मुंबई, आठ अप्रैल (भाषा) भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बुधवार को कहा कि पिछले पखवाड़े में रुपये की कीमत में आए तेज उतार-चढ़ाव के पीछे ‘अत्यधिक सट्टेबाजी’ एक बड़ी वजह रही, जिसके चलते उसे विदेशी मुद्रा बाजार में कुछ अप्रत्याशित कदम उठाने पड़े।
आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने यहां द्विमासिक मौद्रिक नीति की घोषणा बाद एक संवाददाता सम्मेलन में स्पष्ट किया कि रुपये को संभालने के लिए उठाए गए ये कदम स्थायी नहीं हैं।
मल्होत्रा ने कहा, “मार्च के अंतिम हफ्तों में हमने विदेशी मुद्रा बाजार में बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं। ये उपाय खास बाजार परिस्थितियों को देखते हुए उठाए गए हैं। ये किसी संरचनात्मक बदलाव का संकेत नहीं हैं और ये हमेशा के लिए नहीं रहेंगे।”
इस अवसर पर केंद्रीय बैंक के डिप्टी गवर्नर टी. रबी शंकर ने कहा कि अत्यधिक उतार-चढ़ाव के दौरान बाजार में डॉलर की आपूर्ति ‘कृत्रिम रूप से कम’ हो गई थी, जिससे स्थिति और भी अस्थिर हो गई।
आरबीआई ने हाल ही में बैंकों के रुपये में खुले शुद्ध जोखिम (नेट ओपन पोजिशन) को 10 करोड़ डॉलर तक सीमित करने के साथ उन्हें कुछ खास तरह के अग्रिम सौदे देने से भी रोक दिया था। इन कदमों का असर यह हुआ कि रुपये में एक सत्र के ही भीतर दो प्रतिशत से ज्यादा की मजबूती देखी गई।
मार्च के दौरान रुपये पर दबाव बढ़ा और यह एक समय डॉलर के मुकाबले 95 के स्तर को भी पार कर गया, जो अब तक का निचला स्तर है। वित्त वर्ष 2025-26 में रुपया डॉलर के मुकाबले 9.88 प्रतिशत गिरा, जो 14 वर्षों में सबसे बड़ी सालाना गिरावट है।
आरबीआई गवर्नर ने कहा कि बाजार में जरूरत से ज्यादा पोजिशन बनने से रुपये में अस्थिरता बढ़ रही थी और कीमतों के सही निर्धारण पर असर पड़ रहा था।
केंद्रीय बैंक ने कहा कि इन कदमों का मकसद बाजार को स्थिर करना है जबकि लंबे समय में रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण और वैश्विक बाजार के विकास की प्रतिबद्धता बनी रहेगी।