संगीतकार ओ पी नैय्यर ने दी थी आशा भोसले के करियर को नयी दिशा

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नयी दिल्ली, 13 अप्रैल (भाषा) दिग्गज गायिका आशा भोसले ने अपने आठ दशक लंबे करियर में हिंदी फिल्म जगत के संगीत को नयी दिशा दी, जिसका बड़ा श्रेय उन्होंने अपने लंबे समय तक सहयोगी रहे संगीतकार ओपी नैय्यर को दिया। दोनों के रास्ते भले ही बाद में अलग हो गए, लेकिन भोसले ने कभी अपने करियर में नैय्यर के योगदान को नकारा नहीं।

विलक्षण प्रतिभा के धनी संगीतकार नैय्यर ने न केवल भोसले के साथ गाने रिकॉर्ड किए बल्कि उनकी कलात्मक पहचान को आकार देने में भी अहम भूमिका निभाई। नैय्यर ने भोसले की बड़ी बहन लता मंगेशकर के साथ काम न करने का विकल्प चुना था।

लेखक राजू भारतन की पुस्तक “आशा भोसले : ए म्यूजिकल बॉयोग्राफी” में इस रिश्ते और रचनात्मक साझेदारी का विस्तार से जिक्र है। आशा भोसले ने नैय्यर को वह शख्स बताया, जिन्होंने उन्हें “लता फोबिया” से बाहर निकाला।

आशा भोसले का रविवार सुबह 92 वर्ष की आयु में ब्रीच कैंडी अस्पताल में निधन हो गया। उनके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था।

पुस्तक में उद्धृत भोसले के अनुसार, “लोग कुछ भी कहें, लेकिन उन्होंने मुझे बनाया। जब तक नैय्यर साहब ने मुझे नहीं संभाला था, तब तक मैं लता मंगेशकर के सामने क्या थी, ? उन्होंने मुझे ‘लता फोबिया’ से मुक्त किया।”

अधिकतर संगीतकार 1950 के दशक की शुरुआत में लता मंगेशकर की आवाज और रेंज को आधार मानकर धुन बनाते थे। ऐसे में युवा और कम लोकप्रिय आशा भोसले से भी उसी शैली में गाने की अपेक्षा की जाती थी।

पुस्तक में उन्होंने कहा, “अधिकतर संगीतकार मुझसे ऊंचे सुर और स्केल में गाने को कहते थे।”

हालांकि, ओपी नैय्यर ने भोसले की आवाज में वह खासियत पहचानी, जिसे अन्य नजरअंदाज कर रहे थे।

पुस्तक में भोसले ने बताया, “वह (नैय्यर) कहते थे कि मेरी लो-पिच बहुत मजबूत है, और मेरी सांस लंबी है। वे खासकर धीमे और भावुक गीतों में इसका इस्तेमाल करते थे।”

ओ पी नैय्यर का वर्ष 2007 में 81 साल की उम्र में निधन हो गया था।

नैय्यर ने आशा भोसले को लता की शैली की ओर धकेलने के बजाय उनकी अपनी गायकी के अनुरूप संगीत रचा, जिसके नतीजे एक युग को परिभाषित करने वाले साबित हुए। “लेके पहला पहला प्यार” (सीआईडी, 1956) से लेकर “बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी” (एक मुसाफिर एक हसीना, 1962) जैसे गीत आज भी सदाबहार माने जाते हैं।

“मैं शायद तुम्हारे लिए अजनबी हूं” और “यही वो जगह है” (ये रात फिर ना आएगी, 1966) जैसे गीतों में आशा भोसले की भावनात्मक अभिव्यक्ति का श्रेष्ठ रूप सामने आया। आशा भोसले के निजी पसंदीदा गीतों में “जादूगर सांवरिया” (ढाके की मलमल, 1957) और “रातों को चोरी चोरी” (मोहब्बत जिंदगी है, 1966) शामिल थे।

जहां अधिकांश संगीतकार गायक से अपनी धुन को हूबहू निभाने की अपेक्षा करते थे, वहीं नैय्यर आशा भोसले को प्रयोग की पूरी स्वतंत्रता देते थे। पुस्तक में आशा भोसले ने कहा, “वे अक्सर कहते थे-अब अगला अंतरा अपनी तरह से गाओ। यह मजेदार और चुनौतीपूर्ण होता था।” नैय्यर ने कभी आशा भोसले को उनकी उर्दू को लेकर असहज महसूस नहीं होने दिया।

आशा भोसले के अनुसार, “उन्हें गीत के शब्दों की गहरी समझ थी और वे हर शब्द को स्पष्ट रूप से उभारने पर जोर देते थे।” आशा भोसले ने ओ पी नैय्यर को मदन मोहन, रोशन और एस डी बर्मन जैसे संगीतकारों की श्रेणी में रखा, जो खुद भी एक उत्कृष्ट गायक थे।

हालांकि बाद में दोनों के संबंधों में दूरियां आ गईं, लेकिन उनके संगीत का प्रभाव अटूट रहा। आशा भोसले का कहना था, “मेरे लंबे करियर में कई संगीतकार आए, लेकिन कुछ ही ट्रेंडसेटर थे। नैय्यर ऐसे ही क्रांतिकारी थे- बहुत से लोग उनकी नकल करते थे, लेकिन वे हमेशा मौलिक रहे।”

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