शिक्षा को कौशल आधारित बनाना राष्ट्र के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक
Focus News 13 April 2026 0
किसी भी राष्ट्र की प्रगति का वास्तविक आधार उसकी मानव संसाधन क्षमता होती है और यह क्षमता शिक्षा के माध्यम से निर्मित होती है। किंतु केवल डिग्री आधारित या सैद्धांतिक शिक्षा आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं को पूरा करने में पर्याप्त नहीं रही है। आज के समय में उद्योग, सेवा क्षेत्र और डिजिटल अर्थव्यवस्था ऐसे कर्मियों की माँग करते हैं जो न केवल ज्ञान रखते हों, बल्कि उस ज्ञान को व्यावहारिक रूप से लागू करने की दक्षता भी रखते हों। इस संदर्भ में शिक्षा को कौशल आधारित बनाना केवल शैक्षिक सुधार का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक रणनीति का केंद्रीय तत्व बन गया है। यदि शिक्षा प्रणाली रोजगार, उद्यमिता और नवाचार के लिए आवश्यक कौशल विकसित नहीं कर पाती, तो उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं की बड़ी संख्या भी बेरोजगारी या अल्परोजगारी का सामना करती है, जिससे राष्ट्र की उत्पादक क्षमता प्रभावित होती है।
भारत में कौशल और रोजगार के बीच असंतुलन एक लंबे समय से पहचानी गई समस्या है। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 में यह तथ्य सामने आया कि केवल 8.25 प्रतिशत स्नातक ही ऐसे कार्यों में लगे हैं जो उनकी शैक्षिक योग्यता के अनुरूप हैं, जबकि आधे से अधिक स्नातक कम कौशल वाले कार्यों में संलग्न पाए गए। यह आँकड़ा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पारंपरिक शिक्षा प्रणाली और श्रम बाजार की वास्तविक आवश्यकताओं के बीच गंभीर अंतर मौजूद है। इसी प्रकार विभिन्न कौशल आकलन रिपोर्टों में यह पाया गया कि भारतीय स्नातकों की कुल रोजगारयोग्यता लगभग 54.81 प्रतिशत के आसपास है, अर्थात लगभग आधे शिक्षित युवा भी उद्योग की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं। इस स्थिति का सीधा प्रभाव आर्थिक विकास, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर पड़ता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने इस समस्या को पहचानते हुए शिक्षा को अधिक लचीला, बहुविषयी और कौशल उन्मुख बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। नीति में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि विद्यालय स्तर से ही विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण से जोड़ा जाएगा तथा वर्ष 2025 तक कम से कम 50 प्रतिशत विद्यार्थियों को किसी न किसी रूप में व्यावसायिक शिक्षा से परिचित कराने का लक्ष्य रखा गया है। यह दृष्टिकोण इस समझ पर आधारित है कि कौशल केवल उच्च शिक्षा के बाद सिखाने की वस्तु नहीं है, बल्कि उसे प्रारंभिक शिक्षा से ही जीवन कौशल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
इसके बावजूद वास्तविक स्थिति यह दर्शाती है कि कौशल आधारित शिक्षा का प्रसार अभी सीमित है। एक राष्ट्रीय आकलन में पाया गया कि भारत के केवल 47 प्रतिशत विद्यालय ही कक्षा 9 से ऊपर के छात्रों के लिए कौशल आधारित पाठ्यक्रम उपलब्ध कराते हैं और इनमें भी केवल लगभग 29 प्रतिशत छात्र ही इन पाठ्यक्रमों का चयन करते हैं। यह अंतर बताता है कि नीति स्तर पर घोषित लक्ष्य और जमीनी स्तर पर उसके क्रियान्वयन के बीच अभी भी बड़ी दूरी है। यदि विद्यालय स्तर पर ही छात्रों को व्यावसायिक विकल्पों से परिचित नहीं कराया जाएगा, तो उच्च शिक्षा के बाद अचानक कौशल प्रशिक्षण देने का प्रयास कम प्रभावी सिद्ध होता है।
वैश्विक स्तर पर भी यह स्वीकार किया गया है कि कौशल असंतुलन आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बड़ी चुनौती है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार कौशल असंतुलन तब उत्पन्न होता है जब श्रमिकों के पास उपलब्ध कौशल और उद्योग द्वारा माँगे जा रहे कौशल के बीच अंतर होता है, जिससे उत्पादकता और रोजगार दोनों प्रभावित होते हैं। भारत जैसे देश, जहाँ हर वर्ष बड़ी संख्या में युवा श्रम बाजार में प्रवेश करते हैं, वहाँ यह असंतुलन और भी गंभीर रूप ले सकता है यदि शिक्षा प्रणाली समय रहते स्वयं को परिवर्तित न करे।
डिजिटल क्रांति और स्वचालन के बढ़ते प्रभाव ने कौशल आधारित शिक्षा की आवश्यकता को और अधिक अनिवार्य बना दिया है। हालिया कौशल अंतर रिपोर्टों में यह सामने आया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, डेटा विश्लेषण और डिजिटल तकनीक से जुड़े कौशल भविष्य के रोजगार बाजार में सबसे अधिक माँग में रहने वाले कौशलों में शामिल हैं। इसका अर्थ यह है कि पारंपरिक पाठ्यक्रमों के साथ-साथ नई तकनीकों से जुड़े व्यावहारिक प्रशिक्षण को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा, अन्यथा युवा पीढ़ी तेजी से बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा करने में पीछे रह जाएगी।
कौशल आधारित शिक्षा का महत्व केवल रोजगार तक सीमित नहीं है; यह उद्यमिता और नवाचार को भी प्रोत्साहित करती है। जब विद्यार्थियों को समस्या समाधान, डिजाइन, प्रोजेक्ट आधारित सीखने और वास्तविक जीवन के अनुप्रयोगों पर आधारित शिक्षा दी जाती है, तो वे केवल नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि रोजगार सृजन करने वाले उद्यमी भी बन सकते हैं। विकसित देशों में तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने का एक प्रमुख उद्देश्य यही रहा है कि युवा केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित न रहें, बल्कि उद्योग और समाज की वास्तविक समस्याओं के समाधान खोजने में सक्षम बनें।
भारत में औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान, पॉलिटेक्निक और विभिन्न कौशल विकास योजनाएँ लंबे समय से अस्तित्व में हैं, परंतु इन संस्थानों की सामाजिक प्रतिष्ठा और पहुँच अभी भी सीमित है। पारंपरिक मानसिकता के कारण अनेक परिवार व्यावसायिक शिक्षा को सामान्य शिक्षा की तुलना में कम प्रतिष्ठित मानते हैं, जिसके कारण बड़ी संख्या में छात्र सामान्य स्नातक पाठ्यक्रमों की ओर आकर्षित होते हैं, भले ही उनके बाद रोजगार की संभावना कम हो। इस सामाजिक दृष्टिकोण को बदलना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि शैक्षिक ढाँचे में सुधार करना।
सरकार द्वारा प्रारंभ की गई प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना और अन्य कौशल उन्नयन कार्यक्रमों का उद्देश्य इसी अंतर को कम करना रहा है। इन योजनाओं के माध्यम से लाखों युवाओं को अल्पकालिक प्रशिक्षण, पूर्व अनुभव की मान्यता और उद्योग से जुड़े पाठ्यक्रम उपलब्ध कराए गए हैं। हाल के वर्षों में इन कार्यक्रमों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन तकनीक, रोबोटिक्स और हरित ऊर्जा जैसे उभरते क्षेत्रों से भी जोड़ा गया है, जिससे प्रशिक्षण अधिक भविष्य उन्मुख बन सके। हालांकि इन योजनाओं की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि प्रशिक्षण के बाद युवाओं को वास्तविक रोजगार या उद्यमिता के अवसर कितनी मात्रा में प्राप्त होते हैं।
कौशल आधारित शिक्षा का एक महत्वपूर्ण आयाम यह भी है कि यह शिक्षा को अधिक समावेशी बनाती है। सभी विद्यार्थी पारंपरिक शैक्षणिक पद्धति में समान रूप से सफल नहीं होते, परंतु अनेक छात्र व्यावहारिक, तकनीकी और रचनात्मक गतिविधियों में अधिक दक्ष होते हैं। यदि शिक्षा प्रणाली उन्हें केवल लिखित परीक्षा और सैद्धांतिक विषयों के आधार पर परखती है, तो उनकी वास्तविक प्रतिभा का उपयोग नहीं हो पाता। कौशल आधारित पाठ्यक्रम उन्हें अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करते हैं, जिससे ड्रॉपआउट दर कम हो सकती है और शिक्षा अधिक प्रासंगिक बन सकती है।
आर्थिक दृष्टि से देखें तो कौशल आधारित शिक्षा प्रत्यक्ष रूप से उत्पादकता वृद्धि से जुड़ी होती है। जब कार्यबल प्रशिक्षित और दक्ष होता है, तो उद्योगों को कम प्रशिक्षण लागत में अधिक कुशल कर्मचारी मिलते हैं, उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर होती है और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है। यही कारण है कि जर्मनी, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों ने अपने विकास के प्रारंभिक चरण में ही तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा को मजबूत किया और उसे मुख्यधारा की शिक्षा के बराबर महत्व दिया।
भारत के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश जनसांख्यिकीय लाभांश के दौर से गुजर रहा है। बड़ी युवा आबादी तभी आर्थिक संपत्ति में परिवर्तित हो सकती है जब वह पर्याप्त रूप से शिक्षित और कुशल हो। यदि यह आबादी बेरोजगार या अल्परोजगार रह जाती है, तो वही जनसांख्यिकीय लाभांश सामाजिक और आर्थिक चुनौती में बदल सकता है। इस जोखिम को टालने के लिए शिक्षा को रोजगार और उद्योग की आवश्यकताओं के साथ बेहतर ढंग से जोड़ना अनिवार्य है।
अंततः यह स्पष्ट है कि कौशल आधारित शिक्षा केवल पाठ्यक्रम में कुछ व्यावसायिक विषय जोड़ देने भर का मामला नहीं है, बल्कि यह शिक्षा के दर्शन, संरचना और मूल्यांकन प्रणाली में व्यापक परिवर्तन की माँग करती है। जब तक विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, उद्योगों और नीति निर्माताओं के बीच सशक्त सहयोग स्थापित नहीं होगा, तब तक शिक्षा और रोजगार के बीच का अंतर पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकेगा। भारत यदि स्वयं को एक ज्ञान आधारित और प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करना चाहता है, तो उसे शिक्षा प्रणाली को इस प्रकार परिवर्तित करना होगा कि प्रत्येक विद्यार्थी केवल डिग्रीधारी नहीं, बल्कि कौशलयुक्त, नवाचारी और आत्मनिर्भर नागरिक बन सके। यही वह मार्ग है जो राष्ट्र को स्थायी आर्थिक विकास, सामाजिक स्थिरता और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ा सकता है।
डॉ. शैलेश शुक्ला
