को ठीक से जल की आपूर्ति नहीं होने के कारण गंदा पानी पीने पर मजबूर होना पड़ता है। पिछले 10 वर्षों में पानी की उपलब्धता 840 से बढ़कर मात्र 1,000 मिलियन गैलन प्रतिदिन (एमजीडी) हुई है, जबकि तीन करोड़ की जनसंख्या के लिए 1,290 एमजीडी पानी की आवश्यकता है। बजट में इस कमी को दूर करने की कोशिश दिख रही है। दिल्ली जल बोर्ड को 9,000 हजार करोड़ रुपये का बजट आवंटित हुआ है।
वहीं पर्यावरण एवं प्रदूषण पर भी सरकार गंभीर दिख रही है। इस मद में क्रमशः 506 व 300 करोड़ आवंटित किए गए हैं। दिल्ली में प्रदूषण से आम लोगों की सेहत पर कितना दुष्प्रभाव पड़ता है, यह किसी से छुपी हुई बात नहीं है। प्रदूषण का प्रकोप बढ़ने पर पूरी दिल्ली खांसते एवं छिंकते हुए नज़र आती है। लेकिन इस मद में दिया गया बजट दिल्ली के वायु गुणवत्ता में कितना सुधार ला पाता है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।
इस चुनाव में यमुना की सफाई का मुद्दा भी अहम् रहा है। इस संदर्भ में सरकार ने इस बजट में यमुना की सफाई एवं 40 विकेन्द्रिकृत सीवेज उपचार संयंत्रों (डीएसटीपी) बनाने एवं पहले से मौजूद सीवेज उपचार संयंत्रों (एसटीपी) के उन्न्यन की घोषणा की है। अपने भाषण में मुख्यमंत्री ने बताया कि, राजधानी में जल और सीवेज बुनियादी ढांचे को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप लाने के लिए केंद्र से 2,000 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता का अनुरोध किया है। साथ ही इस बजट में डीएसटीपी बनाने के लिए 500 करोड़ रुपये, नालों के गंदे पानी को उपचार के लिए एसटीपी तक ले जाने की परियोजना हेतु 250 करोड़ रुपये, नजफगढ़ ड्रेन के परिवर्तन व इंटरसेप्शन परियोजना के लिए 200 करोड़ रुपये, यमुना की सफाई हेतु आधुनिक उपकरण खरीदने के लिए 40 करोड़ रुपये एवं सीवेज व्यवस्था में सुधार के लिए सुपर सकर मशीन व अन्य मशीनों को खरीदने के लिए 20 करोड़ का आवंटन किया गया है।
इस तरह से देखा जाए तो दिल्ली सरकार द्वारा वित्तीय वर्ष 2025-26 हेतु जारी 1 लाख करोड़ रुपये के बजट में स्वास्थ्य संबंधी विषयों को प्रमुखता से लिया गया है। इन बजटीय प्रावधानों के अनुरूप योजनाओं का क्रियान्वयन कितनी तेजी से हो पाता है, यह देखना महत्वपूर्ण है। क्रियान्वयन के स्तर पर गर सूबे की रेखा सरकार अपने लक्ष्य को साध पाती है तो निश्चित ही दिल्ली की स्वास्थ्य रेखा बदलती हुई नज़र आएगी।
आशुतोष कुमार सिंह
(लेखक स्वस्थ भारत अभियान के राष्ट्रीय संयोजक व पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट हैं)