दिग्गज गायिका आशा भोसले का दूसरा जुनून था खाना बनाना

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नयी दिल्ली, 13 अप्रैल (भाषा) सात दशकों में हजारों गीतों को अपनी आवाज देने वाली दिग्गज पार्श्व गायिका आशा भोसले अगर संगीत के क्षेत्र में नहीं आतीं, तो वह एक खानसामा बनतीं।

मुंबई में रविवार को 92 वर्ष की आयु में इस दुनिया को विदा कह देने वाली आशा के व्यक्तित्व के इस पहलू का जिक्र लेखिका रम्या शर्मा की किताब ‘आशा भोसले : ए लाइफ इन म्यूजिक’ में विस्तार से किया गया है।

किताब के एक अध्याय ‘हर कलनरी स्किल्स’ है जिसमें बताया गया है कि खाना बनाने का शौक उन्हें आजीवन रहा और इससे उन्हें तनाव से निपटने में मदद मिलती थी। किताब में उनके हवाले से कहा गया है, “मैं चार घरों में खाना बनाकर पैसे कमा लेती।”

किताब के अनुसार, आशा भोसले की पाक-कला की ख्याति उनके परिवार से आगे, फिल्म जगत तक फैली हुई थी। राज कपूर के परिवार सहित कई फिल्मी हस्तियां उनके बनाए पायाकरी, गोअन फिश करी, दाल, कड़ाही गोश्त और बिरयानी की मुरीद थीं।

इस किताब में आशा को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है ‘‘मुझे लगता है कि खाना पकाने से तनाव दूर हो जाता है। जैसे मैं हर तरह के गाने गाती हूं, वैसे ही हर तरह का खाना भी बनाती हूं, लेकिन मुझे पारंपरिक चीजें पसंद हैं—चाहे वह कपड़े हों या खाना।”

आशा 90 वर्ष की आयु पार करने के बाद भी मेहमानों के लिए घंटों खड़े होकर खाना बनाने को तैयार रहती थीं। रोजमर्रा के भोजन के लिए स्टाफ होने के बावजूद खास मौकों पर वह खुद रसोई संभालती थीं।

उनके घर अक्सर आने जाने वाली अभिनेत्री पूनम ढिल्लों ने उन्हें “बेहतरीन कुक और मेजबान” बताया। उन्होंने कहा कि परिवार और दोस्तों के लिए खाना बनाना उन्हें सबसे ज्यादा खुशी देता था।

पूनम ने कहा ‘‘खाना पकाने से उन्हें जो खुशी मिलती थी वह किसी और काम में नहीं मिलती थी। और वह अपने लिए नहीं पकाती थीं बल्कि अपने परिवार, बच्चों और परिचितों के लिए पकाती थीं। उनके लिए अपने पोते पोतियों के अलावा अगर और कुछ महत्वपूर्ण था तो वह खाना पकाना था।’’

किताब में यह भी बताया गया है कि खाना उनके निजी जीवन में भी एक मजबूत कड़ी था, खासकर उनके दिवंगत पति और संगीतकार आर डी बर्मन के साथ। दोनों घर पर दोस्ताना अंदाज में खाना बनाने की प्रतियोगिताएं करते थे।

आशा ने बंगाली झींगा करी बनाना बर्मन की दादी से सीखा, जबकि गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की पत्नी से उन्होंने लखनवी व्यंजन और राज कपूर से पेशावरी बिरयानी की विधि सीखी।

भारतीय व्यंजनों—खासकर महाराष्ट्र, गोवा और बंगाल के व्यंजनों पर उनकी विशेष पकड़ थी, हालांकि उन्हें थाई और चीनी भोजन भी पसंद था। दिलचस्प बात यह है कि उनका पसंदीदा भोजन सादा चावल, दाल और मिर्च का अचार था।

उन्होंने कहा था, “मैं शायद ही कभी बिना मिठाई खाए सोती हूं, लेकिन ज्यादा खाने से बचती हूं। अगर दिन में ज्यादा खा लिया, तो रात का खाना छोड़ देती हूं।”

आशा के लिए व्यायाम कोई खास मायने नहीं रखता था और वह संगीत को ही अपना योग मानती थीं।

किताब में सुपरस्टार राजेश खन्ना से जुड़ा एक किस्सा भी है, जब उन्होंने आशा को खाना बनाते देखा और घी ज्यादा डालने की सलाह दी।

हर पीढ़ी को अपनी आवाज से दीवाना बनाने वाली आशा की पश्चिम एशिया में रेस्तरां श्रृंखला आशा’ज़ है, जो उत्तर-पश्चिमी भारतीय व्यंजनों के लिए जानी जाती है। यह उनके इस दूसरे जुनून का प्रमाण है।

अपनी रेस्तरां श्रृंखला आशा’ज़ के लिए मेन्यू तैयार करने में आशा ने तीन महीने लगाए और छह महीने तक खुद शेफ को प्रशिक्षण दिया। उन्होंने कहा था, “अगर किसी रेस्तरां पर मेरा नाम है, तो वह सफल होना चाहिए और खाना वैसा ही होना चाहिए जैसा मैं बनाती हूं।”

साल 2012 में अपनी बेटी वर्षा के निधन के बाद उन्होंने अपने दुख को कम करने के लिए संगीत और खाना बनाने का सहारा लिया।

किताब में एक रिश्तेदार के हवाले से कहा गया है कि परिवार और दोस्तों के लिए खाना बनाना उनके लिए सुकून पाने का जरिया बन गया।

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