आज सर्वत्र “सनातन” की चर्चा हो रही है। यह चर्चा अब केवल भारत तक सीमित नहीं रही बल्कि वैश्विक विमर्श का हिस्सा बन चुकी है। ऐसे समय में आवश्यक है कि हम सनातन को सामुदायिक चश्मे से नहीं बल्कि दार्शनिक और व्यवस्थागत दृष्टि से समझें। सनातन क्या है? सनातन का आशय एक ऐसी व्यवस्था से है जो समय के हर पड़ाव पर चलती आ रही है, चल रही है और समय के हर पड़ाव पर चलती रहेगी। दूसरे शब्दों में इसे कह सकते हैं सनातन जो हर काल परिस्थति और समय के पड़ाव पर स्थायी है, सत्य है. और सरल शब्दों में कह सकते हैं जो हर काल परिस्थति और समय के पड़ाव पर टिकाऊ है, और इसी टिकाऊ को अंग्रेजी में सस्टेनेबल कहते हैं. मतलब सनातन वह जो सस्टेनेबल है या इसे ऐसे कहें सस्टेनेबिलिटी की बात करना मतलब सनातन की बात करना।
गहराई में समझना है कि सनातन क्या है तो इसे और आगे समझते हैं. यदि हम शब्दकोश में जाएँ तो सनातन के अर्थ मिलते हैं चिरकालिक, सार्वकालिक, अक्षय, अनंत, अनादि, अविनाशी, शाश्वत, सतत, पुनर्चक्रीय। अंग्रेजी में इसे इटरनल कहा जाता है। जब भी मैं सनातन के अर्थ पर विचार करता हूँ, तो मुझे यही भाव मिलता है निरंतरता, सततता और पुनर्जनन की क्षमता।
अब आते हैं धर्म पर कि धर्म क्या है? चूंकि सनातन की चर्चा धर्म के संदर्भ में हो रही है, इसलिए पहले यह समझना आवश्यक है कि धर्म क्या है। धर्म की सबसे महत्वपूर्ण परिभाषा है मूल चरित्र। जैसे अग्नि का धर्म है जलना, जल का धर्म है शीतलता। तो प्रश्न है पृथ्वी का धर्म क्या है? उत्तर है सततता, सनातन। पृथ्वी अपनी प्राकृतिक व्यवस्थाओं के माध्यम से अपनी चिरकालिकता, सार्वकालिकता, नश्वरता,अक्षयपन, अनंत , अनादि, अविनाशी, शाश्वत चरित्र, सततता, पुनर्चक्रीयता और संतुलन बनाए रखती है। जन्म और विनाश का चक्र, ऋतुओं का परिवर्तन, जलचक्र, जैविक पुनर्जनन ये सभी पृथ्वी की सनातन व्यवस्था के उदाहरण हैं। इसलिए मेरा मानना है कि पृथ्वी का मूल धर्म सनातन है अर्थात् वह व्यवस्था जो स्वयं को पुनर्चक्रीय संतुलन में बनाए रखती हुए पृथ्वी की और इस पर फल फूल रहे जीवन चक्र की सततता बनाये रखती है।
अब समझते हैं धर्म और समुदाय और धर्म के बीच का अंतर। आज जिस “धर्म” की चर्चा लोकप्रचलित रूप में होती है, वह अक्सर समुदाय आधारित पहचान के रूप में समझा जाता है परंतु समुदाय धर्म नहीं है. वह एक पंथ है, एक जीवन-पद्धति है, जो अपने समूह की सततता बनाए रखने का प्रयास करती है।
जो भी समुदाय अपनी जीवन-व्यवस्था को पृथ्वी के मूल चरित्र अर्थात् पुनर्चक्रीय संतुलन के अनुरूप ढालता है, वह टिकता है। जो पृथ्वी की मूल व्यवस्था से असंगत हो जाता है, वह इतिहास में क्षीण हो जाता है। या यूँ कहें कि जिसकी और जिसके समूह की प्रकृति या चरित्र पृथ्वी के मूल चरित्र “सनातन” की धुन और संगीत से संगत होगा, वह लंबा चलेगा नहीं तो वह बीच रास्ते में दम तोड़ देगा. इस दृष्टि से देखें तो सनातन किसी एक समुदाय का निजी अधिकार नहीं है; यह पृथ्वी की व्यवस्था का नाम है।
यदि कोई कहता है कि भारत का राष्ट्रीय धर्म सनातन है तो इसे सांप्रदायिक अर्थ में नहीं बल्कि इस दार्शनिक अर्थ में समझना चाहिए। विस्तार से कहें तो केवल भारत ही नहीं, पूरी पृथ्वी का मूल धर्म सनातन है क्योंकि पृथ्वी स्वयं पुनर्चक्रीय और सतत व्यवस्था पर आधारित है। इसलिए जो भी धर्म, पंथ या सामाजिक व्यवस्था सततता बनाए रखती है, पुनर्चक्रीय संतुलन का पालन करती है, प्रकृति के साथ सामंजस्य रखती है, वह उस सीमा तक सनातन है।
“हिन्दू” शब्द का दार्शनिक संदर्भ समझें तो आज जिसे “हिन्दू” कहा जाता है, वह मूलतः भौगोलिक पहचान थी सिंधु नदी के इस पार रहने वाले लोग। कालांतर में इसे सामुदायिक पहचान तक सीमित कर दिया गया। यदि भौगोलिक दृष्टि से देखें तो सिंधु के इस पार रहने वाले सभी लोग चाहे वे मुस्लिम हों, सिख हों, ईसाई हों, बौद्ध हों या जैन उसी सांस्कृतिक भूभाग के उत्तराधिकारी हैं अतः ये सब इस हिसाब से हिन्दू ही हैं। इसलिए सनातन को धार्मिक परिभाषा में सीमित करना उसकी व्यापकता को कम करना है।
सनातन का मूल तत्व है पुनर्चक्रीकरण। प्रकृति से लेना और उसे पुनः लौटाना। संतुलन बनाए रखना। आज विश्व जिस अवधारणा को “सर्कुलर इकॉनमी” कहता है, वह सनातन के सिद्धांत से अलग नहीं है। प्रकृति के प्रति आदर, संसाधनों का संतुलित उपयोग, और पुनर्जनन यही सनातन का आर्थिक स्वरूप है। पश्चिम का जागरण और एसडीजी की बात करें तो आज संयुक्त राष्ट्र ने जो लक्ष्य निर्धारित किए हैं उन्हें कहा गया है सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल । इसे दुसरे शब्दों में कहें तो सस्टेनेबल अर्थात् टिकाऊ और टिकाऊ अर्थात् सनातन। मतलब संयुक्त राष्ट्र ने भी इतना घूमने के बाद जो लक्ष्य निर्धारित किए हैं वह लक्ष्य सनातन ही है.
COP (कांफ्रेंस ऑफ़ पार्टीज) जैसे वैश्विक सम्मेलन जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संतुलन पर विचार करने के लिए आयोजित किए जा रहे हैं।
जिस प्रकृति को भारत की धरती ने हजारों वर्षों से ईश्वर का स्वरूप मानकर संरक्षित किया, वही सिद्धांत आज वैश्विक नीति-निर्माण का आधार बन रहा है।
जिसे हमने धर्म का रूप दिया था, उसे आज विज्ञान और नीति की भाषा में सस्टेनेबल डेवलपमेंट कहा जा रहा है।
इन सबका लब्बोलुबाब यही है कि सनातन किसी धार्मिक पहचान का नाम नहीं है। सनातन वह व्यवस्था है जो सततता की बात करती है, जो पुनर्चक्रीय है, जो प्रकृति-संगत है, जो पृथ्वी-संगत है, जो संतुलित है और समय की हर परीक्षा में टिकाऊ है। यदि हम सनातन को पृथ्वी के धर्म के रूप में समझें तो यह विभाजन का नहीं, समन्वय का दर्शन बन जाता है और सनातन का अर्थ बन जाता है संतुलन, सततता और पुनर्जनन। इसलिए जब मानव व्यवस्था पृथ्वी की इस मूल लय के साथ तालमेल बैठाती है, तभी वह वास्तव में सनातन धर्म का पालन कर रही होती है।
