विकसित भारत एक संकल्प और विचार है जिसमें एक नागरिक के नाते हम सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है। विकास की संकल्पना का मूल व्यक्ति ही है। एक इकाई के रूप में यह व्यक्ति भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में विकास की विभिन्न संकल्पनाओं को साकार करता है। आज जब राष्ट्रीय और वैश्विक फलक पर विभिन्न अवसर एवं चुनौतियां सामने हैं तब यह आवश्यक है कि विकसित भारत के लिए एक ऐसे व्यक्ति का निर्माण हो जो भारत भाव से समन्वित हो। ध्यान रहे मन, कर्म, वचन से मातृभूमि को समर्पित व्यक्ति ही विकसित भारत के संकल्प में निर्णायक भूमिका अदा करेगा। महर्षि अरविंद ने कहा था- हमें उतना सामर्थ्यवान बनना होगा, जितना हम पहले कभी नहीं थे। हमें कुछ आदतें बदलनी होंगी, एक नए हृदय के साथ अपने को फिर से जाग्रत करना होगा। ध्यान रहे हमारा सामर्थ्य निर्माण और नवजागरण राष्ट्रहित में हो। क्योंकि निहित स्वार्थों की अवधि व दृष्टि बहुत संकुचित होती है, उससे राष्ट्रीय सरोकार सिद्ध नहीं होंगे।
वेदों में भूमि को माता और समूची वसुधा को कुटुंब कहा गया है। इसलिए वहां एक ओर मनुर्भव के माध्यम से नियम पालन युक्त मनुष्य बनने का संदेश है तो वहीं दूसरी ओर पुरोहित के माध्यम से ऐसे व्यक्ति अथवा नागरिक का आवाह्न मिलता है जो राष्ट्र को सदैव जीवंत और जागृत बनाए रखेंगे। क्या आज व्यक्ति निर्माण के लिए हमें वेदों की ओर लौटने की भी आवश्यकता नहीं है?
आज जहां एक ओर कुछ लोग ज्ञान, विज्ञान, तकनीक आदि के माध्यम से राष्ट्रीय और वैश्विक फलक पर भारत को गौरवान्वित कर रहे हैं। तो वहीं कुछ लोग काम, क्रोध, मद, लोभ, अहंकार, स्वार्थ, आपसी वैमनस्य एवं आपराधिक प्रवृत्तियों में भी लिप्त हो रहे हैं। क्या इस प्रकार के व्यक्ति मानवता के कल्याण हेतु काम कर सकते हैं? अधिकांश नागरिक अधिकारों को लेकर तो समग्र रूप से सचेत हैं लेकिन नागरिक कर्तव्यों के पालन में पीछे रहते हैं। मारपीट, हत्या, चोरी, दुष्कर्म, जाति-संप्रदायगत आपसी वैमनस्य आदि शत्रुता को बढ़ावा देने वाले अपराधों में निरंतर वृद्धि हो रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के विगत दिनों प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022 में देशभर में घृणा भाषण के अपराधों समेत विभिन्न समूह के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने के लगभग 1500 मामले दर्ज किए गए। जो वर्ष 2021 के मुकाबले 31 प्रतिशत अधिक थे। बच्चों और महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
विगत दिनों के एक समाचार से यह भी सामने आया कि नगर निगम, विधानसभा और लोकसभा में चुनकर पहुंचे उम्मीदवारों में से अनेक पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। विगत लोकसभा चुनाव लड़ रहे 8,360 उम्मीदवारों में से 1,643 उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज मिले हैं। क्या इस प्रकार के आपराधिक छवि वाले व्यक्ति समाज और राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सकते हैं? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व्यक्ति निर्माण हेतु समर्पित विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है। विगत दिनों संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक कार्यक्रम में कहा कि देश की सुरक्षा और विकास में सेना व सरकार के साथ समाज की भी बड़ी भूमिका होती है। समाज को देखना चाहिए कि जहां, जिस स्थिति में हैं, वहां देशहित के लिए क्या कर सकते हैं। दैनिक जीवन में राष्ट्रभक्ति का भाव ही हमें और हमारे देश को आगे ले जाएगा। वे व्यक्ति एवं समाज निर्माण हेतु अपने विभिन्न उद्बोधनों में लगातार स्वदेशी, कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक कर्तव्यों के पालन से संबंधित पंच परिवर्तनों का संदेश भी दे रहे हैं।
भारतीय संस्कृति में दया, करुणा, ममता, अर्पण,तर्पण व समर्पण का भाव विद्यमान है। यहां अनेक महापुरुषों व बलिदानियों की विराट परंपरा और उनका चिंतन व्यक्ति की बुद्धि और बल का विकास करता रहा है। अनेक उतार-चढ़ावों के क्रम से गुजरते हुए भारतवर्ष शाश्वत रूप में हमारे सामने है। भारतवर्ष के उत्कृष्ट साहित्य एवं इतिहास को जानने का प्रयास करें। यही वह स्रोत है जो जन जन में भारत के प्रति नई ऊर्जा का संचार कर सकता है। भारतवर्ष के महापुरुषों,अमर बलिदानियों और श्रेष्ठ परंपराओं को समझें,क्योंकि ये श्रेष्ठ परंपराएं ही उसमें गौरव का भाव जगाएगी। व्यक्ति और समाज में भारत भाव के संकल्प के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति यह समझे की उसके जीवन में राष्ट्र का भी हिस्सा है। आज प्राथमिक पाठशाला में यह पाठ लगातार पढ़ाने की आवश्यकता है कि भारत मेरा है और मैं भारत का हूं। क्योंकि इस भाव अथवा संकल्प के बिना राष्ट्र उत्थान संभव नहीं है। मेरा क्या ? और मुझे क्या ? की सोच से बाहर निकलना होगा। केवल दोष दर्शन और आरोप-प्रत्यारोप से नव निर्माण नहीं होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी स्पष्ट करती है कि नीति का विजन छात्रों में भारतीय होने का गर्व न केवल विचार में बल्कि व्यवहार, बुद्धि और कार्यों में भी और साथ ही ज्ञान, कौशल, मूल्यों और सोच में भी होना चाहिए, जो मानवाधिकारों, स्थाई विकास और जीवनयापन तथा वैश्विक कल्याण के लिए प्रतिबद्ध हो, ताकि वे सही मायने में वैश्विक नागरिक बन सकें।
विकसित भारत कोई राजनीतिक नारा नहीं है अपितु यह स्वदेशी, स्वविचार, स्वभाषा, स्व संस्कृति आदि पर केंद्रित एक विचार और संकल्प है जिसकी सिद्धि के लिए प्रत्येक व्यक्ति को जाति, संप्रदाय, क्षेत्रीयता एवं राजनीतिक मत- वादों की संकीर्णता से बचते हुए और आमूलचूल परिवर्तनों को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ना होगा। संविधान की उद्देशिका हम भारत के लोग का आवाह्न करती है। विकसित भारत के लिए प्रत्येक व्यक्ति को सही मायनों में हम भारत के लोग इस भाव को आत्मसात करना होगा। तभी विकसित भारत का विचार और संकल्प पूर्णता को प्राप्त होगा।
डा.वेदप्रकाश
असिस्टेंट प्रोफेसर
किरोड़ीमल कालेज,दिल्ली विश्वविद्यालय
